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दोहा 227

चौ०

बहुरि सोचबस भे सियरवनू। कारन कवन भरत आगवनू॥ एक आइ अस कहा बहोरी। सेन संग चतुरंग न थोरी॥१॥

भावार्थ

सीतापति श्रीरामचन्द्रजी पुनः सोचके वश हो गये कि भरतके आनेका क्या कारण है? फिर एकने आकर ऐसा कहा कि उनके साथमें बड़ी भारी चतुरङ्गिणी सेना भी है॥१॥

चौ०

सो सुनि रामहि भा अति सोचू। इत पितु बच इत बंधु सकोचू॥ भरत सुभाउ समुझि मन माहीं। प्रभु चित हित थिति पावत नाहीं॥२॥

भावार्थ

यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको अत्यन्त सोच हुआ। इधर तो पिताके वचन और इधर भाई भरतजीका संकोच! भरतजीके स्वभावको मनमें समझकर तो प्रभु श्रीरामचन्द्रजी चित्तको ठहरानेके लिये कोई स्थान ही नहीं पाते हैं॥२॥

चौ०

समाधान तब भा यह जाने। भरतु कहे महुँ साधु सयाने॥ लखन लखेउ प्रभु हृदयँ खभारू। कहत समय सम नीति बिचारू॥३॥

भावार्थ

तब यह जानकर समाधान हो गया कि भरत साधु और सयाने हैं तथा मेरे कहनेमें (आज्ञाकारी) हैं। लक्ष्मणजीने देखा कि प्रभु श्रीरामजीके हृदयमें चिन्ता है तो वे समयके अनुसार अपना नीतियुक्त विचार कहने लगे—॥३॥

चौ०

बिनु पूछें कछु कहउँ गोसाईं। सेवकु समयँ न ढीठ ढिठाईं॥ तुम्ह सर्बग्य सिरोमनि स्वामी। आपनि समुझि कहउँ अनुगामी॥४॥

भावार्थ

हे स्वामी! आपके बिना ही पूछे मैं कुछ कहता हूँ; सेवक समयपर ढिठाई करनेसे ढीठ नहीं समझा जाता (अर्थात्‌ आप पूछें तब मैं कहूँ, ऐसा अवसर नहीं है; इसीलिये यह मेरा कहना ढिठाई नहीं होगा)। हे स्वामी! आप सर्वज्ञोंमें शिरोमणि हैं (सब जानते ही हैं)। मैं सेवक तो अपनी समझकी बात कहता हूँ॥४॥

दो०

नाथ सुहृद सुठि सरल चित सील सनेह निधान। सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान॥२२७॥

भावार्थ

हे नाथ! आप परम सुहृद्‌ (बिना ही कारण परम हित करनेवाले), सरलहृदय तथा शील और स्नेहके भण्डार हैं, आपका सभीपर प्रेम और विश्वास है और अपने हृदयमें सबको अपने ही समान जानते हैं॥२२७॥

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