दोहा 187
चक्क चक्कि जिमि पुर नर नारी। चहत प्रात उर आरत भारी॥ जागत सब निसि भयउ बिहाना। भरत बोलाए सचिव सुजाना॥१॥
भावार्थ
नगरके नर-नारी चकवे-चकवीकी भाँति हृदयमें अत्यन्त आर्त होकर प्रातःकालका होना चाहते हैं। सारी रात जागते-जागते सबेरा हो गया। तब भरतजीने चतुर मन्त्रियोंको बुलवाया—॥ १ ॥
कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू। बनहिं देब मुनि रामहि राजू॥ बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे। तुरत तुरग रथ नाग सँवारे॥२॥
भावार्थ
और कहा—तिलकका सब सामान ले चलो। वनमें ही मुनि वसिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजीको राज्य देंगे, जल्दी चलो। यह सुनकर मन्त्रियोंने वन्दना की और तुरंत घोड़े, रथ और हाथी सजवा दिये॥ २ ॥
अरुंधती अरु अगिनि समाऊ। रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ॥ बिप्र बृंद चढ़ि बाहन नाना। चले सकल तप तेज निधाना॥३॥
भावार्थ
सबसे पहले मुनिराज वसिष्ठजी अरुन्धती और अग्निहोत्रकी सब सामग्रीसहित रथपर सवार होकर चले। फिर ब्राह्मणोंके समूह, जो सब-के-सब तपस्या और तेजके भण्डार थे, अनेकों सवारियोंपर चढ़कर चले॥ ३ ॥
नगर लोग सब सजि सजि जाना। चित्रकूट कहँ कीन्ह पयाना॥ सिबिका सुभग न जाहिं बखानी। चढ़ि चढ़ि चलत भईं सब रानी॥४॥
भावार्थ
नगरके सब लोग रथोंको सजा-सजाकर चित्रकूटको चल पड़े। जिनका वर्णन नहीं हो सकता, ऐसी सुन्दर पालकियोंपर चढ़-चढ़कर सब रानियाँ चलीं॥ ४ ॥
सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ। सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ॥१८७॥
भावार्थ
विश्वासपात्र सेवकोंको नगर सौंपकर और सबको आदरपूर्वक रवाना करके, तब श्रीसीतारामजीके चरणोंको स्मरण करके भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई चले॥ १८७ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें