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दोहा 138

चौ०

करि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा॥ फिरत अहेर राम छबि देखी। होहिं मुदित मृगबृंद बिसेषी॥१॥

भावार्थ

हाथी, सिंह, बंदर, सूअर और हिरन—ये सब वैर छोड़कर साथ-साथ विचरते हैं। शिकारके लिये फिरते हुए श्रीरामचन्द्रजीकी छबिको देखकर पशुओंके समूह विशेष आनन्दित होते हैं॥ १ ॥

चौ०

बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं। देखि राम बनु सकल सिहाहीं॥ सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या। मेकलसुता गोदावरि धन्या॥२॥

भावार्थ

जगत्‌में जहाँतक ( जितने ) देवताओंके वन हैं, सब श्रीरामजीके वनको देखकर सिहाते हैं। गङ्गा, सरस्वती,सूर्यकुमारी यमुना, नर्मदा, गोदावरी आदि धन्य ( पुण्यमयी ) नदियाँ,॥ २ ॥

चौ०

सब सर सिंधु नदीं नद नाना। मंदाकिनि कर करहिं बखाना॥ उदय अस्त गिरि अरु कैलासू। मंदर मेरु सकल सुरबासू॥३॥

भावार्थ

सारे तालाब, समुद्र, नदी और अनेकों नद सब मन्दाकिनीकी बड़ाई करते हैं। उदयाचल, अस्ताचल, कैलास, मन्दराचल और सुमेरु आदि सब, जो देवताओंके रहनेके स्थान हैं,॥ ३ ॥

चौ०

सैल हिमाचल आदिक जेते। चित्रकूट जसु गावहिं तेते॥ बिंधि मुदित मन सुखु न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई॥४॥

भावार्थ

और हिमालय आदि जितने पर्वत हैं, सभी चित्रकूटका यश गाते हैं। विन्ध्याचल बड़ा आनन्दित है, उसके मनमें सुख समाता नहीं; क्योंकि उसने बिना परिश्रम ही बहुत बड़ी बड़ाई पा ली है॥४॥

दो०

चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति। पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति॥१३८॥

भावार्थ

चित्रकूटके पक्षी, पशु, बेल, वृक्ष, तृण-अंकुरादिकी सभी जातियाँ पुण्यकी राशि हैं और धन्य हैं—देवता दिन-रात ऐसा कहते हैं॥१३८॥

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