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दोहा 207

चौ०

यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेदु बुध संमत दोऊ॥ तात तुम्हार बिमल जसु गाई। पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई॥१॥

भावार्थ

यह कहते भी कोई भला न कहेगा, क्योंकि लोक और वेद दोनों ही विद्वानोंको मान्य है। किन्तु हे तात! तुम्हारा निर्मल यश गाकर तो लोक और वेद दोनों बड़ाई पावेंगे॥ १ ॥

चौ०

लोक बेद संमत सबु कहई। जेहि पितु देइ राजु सो लहई॥ राउ सत्यब्रत तुम्हहि बोलाई। देत राजु सुखु धरमु बड़ाई॥२॥

भावार्थ

यह लोक और वेद दोनोंको मान्य है और सब यही कहते हैं कि पिता जिसको राज्य दे वही पाता है। राजा सत्यव्रती थे; तुमको बुलाकर राज्य देते, तो सुख मिलता, धर्म रहता और बड़ाई होती॥ २॥

चौ०

राम गवनु बन अनरथ मूला। जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला॥ सो भावी बस रानि अयानी। करि कुचालि अंतहुँ पछितानी॥३॥

भावार्थ

सारे अनर्थकी जड़ तो श्रीरामचन्द्रजीका वनगमन है, जिसे सुनकर समस्त संसारको पीड़ा हुई। वह श्रीरामका वनगमन भी भावीवश हुआ। बेसमझ रानी तो भावीवश कुचाल करके अन्तमें पछतायी॥ ३ ॥

चौ०

तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू। कहै सो अधम अयान असाधू॥ करतेहु राजु त तुम्हहि न दोषू। रामहि होत सुनत संतोषू॥४॥

भावार्थ

उसमें भी तुम्हारा कोई तनिक-सा भी अपराध कहे, तो वह अधम, अज्ञानी और असाधु है। यदि तुम राज्य करते तो भी तुम्हें दोष न होता। सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको भी सन्तोष ही होता॥ ४ ॥

दो०

अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु। सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु॥२०७॥

भावार्थ

हे भरत! अब तो तुमने बहुत ही अच्छा किया; यही मत तुम्हारे लिये उचित था। श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें प्रेम होना ही संसारमें समस्त सुन्दर मङ्गलोंका मूल है॥ २०७ ॥

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