दोहा 133
रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू॥ लखन दीख पय उतर करारा। चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा॥१॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—लक्ष्मण! बड़ा अच्छा घाट है। अब यहीं कहीं ठहरनेकी व्यवस्था करो। तब लक्ष्मणजीने पयस्विनी नदीके उत्तरके ऊँचे किनारेको देखा [ और कहा कि— ] इसके चारों ओर धनुषके-जैसा एक नाला फिरा हुआ है॥ १ ॥
नदी पनच सर सम दम दाना। सकल कलुष कलि साउज नाना॥ चित्रकूट जनु अचल अहेरी। चुकइ न घात मार मुठभेरी॥२॥
भावार्थ
नदी ( मन्दाकिनी ) उस धनुषकी प्रत्यञ्चा ( डोरी ) है और शम, दम, दान बाण हैं। कलियुगके समस्त पाप उसके अनेकों हिंसक पशु [ रूप निशाने ] हैं। चित्रकूट ही मानो अचल शिकारी है, जिसका निशाना कभी चूकता नहीं, और जो सामनेसे मारता है॥ २ ॥
अस कहि लखन ठाउँ देखरावा। थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा॥ रमेउ राम मनु देवन्ह जाना। चले सहित सुर थपति प्रधाना॥३॥
भावार्थ
ऐसा कहकर लक्ष्मणजीने स्थान दिखलाया। स्थानको देखकर श्रीरामचन्द्रजीने सुख पाया। जब देवताओंने जाना कि श्रीरामचन्द्रजीका मन यहाँ रम गया तब वे देवताओंके प्रधान थवई ( मकान बनानेवाले ) विश्वकर्माको साथ लेकर चले॥ ३ ॥
कोल किरात बेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए॥ बरनि न जाहिं मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला॥४॥
भावार्थ
सब देवता कोल-भीलोंके वेषमें आये और उन्होंने [ दिव्य ] पत्तों और घासोंके सुन्दर घर बना दिये। दो ऐसी सुन्दर कुटियाँ बनायीं जिनका वर्णन नहीं हो सकता। उनमें एक बड़ी सुन्दर छोटी-सी थी और दूसरी बड़ी थी॥ ४ ॥
लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत। सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत॥१३३॥
भावार्थ
लक्ष्मणजी और जानकीजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सुन्दर घास-पत्तोंके घरमें शोभायमान हैं। मानो कामदेव मुनिका वेष धारण करके पत्नी रति और वसन्त-ऋतुके साथ सुशोभित हो॥ १३३ ॥
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