दोहा 178
हित हमार सियपति सेवकाईं। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाईं॥ मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपायँ मोर हित नाहीं॥१॥
भावार्थ
मेरा कल्याण तो सीतापति श्रीरामजीकी चाकरीमें है, सो उसे माताकी कुटिलताने छीन लिया। मैंने अपने मनमें अनुमान करके देख लिया है कि दूसरे किसी उपायसे मेरा कल्याण नहीं है॥१॥
सोक समाजु राजु केहि लेखें। लखन राम सिय बिनु पद देखें॥ बादि बसन बिनु भूषन भारू। बादि बिरति बिनु ब्रह्मबिचारू॥२॥
भावार्थ
यह शोकका समुदाय राज्य लक्ष्मण, श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीके चरणोंको देखे बिना किस गिनतीमें है ( इसका क्या मूल्य है ) ? जैसे कपड़ोंके बिना गहनोंका बोझ व्यर्थ है। वैराग्यके बिना ब्रह्मविचार व्यर्थ है॥२॥
सरुज सरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा॥ जायँ जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सबु बिनु रघुराई॥३॥
भावार्थ
रोगी शरीरके लिये नाना प्रकारके भोग व्यर्थ हैं। श्रीहरिकी भक्तिके बिना जप और योग व्यर्थ हैं। जीवके बिना सुन्दर देह व्यर्थ है। वैसे ही श्रीरघुनाथजीके बिना मेरा सब कुछ व्यर्थ है॥३॥
जाउँ राम पहिं आयसु देहू। एकहिं आँक मोर हित एहू॥ मोहि नृप करि भल आपन चहहू। सोउ सनेह जड़ता बस कहहू॥४॥
भावार्थ
मुझे आज्ञा दीजिये, मैं श्रीरामजीके पास जाऊँ! एक ही आँक ( निश्चयपूर्वक ) मेरा हित इसीमें है। और मुझे राजा बनाकर आप अपना भला चाहते हैं, यह भी आप स्नेहकी जड़ता ( मोह ) के वश होकर ही कह रहे हैं॥४॥
कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज। तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज॥१७८॥
भावार्थ
कैकेयीके पुत्र, कुटिलबुद्धि, रामविमुख और निर्लज्ज मुझ-से अधमके राज्यसे आप मोहके वश होकर ही सुख चाहते हैं॥१७८॥
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