दोहा 153
तेहि अवसर रघुबर रुख पाई। केवट पारहि नाव चलाई॥ रघुकुलतिलक चले एहि भाँती। देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती॥१॥
भावार्थ
उसी समय श्रीरामचन्द्रजीका रुख पाकर केवटने पार जानेके लिये नाव चला दी। इस प्रकार रघुवंशतिलक श्रीरामचन्द्रजी चल दिये और मैं छातीपर वज्र रखकर खड़ा-खड़ा देखता रहा॥१॥
मैं आपन किमि कहौं कलेसू। जिअत फिरेउँ लेइ राम सँदेसू॥ अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ। हानि गलानि सोच बस भयऊ॥२॥
भावार्थ
मैं अपने क्लेशको कैसे कहूँ, जो श्रीरामजीका यह सँदेसा लेकर जीता ही लौट आया! ऐसा कहकर मन्त्रीकी वाणी रुक गयी ( वे चुप हो गये ) और वे हानिकी ग्लानि और सोचके वश हो गये॥२॥
सूत बचन सुनतहिं नरनाहू। परेउ धरनि उर दारुन दाहू॥ तलफत बिषम मोह मन मापा। माजा मनहुँ मीन कहुँ ब्यापा॥३॥
भावार्थ
सारथी सुमन्त्रके वचन सुनते ही राजा पृथ्वीपर गिर पड़े, उनके हृदयमें भयानक जलन होने लगी। वे तड़पने लगे, उनका मन भीषण मोहसे व्याकुल हो गया। मानो मछलीको माँजा व्याप गया हो ( पहली वर्षाका जल लग गया हो )॥३॥
करि बिलाप सब रोवहिं रानी। महा बिपति किमि जाइ बखानी॥ सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा। धीरजहू कर धीरजु भागा॥४॥
भावार्थ
सब रानियाँ विलाप करके रो रही हैं। उस महान् विपत्तिका कैसे वर्णन किया जाय? उस समयके विलापको सुनकर दुःखको भी दुःख लगा और धीरजका भी धीरज भाग गया!॥४॥
भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरु। बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहु कुलिस कठोरु॥१५३॥
भावार्थ
राजाके रावले ( रनिवास ) में [ रोनेका ] शोर सुनकर अयोध्याभरमें बड़ा भारी कुहराम मच गया! [ ऐसा जान पड़ता था ] मानो पक्षियोंके विशाल वनमें रातके समय कठोर वज्र गिरा हो॥१५३॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें