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दोहा 193

भरत-निषाद-मिलन और संवाद एवं भरतजीका तथा नगरवासियोंका प्रेम

चौ०

लखब सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ॥ अस कहि भेंट सँजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे॥१॥

भावार्थ

उनके सुन्दर स्वभावसे मैं उनके स्नेहको पहचान लूँगा। वैर और प्रेम छिपानेसे नहीं छिपते। ऐसा कहकर वह भेंटका सामान सजाने लगा। उसने कन्द, मूल, फल, पक्षी और हिरन मँगवाये॥ १ ॥

चौ०

मीन पीन पाठीन पुराने। भरि भरि भार कहारन्ह आने॥ मिलन साजु सजि मिलन सिधाए। मंगल मूल सगुन सुभ पाए॥२॥

भावार्थ

कहार लोग पुरानी और मोटी पहिना नामक मछलियोंके भार भर-भरकर लाये। भेंटका सामान सजाकर मिलनेके लिये चले तो मङ्गलदायक शुभ शकुन मिले॥ २ ॥

चौ०

देखि दूरि तें कहि निज नामू। कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू॥ जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा। भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा॥३॥

भावार्थ

निषादराजने मुनिराज वसिष्ठजीको देखकर अपना नाम बतलाकर दूरहीसे दण्डवत्‌-प्रणाम किया। मुनीश्वर वसिष्ठजीने उसको रामका प्यारा जानकर आशीर्वाद दिया और भरतजीको समझाकर कहा [ कि यह श्रीरामजीका मित्र है ]॥ ३ ॥

चौ०

राम सखा सुनि संदनु त्यागा। चले उतरि उमगत अनुरागा॥ गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई। कीन्ह जोहारु माथ महि लाई॥४॥

भावार्थ

यह श्रीरामका मित्र है, इतना सुनते ही भरतजीने रथ त्याग दिया। वे रथसे उतरकर प्रेममें उमँगते हुए चले। निषादराज गुहने अपना गाँव, जाति और नाम सुनाकर पृथ्वीपर माथा टेककर जोहार की॥ ४ ॥

दो०

करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ। मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेमु न हृदयँ समाइ॥१९३॥

भावार्थ

दण्डवत्‌ करते देखकर भरतजीने उठाकर उसको छातीसे लगा लिया। हृदयमें प्रेम समाता नहीं है, मानो स्वयं लक्ष्मणजीसे भेंट हो गयी हो॥ १९३ ॥

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