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दोहा 140

चौ०

राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी॥ छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी। प्रमुदित मनहुँ चकोरकुमारी॥१॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीके साथ सीताजी अयोध्यापुरी, कुटुम्बके लोग और घरकी याद भूलकर बहुत ही सुखी रहती हैं। क्षण-क्षणपर पति श्रीरामचन्द्रजीके चन्द्रमाके समान मुखको देखकर वे वैसे ही परम प्रसन्न रहती हैं जैसे चकोरकुमारी ( चकोरी ) चन्द्रमाको देखकर!॥१॥

चौ०

नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी॥ सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा॥२॥

भावार्थ

स्वामीका प्रेम अपने प्रति नित्य बढ़ता हुआ देखकर सीताजी ऐसी हर्षित रहती हैं जैसे दिनमें चकवी! सीताजीका मन श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें अनुरक्त है इससे उनको वन हजारों अवधके समान प्रिय लगता है॥२॥

चौ०

परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा। प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा॥ सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर। असनु अमिअ सम कंद मूल फर॥३॥

भावार्थ

प्रियतम ( श्रीरामचन्द्रजी ) के साथ पर्णकुटी प्यारी लगती है। मृग और पक्षी प्यारे कुटुम्बियोंके समान लगते हैं। मुनियोंकी स्त्रियाँ सासके समान, श्रेष्ठ मुनि ससुरके समान और कन्द-मूल-फलोंका आहार उनको अमृतके समान लगता है॥३॥

चौ०

नाथ साथ साँथरी सुहाई। मयन सयन सय सम सुखदाई॥ लोकप होहिं बिलोकत जासू। तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू॥४॥

भावार्थ

स्वामीके साथ सुन्दर साथरी ( कुश और पत्तोंकी सेज ) सैकड़ों कामदेवकी सेजोंके समान सुख देनेवाली है। जिनके [ कृपापूर्वक ] देखनेमात्रसे जीव लोकपाल हो जाते हैं, उनको कहीं भोग-विलास मोहित कर सकते हैं!॥४॥

दो०

सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु। रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु॥१४०॥

भावार्थ

जिन श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करनेसे ही भक्तजन तमाम भोग-विलासको तिनकेके समान त्याग देते हैं, उन श्रीरामचन्द्रजीकी प्रिय पत्नी और जगत्‌की माता सीताजीके लिये यह [ भोग-विलासका त्याग ] कुछ भी आश्चर्य नहीं है॥१४०॥

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