दोहा 112
पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी॥ चले ससीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कइ करत बड़ाई॥१॥
भावार्थ
फिर सीताजी, श्रीरामजी और लक्ष्मणजीने हाथ जोड़कर यमुनाजीको पुनः प्रणाम किया और सूर्यकन्या यमुनाजीकी बड़ाई करते हुए सीताजीसहित दोनों भाई प्रसन्नतापूर्वक आगे चले॥ १ ॥
पथिक अनेक मिलहिं मग जाता। कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता॥ राज लखन सब अंग तुम्हारें। देखि सोचु अति हृदय हमारें॥२॥
भावार्थ
रास्तेमें जाते हुए उन्हें अनेकों यात्री मिलते हैं। वे दोनों भाइयोंको देखकर उनसे प्रेमपूर्वक कहते हैं कि तुम्हारे सब अङ्गोंमें राजचिह्न देखकर हमारे हृदयमें बड़ा सोच होता है॥ २॥
मारग चलहु पयादेहि पाएँ। ज्योतिषु झूठ हमारें भाएँ॥ अगमु पंथु गिरि कानन भारी। तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी॥३॥
भावार्थ
[ ऐसे राजचिह्नोंके होते हुए भी ] तुमलोग रास्तेमें पैदल ही चल रहे हो, इससे हमारी समझमें आता है कि ज्योतिष-शास्त्र झूठा ही है। भारी जंगल और बड़े-बड़े पहाड़ोंका दुर्गम रास्ता है। तिसपर तुम्हारे साथ सुकुमारी स्त्री है॥ ३॥
करि केहरि बन जाइ न जोई। हम सँग चलहिं जो आयसु होई॥ जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई॥४॥
भावार्थ
हाथी और सिंहोंसे भरा यह भयानक वन देखातक नहीं जाता। यदि आज्ञा हो तो हम साथ चलें। आप जहाँतक जायँगे वहाँतक पहुँचाकर, फिर आपको प्रणाम करके हम लौट आवेंगे॥ ४॥
एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन। कृपासिंधु फेरहिं तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन॥११२॥
भावार्थ
इस प्रकार वे यात्री प्रेमवश पुलकितशरीर हो और नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल भरकर पूछते हैं। किन्तु कृपाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी कोमल विनययुक्त वचन कहकर उन्हें लौटा देते हैं॥ ११२ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें