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दोहा 22

मारीचप्रसंग और स्वर्णमृगरूपमें मारीचका मारा जाना

चौ०

सुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बाँह उठाई॥ कह लंकेस कहसि निज बाता। केइँ तव नासा कान निपाता॥ १ ॥

भावार्थ

शूर्पणखाके वचन सुनते ही सभासद्‌ अकुला उठे। उन्होंने शूर्पणखाकी बाँह पकड़कर उसे उठाया और समझाया। लङ्कापति रावणने कहा—अपनी बात तो बता, किसने तेरे नाक-कान काट लिये?॥१॥

चौ०

अवध नृपति दसरथ के जाए। पुरुष सिंघ बन खेलन आए॥ समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी। रहित निसाचर करिहहिं धरनी॥ २ ॥

भावार्थ

[ वह बोली— ] अयोध्याके राजा दशरथके पुत्र, जो पुरुषोंमें सिंहके समान हैं, वनमें शिकार खेलने आये हैं। मुझे उनकी करनी ऐसी समझ पड़ी है कि वे पृथ्वीको राक्षसोंसे रहित कर देंगे॥२॥

चौ०

जिन्ह कर भुजबल पाइ दसानन। अभय भए बिचरत मुनि कानन॥ देखत बालक काल समाना। परम धीर धन्वी गुन नाना॥ ३ ॥

भावार्थ

जिनकी भुजाओंका बल पाकर हे दशमुख! मुनिलोग वनमें निर्भय होकर विचरने लगे हैं। वे देखनेमें तो बालक हैं, पर हैं कालके समान। वे परम धीर, श्रेष्ठ धनुर्धर और अनेकों गुणोंसे युक्त हैं॥३॥

चौ०

अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बध रत सुर मुनि सुखदाता॥ सोभा धाम राम अस नामा। तिन्ह के संग नारि एक स्यामा॥ ४ ॥

भावार्थ

दोनों भाइयोंका बल और प्रताप अतुलनीय है। वे दुष्टोंके वध करनेमें लगे हैं और देवता तथा मुनियोंको सुख देनेवाले हैं। वे शोभाके धाम हैं, ‘राम’ ऐसा उनका नाम है। उनके साथ एक तरुणी सुन्दरी स्त्री है॥४॥

चौ०

रूप रासि बिधि नारि सँवारी। रति सत कोटि तासु बलिहारी॥ तासु अनुज काटे श्रुति नासा। सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा॥ ५ ॥

भावार्थ

विधाताने उस स्त्रीको ऐसी रूपकी राशि बनाया है कि सौ करोड़ रति (कामदेवकी स्त्री) उसपर निछावर हैं। उन्हींके छोटे भाईने मेरे नाक-कान काट डाले। मैं तेरी बहिन हूँ, यह सुनकर वे मेरी हँसी करने लगे॥५॥

चौ०

खर दूषन सुनि लगे पुकारा। छन महुँ सकल कटक उन्ह मारा॥ खर दूषन तिसिरा कर घाता। सुनि दससीस जरे सब गाता॥ ६ ॥

भावार्थ

मेरी पुकार सुनकर खर-दूषण सहायता करने आये। पर उन्होंने क्षणभरमें सारी सेनाको मार डाला। खर-दूषण और त्रिशिराका वध सुनकर रावणके सारे अङ्ग जल उठे॥६॥

दो०

सूपनखहि समुझाइ करि बल बोलेसि बहु भाँति। गयउ भवन अति सोचबस नीद परइ नहिं राति॥ २२ ॥

भावार्थ

उसने शूर्पणखाको समझाकर बहुत प्रकारसे अपने बलका बखान किया, किन्तु [ मनमें ] वह अत्यन्त चिन्तावश होकर अपने महलमें गया, उसे रातभर नींद नहीं पड़ी॥२२॥

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