दोहा 9
राक्षस-वधकी प्रतिज्ञा करना · सुतीक्ष्णजीका प्रेम, अगस्त्य-मिलन, अगस्त्य संवाद, रामका दण्डक-वन-प्रवेश और जटायु-मिलन
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा॥ ताते मुनि हरि लीन न भयऊ। प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ॥१॥
भावार्थ
ऐसा कहकर शरभंगजीने योगाग्निसे अपने शरीरको जला डाला और श्रीरामजीकी कृपासे वे वैकुण्ठको चले गये। मुनि भगवान्में लीन इसलिये नहीं हुए कि उन्होंने पहले ही भेद-भक्तिका वर ले लिया था॥१॥
रिषि निकाय मुनिबर गति देखी। सुखी भए निज हृदयँ बिसेषी॥ अस्तुति करहिं सकल मुनि बृंदा। जयति प्रनत हित करुना कंदा॥२॥
भावार्थ
ऋषिसमूह मुनिश्रेष्ठ शरभंगजीकी यह [ दुर्लभ ] गति देखकर अपने हृदयमें विशेषरूपसे सुखी हुए। समस्त मुनिवृन्द श्रीरामजीकी स्तुति कर रहे हैं [ और कह रहे हैं ] शरणागतहितकारी करुणाकन्द ( करुणाके मूल ) प्रभुकी जय हो!॥२॥
पुनि रघुनाथ चले बन आगे। मुनिबर बृंद बिपुल संँग लागे॥ अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया॥३॥
भावार्थ
फिर श्रीरघुनाथजी आगे वनमें चले। श्रेष्ठ मुनियोंके बहुत-से समूह उनके साथ हो लिये। हड्डियोंका ढेर देखकर श्रीरघुनाथजीको बड़ी दया आयी, उन्होंने मुनियोंसे पूछा॥३॥
जानतहूँ पूछिअ कस स्वामी। सबदरसी तुम्ह अंतरजामी॥ निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए॥४॥
भावार्थ
[ मुनियोंने कहा— ] हे स्वामी! आप सर्वदर्शी ( सर्वज्ञ ) और अन्तर्यामी ( सबके हृदयकी जाननेवाले ) हैं। जानते हुए भी [ अनजानकी तरह ] हमसे कैसे पूछ रहे हैं? राक्षसोंके दलोंने सब मुनियोंको खा डाला है [ ये सब उन्हींकी हड्डियोंके ढेर हैं ]। यह सुनते ही श्रीरघुवीरके नेत्रोंमें जल छा गया ( उनकी आँखोंमें करुणाके आँसू भर आये )॥४॥
निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह। सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥९॥
भावार्थ
श्रीरामजीने भुजा उठाकर प्रण किया कि मैं पृथ्वीको राक्षसोंसे रहित कर दूँगा। फिर समस्त मुनियोंके आश्रमोंमें जा-जाकर उनको [ दर्शन एवं सम्भाषणका ] सुख दिया॥९॥
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