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दोहा 41

चौ०

देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा॥ देखी सुंदर तरुबर छाया। बैठे अनुज सहित रघुराया॥१॥

भावार्थ

श्रीरामजीने अत्यन्त सुन्दर तालाब देखकर स्नान किया और परम सुख पाया। एक सुन्दर उत्तम वृक्षकी छाया देखकर श्रीरघुनाथजी छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित बैठ गये॥१॥

चौ०

तहँ पुनि सकल देव मुनि आए। अस्तुति करि निज धाम सिधाए॥ बैठे परम प्रसन्न कृपाला। कहत अनुज सन कथा रसाला॥२॥

भावार्थ

फिर वहाँ सब देवता और मुनि आये और स्तुति करके अपने-अपने धामको चले गये। कृपालु श्रीरामजी परम प्रसन्न बैठे हुए छोटे भाई लक्ष्मणजीसे रसीली कथाएँ कह रहे हैं॥२॥

चौ०

बिरहवंत भगवंतहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी॥ मोर साप करि अंगीकारा। सहत राम नाना दुख भारा॥३॥

भावार्थ

भगवान्‌को विरहयुक्त देखकर नारदजीके मनमें विशेषरूपसे सोच हुआ। [ उन्होंने विचार किया कि ] मेरे ही शापको स्वीकार करके श्रीरामजी नाना प्रकारके दुःखोंका भार सह रहे हैं ( दुःख उठा रहे हैं )॥३॥

चौ०

ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई। पुनि न बनिहि अस अवसरु आई॥ यह बिचारि नारद कर बीना। गए जहाँ प्रभु सुख आसीना॥४॥

भावार्थ

ऐसे ( भक्तवत्सल ) प्रभुको जाकर देखूँ। फिर ऐसा अवसर न बन आवेगा। यह विचारकर नारदजी हाथमें वीणा लिये हुए वहाँ गये, जहाँ प्रभु सुखपूर्वक बैठे हुए थे॥४॥

चौ०

गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भाँति बखानी॥ करत दंडवत लिए उठाई। राखे बहुत बार उर लाई॥५॥

भावार्थ

वे कोमल वाणीसे प्रेमके साथ बहुत प्रकारसे बखान-बखानकर रामचरितका गान कर [ ते हुए चले आ ] रहे थे। दण्डवत्‌ करते देखकर श्रीरामचन्द्रजीने नारदजीको उठा लिया और बहुत देरतक हृदयसे लगाये रखा॥५॥

चौ०

स्वागत पूँछि निकट बैठारे। लछिमन सादर चरन पखारे॥६॥

भावार्थ

फिर स्वागत ( कुशल ) पूछकर पास बैठा लिया। लक्ष्मणजीने आदरके साथ उनके चरण धोये॥६॥

दो०

नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि। नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि॥४१॥

भावार्थ

बहुत प्रकारसे विनती करके और प्रभुको मनमें प्रसन्न जानकर तब नारदजी कमलके समान हाथोंको जोड़कर वचन बोले—॥४१॥

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