दोहा 15
थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई॥ मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥१॥
भावार्थ
( श्रीरामजीने कहा— ) हे तात! मैं थोड़ेहीमें सब समझाकर कहे देता हूँ। तुम मन, चित्त और बुद्धि लगाकर सुनो। मैं और मेरा, तू और तेरा—यही माया है, जिसने समस्त जीवोंको वशमें कर रखा है॥१॥
गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥ तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ॥२॥
भावार्थ
इन्द्रियोंके विषयोंको और जहाँतक मन जाता है, हे भाई! उस सबको माया जानना। उसके भी—एक विद्या और दूसरी अविद्या, इन दोनों भेदोंको तुम सुनो— ॥२॥
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा॥ एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें॥३॥
भावार्थ
एक ( अविद्या ) दुष्ट ( दोषयुक्त ) है और अत्यन्त दुःखरूप है जिसके वश होकर जीव संसाररूपी कुएँमें पड़ा हुआ है। और एक ( विद्या ) जिसके वशमें गुण है और जो जगत्की रचना करती है, वह प्रभुसे ही प्रेरित होती है, उसके अपना बल कुछ भी नहीं है॥३॥
ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माहीं॥ कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी॥४॥
भावार्थ
ज्ञान वह है जहाँ ( जिसमें ) मान आदि एक भी [ दोष ] नहीं है और जो सबमें समान रूपसे ब्रह्मको देखता है। हे तात! उसीको परम वैराग्यवान् कहना चाहिये जो सारी सिद्धियोंको और तीनों गुणोंको तिनकेके समान त्याग चुका हो॥४॥ [ जिसमें मान, दम्भ, हिंसा, क्षमाराहित्य, टेढ़ापन, आचार्यसेवाका अभाव, अपवित्रता, अस्थिरता, मनका निगृहीत न होना, इन्द्रियोंके विषयमें आसक्ति, अहंकार, जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधिमय जगत्में सुखबुद्धि, स्त्री-पुत्र-घर आदिमें आसक्ति तथा ममता, इष्ट और अनिष्टकी प्राप्तिमें हर्ष-शोक, भक्तिका अभाव, एकान्तमें मन न लगना, विषयी मनुष्योंके संगमें प्रेम—ये अठारह न हों और नित्य अध्यात्म ( आत्मा ) में स्थिति तथा तत्त्वज्ञानके अर्थ ( तत्त्वज्ञानके द्वारा जाननेयोग्य ) परमात्माका नित्य दर्शन हो, वही ज्ञान कहलाता है। [ देखिये गीता अध्याय १३।७ से ११ ]
माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव। बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव॥१५॥
भावार्थ
जो मायाको, ईश्वरको और अपने स्वरूपको नहीं जानता, उसे जीव कहना चाहिये। जो [ कर्मानुसार ] बन्धन और मोक्ष देनेवाला, सबसे परे और मायाका प्रेरक है वह ईश्वर है॥१५॥
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