दोहा 17
भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा॥ एहि बिधि गए कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती॥१॥
भावार्थ
इस भक्तियोगको सुनकर लक्ष्मणजीने अत्यन्त सुख पाया और उन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सिर नवाया। इस प्रकार वैराग्य, ज्ञान, गुण और नीति कहते हुए कुछ दिन बीत गये॥ १ ॥
सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी॥ पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा॥२॥
भावार्थ
शूर्पणखा नामक रावणकी एक बहिन थी, जो नागिनके समान भयानक और दुष्ट हृदयकी थी। वह एक बार पञ्चवटीमें गयी और दोनों राजकुमारोंको देखकर विकल ( कामसे पीड़ित ) हो गयी॥ २ ॥
भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी॥ होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी॥ ३ ॥
भावार्थ
( काकभुशुण्डिजी कहते हैं— ) हे गरुड़जी! ( शूर्पणखा-जैसी राक्षसी, धर्मज्ञानशून्य कामान्ध ) स्त्री मनोहर पुरुषको देखकर, चाहे वह भाई, पिता, पुत्र ही हो, विकल हो जाती है और मनको नहीं रोक सकती। जैसे सूर्यकान्तमणि सूर्यको देखकर द्रवित हो जाती है ( ज्वालासे पिघल जाती है )॥ ३ ॥
रुचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई॥ तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी॥ ४ ॥
भावार्थ
वह सुन्दर रूप धरकर प्रभुके पास जाकर और बहुत मुसकराकर वचन बोली—न तो तुम्हारे समान कोई पुरुष है, न मेरे समान स्त्री! विधाताने यह संयोग ( जोड़ा ) बहुत विचारकर रचा है॥ ४॥
मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं॥ तातें अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी॥ ५ ॥
भावार्थ
मेरे योग्य पुरुष ( वर ) जगत्भरमें नहीं है, मैंने तीनों लोकोंको खोज देखा। इसीसे मैं अबतक कुमारी ( अविवाहित ) रही। अब तुमको देखकर कुछ मन माना ( चित्त ठहरा ) है॥ ५॥
सीतहि चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुआर मोर लघु भ्राता॥ गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी॥ ६ ॥
भावार्थ
सीताजीकी ओर देखकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने यह बात कही कि मेरा छोटा भाई कुमार है। तब वह लक्ष्मणजीके पास गयी। लक्ष्मणजी उसे शत्रुकी बहिन समझकर और प्रभुकी ओर देखकर कोमल वाणीसे बोले— ॥६॥
सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा॥ प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा॥ ७ ॥
भावार्थ
हे सुन्दरी! सुन, मैं तो उनका दास हूँ। मैं पराधीन हूँ, अतः तुम्हें सुभीता ( सुख ) न होगा। प्रभु समर्थ हैं, कोसलपुरके राजा हैं, वे जो कुछ करें, उन्हें सब फबता है॥७॥
सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी॥ लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी॥ ८ ॥
भावार्थ
सेवक सुख चाहे, भिखारी सम्मान चाहे, व्यसनी ( जिसे जूए, शराब आदिका व्यसन हो ) धन और व्यभिचारी शुभगति चाहे, लोभी यश चाहे और अभिमानी चारों फल—अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चाहे, तो ये सब प्राणी आकाशको दुहकर दूध लेना चाहते हैं ( अर्थात् असम्भव बातको सम्भव करना चाहते हैं )॥८॥
पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई॥ लछिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरई॥ ९ ॥
भावार्थ
वह लौटकर फिर श्रीरामजीके पास आयी। प्रभुने फिर उसे लक्ष्मणजीके पास भेज दिया। लक्ष्मणजीने कहा—तुम्हें वही बरेगा जो लज्जाको तृण तोड़कर ( अर्थात् प्रतिज्ञा करके ) त्याग देगा ( अर्थात् जो निपट निर्लज्ज होगा )॥९॥
तब खिसिआनि राम पहिं गई। रूप भयंकर प्रगटत भई॥ सीतहि सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सन सयन बुझाई॥१०॥
भावार्थ
तब वह खिसियायी हुई ( क्रुद्ध होकर ) श्रीरामजीके पास गयी और उसने अपना भयङ्कर रूप प्रकट किया। सीताजीको भयभीत देखकर श्रीरघुनाथजीने लक्ष्मणजीको इशारा देकर कहा॥१०॥
लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि। ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि॥१७॥
भावार्थ
लक्ष्मणजीने बड़ी फुर्तीसे उसको बिना नाक-कानकी कर दिया। मानो उसके हाथ रावणको चुनौती दी हो!॥१७॥
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