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दोहा 215

चौ०

मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका। सब लघु लगे लोकपति लोका॥ सुख समाजु नहिं जाइ बखानी। देखत बिरति बिसारहिं ग्यानी॥१॥

भावार्थ

जब भरतजीने मुनिके प्रभावको देखा तो उसके सामने उन्हें [ इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर आदि ] सभी लोकपालोंके लोक तुच्छ जान पड़े। सुखकी सामग्रीका वर्णन नहीं हो सकता, जिसे देखकर ज्ञानीलोग भी वैराग्य भूल जाते हैं॥ १ ॥

चौ०

आसन सयन सुबसन बिताना। बन बाटिका बिहग मृग नाना॥ सुरभि फूल फल अमिअ समाना। बिमल जलासय बिबिध बिधाना॥२॥

भावार्थ

आसन, सेज, सुन्दर वस्त्र, चँदोवे, वन, बगीचे, भाँति-भाँतिके पक्षी और पशु, सुगन्धित फूल और अमृतके समान स्वादिष्ट फल, अनेकों प्रकारके ( तालाब, कुएँ, बावली आदि ) निर्मल जलाशय,॥ २ ॥

चौ०

असन पान सुचि अमिअ अमी से। देखि लोग सकुचात जमी से॥ सुर सुरभी सुरतरु सबही कें। लखि अभिलाषु सुरेस सची कें॥३॥

भावार्थ

तथा अमृतके भी अमृत-सरीखे पवित्र खान-पानके पदार्थ थे, जिन्हें देखकर सब लोग संयमी पुरुषों ( विरक्त मुनियों ) की भाँति सकुचा रहे हैं। सभीके डेरोंमें [ मनोवाञ्छित वस्तु देनेवाले ] कामधेनु और कल्पवृक्ष हैं, जिन्हें देखकर इन्द्र और इन्द्राणीको भी अभिलाषा होती है ( उनका भी मन ललचा जाता है )॥ ३ ॥

चौ०

रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी॥ स्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा॥४॥

भावार्थ

वसन्त-ऋतु है। शीतल, मन्द, सुगन्ध तीन प्रकारकी हवा बह रही है। सभीको [ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ] चारों पदार्थ सुलभ हैं। माला, चन्दन, स्त्री आदिक भोगोंको देखकर सब लोग हर्ष और विषादके वश हो रहे हैं। [ हर्ष तो भोग-सामग्रियोंको और मुनिके तपःप्रभावको देखकर होता है और विषाद इस बातसे होता है कि श्रीरामके वियोगमें नियम-व्रतसे रहनेवाले हमलोग भोग-विलासमें क्यों आ फँसे; कहीं इनमें आसक्त होकर हमारा मन नियम-व्रतोंको न त्याग दे ]॥४॥

दो०

संपति चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार। तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार॥२१५॥

भावार्थ

सम्पत्ति ( भोग-विलासकी सामग्री ) चकवी है और भरतजी चकवा हैं और मुनिकी आज्ञा खेल है, जिसने उस रातको आश्रमरूपी पिंजड़ेमें दोनोंको बंद कर रखा और ऐसे ही सबेरा हो गया। [ जैसे किसी बहेलियेके द्वारा एक पिंजड़ेमें रखे जानेपर भी चकवी-चकवेका रातको संयोग नहीं होता, वैसे ही भरद्वाजजीकी आज्ञासे रातभर भोग-सामग्रियोंके साथ रहनेपर भी भरतजीने मनसे भी उनका स्पर्शतक नहीं किया। ]॥२१५॥

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