दोहा 157
तेल नावँ भरि नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा॥ धावहु बेगि भरत पहिं जाहू। नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू॥१॥
भावार्थ
वसिष्ठजीने नावमें तेल भरवाकर राजाके शरीरको उसमें रखवा दिया। फिर दूतोंको बुलवाकर उनसे ऐसा कहा—तुमलोग जल्दी दौड़कर भरतके पास जाओ। राजाकी मृत्युका समाचार कहीं किसीसे न कहना॥१॥
एतनेइ कहेहु भरत सन जाई। गुर बोलाइ पठयउ दोउ भाई॥ सुनि मुनि आयसु धावन धाए। चले बेग बर बाजि लजाए॥२॥
भावार्थ
जाकर भरतसे इतना ही कहना कि दोनों भाइयोंको गुरुजीने बुलवा भेजा है। मुनिकी आज्ञा सुनकर धावन ( दूत ) दौड़े। वे अपने वेगसे उत्तम घोड़ोंको भी लजाते हुए चले॥२॥
अनरथु अवध अरंभेउ जब तें। कुसगुन होहिं भरत कहुँ तब तें॥ देखहिं राति भयानक सपना। जागि करहिं कटु कोटि कलपना॥३॥
भावार्थ
जबसे अयोध्यामें अनर्थ प्रारम्भ हुआ, तभीसे भरतजीको अपशकुन होने लगे। वे रातको भयङ्कर स्वप्न देखते थे और जागनेपर [ उन स्वप्नोंके कारण ] करोड़ों ( अनेकों ) तरहकी बुरी-बुरी कल्पनाएँ किया करते थे॥३॥
बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना। सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना॥ मागहिं हृदयँ महेस मनाई। कुसल मातु पितु परिजन भाई॥४॥
भावार्थ
[ अनिष्टशान्तिके लिये ] वे प्रतिदिन ब्राह्मणोंको भोजन कराकर दान देते थे। अनेकों विधियोंसे रुद्राभिषेक करते थे। महादेवजीको हृदयमें मनाकर उनसे माता-पिता, कुटुम्बी और भाइयोंका कुशल-क्षेम माँगते थे॥४॥
एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ। गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ॥१५७॥
भावार्थ
भरतजी इस प्रकार मनमें चिन्ता कर रहे थे कि दूत आ पहुँचे। गुरुजीकी आज्ञा कानोंसे सुनते ही वे गणेशजीको मनाकर चल पड़े॥१५७॥
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