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दोहा 106

चौ०

को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ॥ अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा॥१॥

भावार्थ

पापोंके समूहरूपी हाथीके मारनेके लिये सिंहरूप प्रयागराजका प्रभाव ( महत्त्व—माहात्म्य ) कौन कह सकता है। ऐसे सुहावने तीर्थराजका दर्शन कर सुखके समुद्र रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामजीने भी सुख पाया॥१॥

चौ०

कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई॥ करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा॥२॥

भावार्थ

उन्होंने अपने श्रीमुखसे सीताजी, लक्ष्मणजी और सखा गुहको तीर्थराजकी महिमा कहकर सुनायी। तदनन्तर प्रणाम करके, वन और बगीचोंको देखते हुए और बड़े प्रेमसे माहात्म्य कहते हुए—॥२॥

चौ०

एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी॥ मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा। पूजि जथाबिधि तीरथ देवा॥३॥

भावार्थ

इस प्रकार श्रीरामने आकर त्रिवेणीका दर्शन किया, जो स्मरण करनेसे ही सब सुन्दर मङ्गलोंको देनेवाली है। फिर आनन्दपूर्वक [ त्रिवेणीमें ] स्नान करके शिवजीकी सेवा ( पूजा ) की और विधिपूर्वक तीर्थदेवताओंका पूजन किया॥३॥

चौ०

तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए॥ मुनि मन मोद न कछु कहि जाई। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई॥४॥

भावार्थ

[ स्नान, पूजन आदि सब करके ] तब प्रभु श्रीरामजी भरद्वाजजीके पास आये। उन्हें दण्डवत्‌ करते हुए ही मुनिने हृदयसे लगा लिया। मुनिके मनका आनन्द कुछ कहा नहीं जाता। मानो उन्हें ब्रह्मानन्दकी राशि मिल गयी हो॥४॥

दो०

दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि। लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि॥१०६॥

भावार्थ

मुनीश्वर भरद्वाजजीने आशीर्वाद दिया। उनके हृदयमें ऐसा जानकर अत्यन्त आनन्द हुआ कि आज विधाताने [ श्रीसीताजी और लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके दर्शन कराकर ] मानो हमारे सम्पूर्ण पुण्योंके फलको लाकर आँखोंके सामने कर दिया॥१०६॥

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