Ramayana.com

दोहा 190

चौ०

होहु सँजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल मरै के ठाटा॥ सनमुख लोह भरत सन लेऊँ। जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ॥१॥

भावार्थ

सुसज्जित होकर घाटोंको रोक लो और सब लोग मरनेके साज सजा लो ( अर्थात्‌ भरतसे युद्धमें लड़कर मरनेके लिये तैयार हो जाओ )। मैं भरतसे सामने ( मैदानमें ) लोहा लूँगा ( मुठभेड़ करूँगा ) और जीते-जी उन्हें गङ्गापार न उतरने दूँगा॥ १ ॥

चौ०

समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा। राम काजु छनभंगु सरीरा॥ भरत भाइ नृपु मैं जन नीचू। बड़ें भाग असि पाइअ मीचू॥२॥

भावार्थ

युद्धमें मरण, फिर गङ्गाजीका तट, श्रीरामजीका काम और क्षणभङ्गुर शरीर ( जो चाहे जब नाश हो जाय ); भरत श्रीरामजीके भाई और राजा ( उनके हाथसे मरना ) और मैं नीच सेवक—बड़े भाग्यसे ऐसी मृत्यु मिलती है॥ २ ॥

चौ०

स्वामि काज करिहउँ रन रारी। जस धवलिहउँ भुवन दस चारी॥ तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें। दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें॥३॥

भावार्थ

मैं स्वामीके कामके लिये रणमें लड़ाई करूँगा और चौदहों लोकोंको अपने यशसे उज्ज्वल कर दूँगा। श्रीरघुनाथजीके निमित्त प्राण त्याग दूँगा। मेरे तो दोनों ही हाथोंमें आनन्दके लड्‌डू हैं ( अर्थात्‌ जीत गया तो रामसेवकका यश प्राप्त करूँगा और मारा गया तो श्रीरामजीकी नित्य सेवा प्राप्त करूँगा )॥ ३ ॥

चौ०

साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुँ जासु न रेखा॥ जायँ जिअत जग सो महिभारू। जननी जौबन बिटप कुठारू॥४॥

भावार्थ

साधुओंके समाजमें जिसकी गिनती नहीं और श्रीरामजीके भक्तोंमें जिसका स्थान नहीं, वह जगत्‌में पृथ्वीका भार होकर व्यर्थ ही जीता है। वह माताके यौवनरूपी वृक्षके काटनेके लिये कुल्हाड़ामात्र है॥ ४ ॥

दो०

बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु। सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु॥१९०॥

भावार्थ

[ इस प्रकार श्रीरामजीके लिये प्राणसमर्पणका निश्चय करके ] निषादराज विषादसे रहित हो गया और सबका उत्साह बढ़ाकर तथा श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके उसने तुरंत ही तरकस, धनुष और कवच माँगा॥ १९० ॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें