दोहा 13
पञ्चवटी-निवास और श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद
तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाहीं॥ तुम्ह जानहु जेहि कारन आयउँ। ताते तात न कहि समुझायउँ॥ १॥
भावार्थ
तब श्रीरामजीने मुनिसे कहा—हे प्रभो! आपसे तो कुछ छिपाव है नहीं। मैं जिस कारणसे आया हूँ वह आप जानते ही हैं। इसीसे हे तात! मैंने आपसे समझाकर कुछ नहीं कहा॥ १ ॥
अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही। जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही॥ मुनि मुसुकाने सुनि प्रभु बानी। पूछेहु नाथ मोहि का जानी॥ २॥
भावार्थ
हे प्रभो! अब आप मुझे वही मन्त्र ( सलाह ) दीजिये, जिस प्रकार मैं मुनियोंके द्रोही राक्षसोंको मारूँ। प्रभुकी वाणी सुनकर मुनि मुसकराये और बोले—हे नाथ! आपने क्या समझकर मुझसे यह प्रश्न किया है ?॥ २ ॥
तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी। जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी॥ ऊमरि तरु बिसाल तव माया। फल ब्रह्मांड अनेक निकाया॥३॥
भावार्थ
हे पापोंका नाश करनेवाले! मैं तो आपहीके भजनके प्रभावसे आपकी कुछ थोड़ी-सी महिमा जानता हूँ। आपकी माया गूलरके विशाल वृक्षके समान है, अनेकों ब्रह्माण्डोंके समूह ही जिसके फल हैं॥ ३ ॥
जीव चराचर जंतु समाना। भीतर बसहिं न जानहिं आना॥ ते फल भच्छक कठिन कराला। तव भयँ डरत सदा सोउ काला॥४॥
भावार्थ
चर और अचर जीव [ गूलरके फलके भीतर रहनेवाले छोटे-छोटे ] जन्तुओंके समान उन [ ब्रह्माण्डरूपी फलों ] के भीतर बसते हैं और वे [ अपने उस छोटे-से जगत्के सिवा ] दूसरा कुछ नहीं जानते। उन फलोंका भक्षण करनेवाला कठिन और कराल काल है। वह काल भी सदा आपसे भयभीत रहता है॥४॥
ते तुम्ह सकल लोकपति साईं। पूँछेहु मोहि मनुज की नाईं॥ यह बर मागउँ कृपानिकेता। बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता॥५॥
भावार्थ
उन्हीं आपने समस्त लोकपालोंके स्वामी होकर भी मुझसे मनुष्यकी तरह प्रश्न किया। हे कृपाके धाम! मैं तो यह वर माँगता हूँ कि आप श्रीसीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित मेरे हृदयमें [ सदा ] निवास कीजिये॥५॥
अबिरल भगति बिरति सतसंगा। चरन सरोरुह प्रीति अभंगा॥ जद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता। अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता॥६॥
भावार्थ
मुझे प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य, सत्संग और आपके चरणकमलोंमें अटूट प्रेम प्राप्त हो। यद्यपि आप अखण्ड और अनन्त ब्रह्म हैं, जो अनुभवसे ही जाननेमें आते हैं और जिनका संतजन भजन करते हैं;॥६॥
अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ॥ संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई॥७॥
भावार्थ
यद्यपि मैं आपके ऐसे रूपको जानता हूँ और उसका वर्णन भी करता हूँ तो भी लौट-लौटकर मैं सगुण ब्रह्ममें ( आपके इस सुन्दर स्वरूपमें ) ही प्रेम मानता हूँ। आप सेवकोंको सदा ही बड़ाई दिया करते हैं, इसीसे हे रघुनाथजी! आपने मुझसे पूछा है॥७॥
है प्रभु परम मनोहर ठाऊँ। पावन पंचबटी तेहि नाऊँ॥ दंडक बन पुनीत प्रभु करहू। उग्र साप मुनिबर कर हरहू॥८॥
भावार्थ
हे प्रभो! एक परम मनोहर और पवित्र स्थान है; उसका नाम पञ्चवटी है। हे प्रभो! आप दण्डकवनको [ जहाँ पञ्चवटी है ] पवित्र कीजिये और श्रेष्ठ मुनि गौतमजीके कठोर शापको हर लीजिये॥८॥
बास करहु तहँ रघुकुल राया। कीजे सकल मुनिन्ह पर दाया॥ चले राम मुनि आयसु पाई। तुरतहिं पंचबटी निअराई॥९॥
भावार्थ
हे रघुकुलके स्वामी! आप सब मुनियोंपर दया करके वहीं निवास कीजिये। मुनिकी आज्ञा पाकर श्रीरामचन्द्रजी वहाँसे चल दिये और शीघ्र ही पञ्चवटीके निकट पहुँच गये॥९॥
गीधराज सैं भेंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ। गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ॥१३॥
भावार्थ
वहाँ गृध्रराज जटायुसे भेंट हुई। उसके साथ बहुत प्रकारसे प्रेम बढ़ाकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी गोदावरीजीके समीप पर्णकुटी छाकर रहने लगे॥१३॥
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