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दोहा 24

चौ०

सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला॥ तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा॥१॥

भावार्थ

हे प्रिये! हे सुन्दर पातिव्रत-धर्मका पालन करनेवाली सुशीले! सुनो! मैं अब कुछ मनोहर मनुष्यलीला करूँगा। इसलिये जबतक मैं राक्षसोंका नाश करूँ, तबतक तुम अग्निमें निवास करो॥१॥

चौ०

जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी॥ निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रूप सुबिनीता॥२॥

भावार्थ

श्रीरामजीने ज्यों ही सब समझाकर कहा, त्यों ही श्रीसीताजी प्रभुके चरणोंको हृदयमें धरकर अग्निमें समा गयीं। सीताजीने अपनी ही छायामूर्ति वहाँ रख दी, जो उनके-जैसे ही शील-स्वभाव और रूपवाली तथा वैसे ही विनम्र थी॥२॥

चौ०

लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना॥ दसमुख गयउ जहाँ मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा॥३॥

भावार्थ

भगवान्‌ने जो कुछ लीला रची, इस रहस्यको लक्ष्मणजीने भी नहीं जाना। स्वार्थपरायण और नीच रावण वहाँ गया जहाँ मारीच था और उसको सिर नवाया॥३॥

चौ०

नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई॥ भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी॥४॥

भावार्थ

नीचका झुकना ( नम्रता ) भी अत्यन्त दुःखदायी होता है। जैसे अङ्कुश, धनुष, साँप और बिल्लीका झुकना। हे भवानी! दुष्टकी मीठी वाणी भी [ उसी प्रकार ] भय देनेवाली होती है, जैसे बिना ऋतुके फूल!॥४॥

दो०

करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात। कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात॥२४॥

भावार्थ

तब मारीचने उसकी पूजा करके आदरपूर्वक बात पूछी—हे तात! आपका मन किस कारण इतना अधिक व्यग्र है और आप अकेले आये हैं?॥२४॥

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