दोहा 36
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥ छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥१॥
भावार्थ
मेरे ( राम ) मन्त्रका जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास—यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदोंमें प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इन्द्रियोंका निग्रह, शील ( अच्छा स्वभाव या चरित्र ), बहुत कार्योंसे वैराग्य और निरंतर संत पुरुषोंके धर्म ( आचरण ) में लगे रहना॥ १ ॥
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥ आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥२॥
भावार्थ
सातवीं भक्ति है जगत्भरको समभावसे मुझमें ओतप्रोत ( राममय ) देखना और संतोंको मुझसे भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाय उसीमें संतोष करना और स्वप्नमें भी पराये दोषोंको न देखना॥ २ ॥
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥ नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥३॥
भावार्थ
नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदयमें मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्थामें हर्ष और दैन्य ( विषाद ) का न होना। इन नवोंमेंसे जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो— ॥३॥
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥ जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई॥४॥
भावार्थ
हे भामिनि! मुझे वही अत्यन्त प्रिय है। फिर तुझमें तो सभी प्रकारकी भक्ति दृढ़ है। अतएव जो गति योगियोंको भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिये सुलभ हो गयी है॥४॥
मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा॥ जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी॥५॥
भावार्थ
मेरे दर्शनका परम अनुपम फल यह है कि जीव अपने सहज स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। हे भामिनि! अब यदि तू गजगामिनी जानकीकी कुछ खबर जानती हो तो बता॥५॥
पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई॥ सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा॥६॥
भावार्थ
[ शबरीने कहा— ] हे रघुनाथजी! आप पंपा नामक सरोवरको जाइये, वहाँ आपकी सुग्रीवसे मित्रता होगी। हे देव! हे रघुवीर! वह सब हाल बतावेगा। हे धीरबुद्धि! आप सब जानते हुए भी मुझसे पूछते हैं!॥६॥
बार बार प्रभु पद सिरु नाई। प्रेम सहित सब कथा सुनाई॥७॥
भावार्थ
बार-बार प्रभुके चरणोंमें सिर नवाकर, प्रेमसहित उसने सब कथा सुनायी॥७॥
कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पंकज धरे। तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे॥ नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू। बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू॥
भावार्थ
सब कथा कहकर भगवान्के मुखके दर्शन कर, हृदयमें उनके चरणकमलोंको धारण कर लिया और योगाग्निसे देहको त्यागकर ( जलाकर ) वह उस दुर्लभ हरिपदमें लीन हो गयी, जहाँसे लौटना नहीं होता। तुलसीदासजी कहते हैं कि अनेकों प्रकारके कर्म, अधर्म और बहुत-से मत—ये सब शोकप्रद हैं; हे मनुष्यो! इनका त्याग कर दो और विश्वास करके श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम करो।
जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि। महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि॥३६॥
भावार्थ
जो नीच जातिकी और पापोंकी जन्मभूमि थी, ऐसी स्त्रीको भी जिन्होंने मुक्त कर दिया, अरे महादुर्बुद्धि मन! तू ऐसे प्रभुको भूलकर सुख चाहता है?॥३६॥
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