दोहा 184
अयोध्यावासियोंसहित श्रीभरत-शत्रुघ्न आदिका वनगमन
भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे। राम सनेह सुधाँ जनु पागे॥ लोग बियोग बिषम बिष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे॥१॥
भावार्थ
भरतजीके वचन सबको प्यारे लगे। मानो वे श्रीरामजीके प्रेमरूपी अमृतमें पगे हुए थे। श्रीरामवियोगरूपी भीषण विषसे सब लोग जले हुए थे। वे मानो बीजसहित मन्त्रको सुनते ही जाग उठे॥ १ ॥
मातु सचिव गुर पुर नर नारी। सकल सनेहँ बिकल भए भारी॥ भरतहि कहहिं सराहि सराही। राम प्रेम मूरति तनु आही॥२॥
भावार्थ
माता, मन्त्री, गुरु, नगरके स्त्री-पुरुष सभी स्नेहके कारण बहुत ही व्याकुल हो गये। सब भरतजीको सराह-सराहकर कहते हैं कि आपका शरीर श्रीरामप्रेमकी साक्षात् मूर्ति ही है॥ २ ॥
तात भरत अस काहे न कहहू। प्रान समान राम प्रिय अहहू॥ जो पावँरु अपनी जड़ताईं। तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाईं॥३॥
भावार्थ
हे तात भरत! आप ऐसा क्यों न कहें। श्रीरामजीको आप प्राणोंके समान प्यारे हैं। जो नीच अपनी मूर्खतासे आपकी माता कैकेयीकी कुटिलताको लेकर आपपर सन्देह करेगा, ॥ ३ ॥
सो सठु कोटिक पुरुष समेता। बसिहि कलप सत नरक निकेता॥ अहि अघ अवगुन नहिं मनि गहई। हरइ गरल दुख दारिद दहई॥४॥
भावार्थ
वह दुष्ट करोड़ों पुरखोंसहित सौ कल्पोंतक नरकके घरमें निवास करेगा। साँपके पाप और अवगुणको मणि नहीं ग्रहण करती। बल्कि वह विषको हर लेती है और दुःख तथा दरिद्रताको भस्म कर देती है॥ ४ ॥
अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह। सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह॥१८४॥
भावार्थ
हे भरतजी! वनको अवश्य चलिये, जहाँ श्रीरामजी हैं; आपने बहुत अच्छी सलाह विचारी। शोकसमुद्रमें डूबते हुए सब लोगोंको आपने [ बड़ा ] सहारा दे दिया॥ १८४ ॥
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