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दोहा 22

चौ०

कुबरीं करि कबुली कैकेई। कपट छुरी उर पाहन टेई॥ लखइ न रानि निकट दुखु कैसें। चरइ हरित तिन बलिपसु जैसें॥१॥

भावार्थ

कुबरीने कैकेयीको [ सब तरहसे ] कबूल करवाकर ( अर्थात् बलिपशु बनाकर ) कपटरूप छुरीको अपने [ कठोर ] हृदयरूपी पत्थरपर टेया ( उसकी धारको तेज किया )। रानी कैकेयी अपने निकटके ( शीघ्र आनेवाले ) दुःखको कैसे नहीं देखती, जैसे बलिका पशु हरी-हरी घास चरता है [ पर यह नहीं जानता कि मौत सिरपर नाच रही है ]॥ १ ॥

चौ०

सुनत बात मृदु अंत कठोरी। देति मनहुँ मधु माहुर घोरी॥ कहइ चेरि सुधि अहइ कि नाहीं। स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं॥२॥

भावार्थ

मन्थराकी बातें सुननेमें तो कोमल हैं, पर परिणाममें कठोर ( भयानक ) हैं। मानो वह शहदमें घोलकर जहर पिला रही हो। दासी कहती है—हे स्वामिनि! तुमने मुझको एक कथा कही थी, उसकी याद है कि नहीं ?॥ २ ॥

चौ०

दुइ बरदान भूप सन थाती। मागहु आजु जुड़ावहु छाती॥ सुतहि राजु रामहि बनबासू। देहु लेहु सब सवति हुलासू॥३॥

भावार्थ

तुम्हारे दो वरदान राजाके पास धरोहर हैं। आज उन्हें राजासे माँगकर अपनी छाती ठंढी करो। पुत्रको राज्य और रामको वनवास दो और सौतका सारा आनन्द तुम ले लो॥ ३ ॥

चौ०

भूपति राम सपथ जब करई। तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई॥ होइ अकाजु आजु निसि बीतें। बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें॥४॥

भावार्थ

जब राजा रामकी सौगंध खा लें, तब वर माँगना, जिससे वचन न टलने पावे। आजकी रात बीत गयी, तो काम बिगड़ जायगा। मेरी बातको हृदयसे प्रिय [ या प्राणोंसे भी प्यारी ] समझना॥ ४॥

दो०

बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगृहँ जाहु। काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु॥२२॥

भावार्थ

पापिनी मन्थराने बड़ी बुरी घात लगाकर कहा—कोपभवनमें जाओ। सब काम बड़ी सावधानीसे बनाना, राजापर सहसा विश्वास न कर लेना ( उनकी बातोंमें न आ जाना )॥ २२ ॥

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