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दोहा 196

चौ०

कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती॥ राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउँ भुवन भूषन तबही तें॥१॥

भावार्थ

मैं कपटी, कायर, कुबुद्धि और कुजाति हूँ और लोक-वेद दोनोंसे सब प्रकारसे बाहर हूँ। पर जबसे श्रीरामचन्द्रजीने मुझे अपनाया है, तभीसे मैं विश्वका भूषण हो गया॥ १ ॥

चौ०

देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई। मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई॥ कहि निषाद निज नाम सुबानीं। सादर सकल जोहारीं रानीं॥२॥

भावार्थ

निषादराजकी प्रीतिको देखकर और सुन्दर विनय सुनकर फिर भरतजीके छोटे भाई शत्रुघ्नजी उससे मिले। फिर निषादने अपना नाम ले-लेकर सुन्दर ( नम्र और मधुर ) वाणीसे सब रानियोंको आदरपूर्वक जोहार की॥ २ ॥

चौ०

जानि लखन सम देहिं असीसा। जिअहु सुखी सय लाख बरीसा॥ निरखि निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखनु निहारी॥३॥

भावार्थ

रानियाँ उसे लक्ष्मणजीके समान समझकर आशीर्वाद देती हैं कि तुम सौ लाख वर्षोंतक सुखपूर्वक जिओ। नगरके स्त्री-पुरुष निषादको देखकर ऐसे सुखी हुए, मानो लक्ष्मणजीको देख रहे हों॥ ३ ॥

चौ०

कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू। भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू॥ सुनि निषादु निज भाग बड़ाई। प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई॥४॥

भावार्थ

सब कहते हैं कि जीवनका लाभ तो इसीने पाया है, जिसे कल्याणस्वरूप श्रीरामचन्द्रजीने भुजाओंमें बाँधकर गले लगाया है। निषाद अपने भाग्यकी बड़ाई सुनकर मनमें परम आनन्दित हो सबको अपने साथ लिवा ले चला॥ ४ ॥

दो०

सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ। घर तरु तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाइ॥१९६॥

भावार्थ

उसने अपने सब सेवकोंको इशारेसे कह दिया। वे स्वामीका रुख पाकर चले और उन्होंने घरोंमें, वृक्षोंके नीचे, तालाबोंपर तथा बगीचों और जंगलोंमें ठहरनेके लिये स्थान बना दिये॥ १९६ ॥

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