Ramayana.com

दोहा 110

यमुनाको प्रणाम, वनवासियोंका प्रेम

चौ०

सुनत तीरबासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी॥ लखन राम सिय सुंदरताई। देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई॥१॥

भावार्थ

यमुनाजीके किनारेपर रहनेवाले स्त्री-पुरुष [ यह सुनकर कि निषादके साथ दो परम सुन्दर सुकुमार नवयुवक और एक परम सुन्दरी स्त्री आ रही है ] सब अपना-अपना काम भूलकर दौड़े और लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजीका सौन्दर्य देखकर अपने भाग्यकी बड़ाई करने लगे॥ १ ॥

चौ०

अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं॥ जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने॥२॥

भावार्थ

उनके मनमें [ परिचय जाननेकी ] बहुत-सी लालसाएँ भरी हैं। पर वे नाम-गाँव पूछते सकुचाते हैं। उन लोगोंमें जो वयोवृद्ध और चतुर थे; उन्होंने युक्तिसे श्रीरामचन्द्रजीको पहचान लिया॥ २ ॥

चौ०

सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई। बनहि चले पितु आयसु पाई॥ सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं। रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं॥३॥

भावार्थ

उन्होंने सब कथा सब लोगोंको सुनायी कि पिताकी आज्ञा पाकर ये वनको चले हैं। यह सुनकर सब लोग दुःखित हो पछता रहे हैं कि रानी और राजाने अच्छा नहीं किया॥ ३ ॥

चौ०

तेहि अवसर एक तापसु आवा। तेजपुंज लघुबयस सुहावा॥ कबि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी॥४॥

भावार्थ

उसी अवसरपर वहाँ एक तपस्वी आया, जो तेजका पुञ्ज, छोटी अवस्थाका और सुन्दर था। उसकी गति कवि नहीं जानते [ अथवा वह कवि था जो अपना परिचय नहीं देना चाहता ]। वह वैरागीके वेषमें था और मन, वचन तथा कर्मसे श्रीरामचन्द्रजीका प्रेमी था॥ ४ ॥

[ इस तेजःपुञ्ज तापसके प्रसंगको कुछ टीकाकार क्षेपक मानते हैं और कुछ लोगोंके देखनेमें यह अप्रासंगिक और ऊपरसे जोड़ा हुआ-सा जान भी पड़ता है, परन्तु यह सभी प्राचीन प्रतियोंमें है। गुसाईंजी अलौकिक अनुभवी पुरुष थे। पता नहीं, यहाँ इस प्रसंगके रखनेमें क्या रहस्य है; परन्तु यह क्षेपक तो नहीं है। इस तापसको जब ‘कबि अलखित गति’ कहते हैं, तब निश्चयपूर्वक कौन क्या कह सकता है। हमारी समझसे ये तापस या तो श्रीहनुमान्‌जी थे अथवा ध्यानस्थ तुलसीदासजी! ]

दो०

सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि। परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि॥११०॥

भावार्थ

अपने इष्टदेवको पहचानकर उसके नेत्रोंमें जल भर आया और शरीर पुलकित हो गया। वह दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा, उसकी [ प्रेमविह्वल ] दशाका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ११० ॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें