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दोहा 3

चौ०

रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना॥ बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना॥१॥

भावार्थ

चित्रकूटमें बसकर श्रीरघुनाथजीने बहुत-से चरित्र किये, जो कानोंको अमृतके समान [ प्रिय ] हैं। फिर ( कुछ समय पश्चात् ) श्रीरामजीने मनमें ऐसा अनुमान किया कि मुझे सब लोग जान गये हैं, इससे [ यहाँ ] बड़ी भीड़ हो जायगी॥ १ ॥

चौ०

सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई॥ अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ॥२॥

भावार्थ

[ इसलिये ] सब मुनियोंसे विदा लेकर सीताजीसहित दोनों भाई चले! जब प्रभु अत्रिजीके आश्रममें गये, तो उनका आगमन सुनते ही महामुनि हर्षित हो गये॥ २ ॥

चौ०

पुलकित गात अत्रि उठि धाए। देखि रामु आतुर चलि आए॥ करत दंडवत मुनि उर लाए। प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए॥३॥

भावार्थ

शरीर पुलकित हो गया, अत्रिजी उठकर दौड़े। उन्हें दौड़े आते देखकर श्रीरामजी और भी शीघ्रतासे चले आये। दण्डवत्‌ करते हुए ही श्रीरामजीको [ उठाकर ] मुनिने हृदयसे लगा लिया और प्रेमाश्रुओंके जलसे दोनों जनोंको ( दोनों भाइयोंको ) नहला दिया॥ ३ ॥

चौ०

देखि राम छबि नयन जुड़ाने। सादर निज आश्रम तब आने॥ करि पूजा कहि बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए॥४॥

भावार्थ

श्रीरामजीकी छबि देखकर मुनिके नेत्र शीतल हो गये। तब वे उनको आदरपूर्वक अपने आश्रममें ले आये। पूजन करके सुन्दर वचन कहकर मुनिने मूल और फल दिये, जो प्रभुके मनको बहुत रुचे॥ ४ ॥

सो०

प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि। मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत॥३॥

भावार्थ

प्रभु आसनपर विराजमान हैं। नेत्र भरकर उनकी शोभा देखकर परम प्रवीण मुनिश्रेष्ठ हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे— ॥ ३ ॥

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