दोहा 175
अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू॥ सुरपुर नृपु पाइहि परितोषू। तुम्ह कहुँ सुकृतु सुजसु नहिं दोषू॥१॥
भावार्थ
राजाका वचन अवश्य सत्य करो। शोक त्याग दो और प्रजाका पालन करो। ऐसा करनेसे स्वर्गमें राजा सन्तोष पावेंगे और तुमको पुण्य और सुन्दर यश मिलेगा, दोष नहीं लगेगा॥१॥
बेद बिदित संमत सबही का। जेहि पितु देइ सो पावइ टीका॥ करहु राजु परिहरहु गलानी। मानहु मोर बचन हित जानी॥२॥
भावार्थ
यह वेदमें प्रसिद्ध है और [ स्मृति-पुराणादि ] सभी शास्त्रोंके द्वारा सम्मत है कि पिता जिसको दे वही राजतिलक पाता है। इसलिये तुम राज्य करो, ग्लानिका त्याग कर दो। मेरे वचनको हित समझकर मानो॥२॥
सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं। अनुचित कहब न पंडित केहीं॥ कौसल्यादि सकल महतारीं। तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं॥३॥
भावार्थ
इस बातको सुनकर श्रीरामचन्द्रजी और जानकीजी सुख पावेंगे और कोई पण्डित इसे अनुचित नहीं कहेगा। कौसल्याजी आदि तुम्हारी सब माताएँ भी प्रजाके सुखसे सुखी होंगी॥३॥
परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि॥ सौंपेहु राजु राम के आएँ। सेवा करेहु सनेह सुहाएँ॥४॥
भावार्थ
जो तुम्हारे और श्रीरामचन्द्रजीके श्रेष्ठ सम्बन्धको जान लेगा, वह सभी प्रकारसे तुमसे भला मानेगा। श्रीरामचन्द्रजीके लौट आनेपर राज्य उन्हें सौंप देना और सुन्दर स्नेहसे उनकी सेवा करना॥४॥
कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि। रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि॥१७५॥
भावार्थ
मन्त्री हाथ जोड़कर कह रहे हैं—गुरुजीकी आज्ञाका अवश्य ही पालन कीजिये। श्रीरघुनाथजीके लौट आनेपर जैसा उचित हो, तब फिर वैसा ही कीजियेगा॥१७५॥
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