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दोहा 114

चौ०

सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई॥ सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृहकाजु बिसारी॥१॥

भावार्थ

सीताजी और लक्ष्मणजीसहित श्रीरघुनाथजी जब किसी गाँवके पास जा निकलते हैं तब उनका आना सुनते ही बालक-बूढ़े, स्त्री-पुरुष सब अपने घर और काम-काजको भूलकर तुरंत उन्हें देखनेके लिये चल देते हैं॥ १ ॥

चौ०

राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयनफलु होहिं सुखारी॥ सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा॥२॥

भावार्थ

श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजीका रूप देखकर, नेत्रोंका [ परम ] फल पाकर वे सुखी होते हैं। दोनों भाइयोंको देखकर सब प्रेमानन्दमें मग्न हो गये। उनके नेत्रोंमें जल भर आया और शरीर पुलकित हो गये॥ २ ॥

चौ०

बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी॥ एकन्ह एक बोलि सिख देहीं। लोचन लाहु लेहु छन एहीं॥३॥

भावार्थ

उनकी दशा वर्णन नहीं की जाती। मानो दरिद्रोंने चिन्तामणिकी ढेरी पा ली हो। वे एक-एकको पुकारकर सीख देते हैं कि इसी क्षण नेत्रोंका लाभ ले लो॥ ३ ॥

चौ०

रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे॥ एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी॥४॥

भावार्थ

कोई श्रीरामचन्द्रजीको देखकर ऐसे अनुरागमें भर गये हैं कि वे उन्हें देखते हुए उनके साथ लगे चले जा रहे हैं। कोई नेत्रमार्गसे उनकी छविको हृदयमें लाकर शरीर, मन और श्रेष्ठ वाणीसे शिथिल हो जाते हैं ( अर्थात्‌ उनके शरीर, मन और वाणीका व्यवहार बंद हो जाता है )॥ ४ ॥

दो०

एक देखि बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात। कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात॥११४॥

भावार्थ

कोई बड़की सुन्दर छाया देखकर, वहाँ नरम घास और पत्ते बिछाकर कहते हैं कि क्षणभर यहाँ बैठकर थकावट मिटा लीजिये। फिर चाहे अभी चले जाइयेगा, चाहे सबेरे॥ ११४ ॥

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