युद्धकाण्ड, सर्ग 73
ततो हतान् राक्षसपुङ्गवांस्तान् देवान्तकादित्रिशिरोऽतिकायान् । रक्षोगणास्तत्र हतावशिष्टा- स्ते रावणाय त्वरिताः शशंसुः ॥ १ ॥
भावार्थ
संग्रामभूमिमें जो निशाचर मरनेसे बच गये थे, उन्होंने तुरंत रावणके पास जाकर उसे देवान्तक, त्रिशिरा और अतिकाय आदि राक्षसपुङ्गवोंके मारे जानेका समाचार सुनाया ॥ १ ॥
ततो हतांस्तान् सहसा निशम्य राजा महाबाष्पपरिप्लुताक्षः । पुत्रक्षयं भ्रातृवधं च घोरं विचिन्त्य राजा विपुलं प्रदध्यौ ॥ २ ॥
भावार्थ
उनके वधकी बात सुनकर राजा रावणके नेत्रोंमें सहसा आँसुओंकी बाढ़ आ गयी । पुत्रों और भाइयोंके भयानक वधकी बात सोचकर उसको बड़ी चिन्ता हुई ॥ २ ॥
ततस्तु राजानमुदीक्ष्य दीनं शोकार्णवे सम्परिपुप्लुवानम् । रथर्षभो राक्षसराजसूनु- स्तमिन्द्रजिद् वाक्यमिदं बभाषे ॥ ३ ॥
भावार्थ
राजा रावणको शोकके समुद्रमें निमग्न एवं दीन हुआ देख रथियोंमें श्रेष्ठ राक्षसराजकुमार इन्द्रजित्ने यह बात कही—॥ ३ ॥
न तात मोहं परिगन्तुमर्हसे यत्रेन्द्रजिज्जीवति नैर्ऋतेश । नेन्द्रारिबाणाभिहतो हि कश्चित् प्राणान् समर्थः समरेऽभिपातुम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘तात ! राक्षसराज ! जबतक इन्द्रजित् जीवित है तबतक आप चिन्ता और मोहमें न पड़िये । इस इन्द्रशत्रुके बाणोंसे घायल होकर कोई भी समराङ्गणमें अपने प्राणोंकी रक्षा नहीं कर सकता ॥ ४ ॥
पश्याद्य रामं सह लक्ष्मणेन मद्बाणनिर्भिन्नविकीर्णदेहम् । गतायुषं भूमितले शयानं शितैः शरैराचितसर्वगात्रम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘देखिये, आज मैं राम और लक्ष्मणके शरीरको बाणोंसे छिन्न-भिन्न करके उनके सारे अङ्गोंको तीखे सायकोंसे भर देता हूँ, और वे दोनों भाई गतायु होकर सदाके लिये धरतीपर सो जाते हैं ॥ ५ ॥
इमां प्रतिज्ञां शृणु शक्रशत्रोः सुनिश्चितां पौरुषदैवयुक्ताम् । अद्यैव रामं सह लक्ष्मणेन संतर्पयिष्यामि शरैरमोघैः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘आप मुझ इन्द्रशत्रुकी इस सुनिश्चित प्रतिज्ञाको, जो मेरे पुरुषार्थसे और दैवबल ( ब्रह्माजीकी कृपा ) से भी सिद्ध होनेवाली है, सुन लीजिये—मैं आज ही लक्ष्मणसहित रामको अपने अमोघ बाणोंसे पूर्णतः तृप्त करूँगा—उनकी युद्धविषयक पिपासाको बुझा दूँगा ॥ ६ ॥
अद्येन्द्रवैवस्वतविष्णुरुद्र- साध्याश्च वैश्वानरचन्द्रसूर्याः । द्रक्ष्यन्ति मे विक्रममप्रमेयं विष्णोरिवोग्रं बलियज्ञवाटे ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘आज इन्द्र, यम, विष्णु, रुद्र, साध्य, अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा बलिके यज्ञमण्डपमें भगवान् विष्णुके भयंकर विक्रम-की भाँति मेरे अपार पराक्रमको देखेंगे’ ॥ ७ ॥
स एवमुक्त्वा त्रिदशेन्द्रशत्रु- रापृच्छ्य राजानमदीनसत्त्वः । समारुरोहानिलतुल्यवेगं रथं खरश्रेष्ठसमाधियुक्तम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर उदारचेता इन्द्रशत्रु इन्द्रजित्ने राजा रावणसे आज्ञा ली और अच्छे गदहोंसे जुते हुए, युद्धसामग्री-से सम्पन्न एवं वायुके समान वेगशाली रथपर वह सवार हुआ ॥ ८ ॥
समास्थाय महातेजा रथं हरिरथोपमम् । जगाम सहसा तत्र यत्र युद्धमरिंदमः ॥ ९ ॥
भावार्थ
उसका रथ इन्द्रके रथके समान जान पड़ता था । उसपर आरूढ़ हो शत्रुओंका दमन करनेवाला वह महातेजस्वी निशाचर सहसा उस स्थानपर जा पहुँचा, जहाँ युद्ध हो रहा था ॥ ९ ॥
तं प्रस्थितं महात्मानमनुजग्मुर्महाबलाः । संहर्षमाणा बहवो धनुःप्रवरपाणयः ॥ १० ॥
भावार्थ
उस महामनस्वी वीरको प्रस्थान करते देख बहुत-से महाबली राक्षस हाथोंमें श्रेष्ठ धनुष लिये हर्ष और उत्साहके साथ उसके पीछे-पीछे चले ॥ १० ॥
गजस्कन्धगताः केचित् केचित् परमवाजिभिः । व्याघ्रवृश्चिकमार्जारखरोष्ट्रैश्च भुजङ्गमैः ॥ ११ ॥ वराहैः श्वापदैः सिंहैर्जम्बुकैः पर्वतोपमैः । काकहंसमयूरैश्च राक्षसा भीमविक्रमाः ॥ १२ ॥
भावार्थ
कोई हाथीपर बैठकर चले तो कोई उत्तम घोड़ोंपर। इनके सिवा बाघ, बिच्छू, बिलाव, गदहे, ऊँट, सर्प, सूअर, अन्य हिंसक जन्तु, सिंह, पर्वताकार गीदड़, कौआ, हंस और मोर आदिकी सवारियोंपर चढ़े हुए भयानक पराक्रमी राक्षस वहाँ युद्धके लिये आये ॥ ११-१२ ॥
प्रासपट्टिशनिस्त्रिंशपरश्वधगदाधराः । भुशुण्डिमुद्गरायष्टिशतघ्नीपरिघायुधाः ॥ १३ ॥
भावार्थ
उन सबने प्रास, पट्टिश, खड्ग, फरसे, गदा, भुशुण्डि, मुद्गर, डंडे, शतघ्नी और परिघ आदि आयुध धारण कर रक्खे थे ॥१३॥
स शङ्खनिनदैः पूर्णैर्भेरीणां चापि निःस्वनैः । जगाम त्रिदशेन्द्रारिराजि वेगेन वीर्यवान् ॥ १४ ॥
भावार्थ
शङ्खोंकी ध्वनिके साथ मिली हुई भेरियोंकी भयानक आवाज सब ओर गूँज उठी । उस तुमुलनादके साथ इन्द्रद्रोही पराक्रमी इन्द्रजित्ने बड़े वेगसे रणभूमिकी ओर प्रस्थान किया ॥ १४ ॥
स शङ्खशशिवर्णेन छत्रेण रिपुसूदनः । रराज प्रतिपूर्णेन नभश्चन्द्रमसा यथा ॥ १५ ॥ वीज्यमानस्ततो वीरो हैमैर्हेमविभूषणः । चारुचामरमुख्यैश्च मुख्यः सर्वधनुष्मताम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
जैसे पूर्ण चन्द्रमासे उपलक्षित आकाशकी शोभा होती है, उसी प्रकार ऊपर तने हुए शङ्ख और शशिके समान वर्णवाले श्वेत छत्रसे वह शत्रुसूदन इन्द्रजित् सुशोभित हो रहा था ॥ सोनेके आभूषणोंसे विभूषित और समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ उस वीर निशाचरको दोनों ओरसे सुवर्णनिर्मित उत्तम एवं मनोहर चँवर डुलाये जा रहे थे ॥ १६ ॥
स तु दृष्ट्वा विनिर्यान्तं बलेन महता वृतम् । राक्षसाधिपतिः श्रीमान् रावणः पुत्रमब्रवीत् ॥ १७ ॥
भावार्थ
विशाल सेनासे घिरे हुए अपने पुत्र इन्द्रजित्को प्रस्थान करते देख राक्षसोंके राजा श्रीमान् रावणने उससे कहा—॥१७॥
त्वमप्रतिरथः पुत्र त्वया वै वासवो जितः । किं पुनर्मानुषं धृष्यं निहनिष्यसि राघवम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘बेटा ! कोई भी ऐसा प्रतिद्वन्द्वी रथी नहीं है, जो तुम्हारा सामना कर सके । तुमने देवराज इन्द्रको भी पराजित किया है । फिर आसानीसे जीत लेने योग्य एक मनुष्यको परास्त करना तुम्हारे लिये कौन बड़ी बात है ? तुम अवश्य ही रघुवंशी रामका वध करोगे’ ॥ १८ ॥
तथोक्तो राक्षसेन्द्रेण प्रत्यगृह्णान्महाशिषः । ततस्त्विन्द्रजिता लङ्का सूर्यप्रतिमतेजसा ॥ १९ ॥ रराजाप्रतिवीर्येण चौरिवार्केण भास्वता ।
भावार्थ
राक्षसराजके ऐसा कहनेपर इन्द्रजित्ने उसके उस महान् आशीर्वादको सिर झुकाकर ग्रहण किया । फिर तो जैसे अनुपम तेजस्वी सूर्यसे आकाशकी शोभा होती है, उसी प्रकार अप्रतिम शक्तिशाली और सूर्यतुल्य तेजस्वी इन्द्रजित्से लङ्कापुरी सुशोभित होने लगी ॥ १९½ ॥
स सम्प्राप्य महातेजा युद्धभूमिमरिंदमः ॥ २० ॥ स्थापयामास रक्षांसि रथं प्रति समन्ततः ।
भावार्थ
महातेजस्वी शत्रुदमन इन्द्रजित्ने रणभूमिमें पहुँचकर अपने रथके चारों ओर राक्षसोंको खड़ा कर दिया ॥ २०½ ॥
ततस्तु हुतभोक्तारं हुतभुक्सदृशप्रभः ॥ २१ ॥ जुहुवे राक्षसश्रेष्ठो विधिवन्मन्त्रसत्तमैः । स हविर्लाजसत्कारैर्माल्यगन्धपुरस्कृतैः ॥ २२ ॥ जुहुवे पावकं तत्र राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ।
भावार्थ
फिर बीचमें रथसे उतरकर पृथ्वीपर अग्निकी स्थापना करके अग्नितुल्य तेजस्वी उस राक्षसशिरोमणि वीरने चन्दन, फूल तथा लावा आदिके द्वारा अग्निदेवका पूजन किया । उसके बाद उस प्रतापी राक्षसराजने विधिपूर्वक श्रेष्ठ मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए उस अग्निमें हविष्यकी आहुति दी२१-२२½
शस्त्राणि शरपत्राणि समिधोऽथ बिभीतकाः ॥ २३ ॥ लोहितानि च वासांसि स्रुवं कार्ष्णायसं तथा ।
भावार्थ
उस समय शस्त्र ही अग्निवेदीके चारों ओर बिछानेके लिये कुश या कासके पत्ते थे । बहेड़ेकी लकड़ीसे ही समिधा-का काम लिया गया था । लाल रंगके वस्त्र उपयोगमें लाये गये और उस आभिचारिक यज्ञमें जो स्रुवा था, वह लोहेका बना हुआ था ॥ २३½ ॥
स तत्राग्निं समास्तीर्य शरपत्रैः सतोमरैः ॥ २४ ॥ छागस्य कृष्णवर्णस्य गलं जग्राह जीवतः ।
भावार्थ
उसने वहाँ तोमरसहित शस्त्ररूपी कासके पत्तोंको अग्निके चारों ओर फैलाकर होमके लिये काले रंगके जीवित बकरेका गला पकड़ा ॥ २४½ ॥
सकृदेव समिद्धस्य विधूमस्य महार्चिषः ॥ २५ ॥ बभूवुस्तानि लिङ्गानि विजयं यान्यदर्शयन् ।
भावार्थ
एक ही बार दी हुई उस आहुतिसे अग्नि प्रज्वलित हो उठी । उसमें धूम नहीं दिखायी देता था और आगकी बड़ी-बड़ी लपटें उठ रही थीं । उस समय उस अग्निसे वे सभी चिह्न प्रकट हुए, जो पूर्वकालमें उसे अपनी विजय दिखा चुके थे— युद्धस्थलमें उसको विजयकी प्राप्ति करा चुके थे ॥ २५½ ॥
प्रदक्षिणावर्तशिखस्तप्तकाञ्चनसंनिभः ॥ २६ ॥ हविस्तत् प्रतिजग्राह पावकः स्वयमुत्थितः ।
भावार्थ
अग्निदेवकी शिखा दक्षिणावर्त दिखायी देने लगी । उनका वर्ण तपाये हुए सुवर्णके समान सुन्दर था । इस रूपमें वे स्वयं प्रकट होकर उसके दिये हुए हविष्यको ग्रहण कर रहे थे ॥ २६½ ॥
सोऽस्त्रमाहारयामास ब्राह्ममस्त्रविशारदः ॥ २७ ॥ धनुश्चात्मरथं चैव सर्वं तत्राभ्यमन्त्रयत् ।
भावार्थ
तदनन्तर अस्त्रविद्याविशारद इन्द्रजित्ने ब्रह्मास्त्रका आवाहन किया और अपने धनुष तथा रथ आदि सब वस्तुओंको वहाँ सिद्ध ब्रह्मास्त्रमन्त्रसे अभिमन्त्रित किया ॥ २७½ ॥
तस्मिन्नाहूयमानेऽस्त्रे ह्रूयमाने च पावके । सार्कग्रहेन्दुनक्षत्रं वितत्रास नभस्थलम् ॥ २८ ॥
भावार्थ
जब अग्निमें आहुति देकर उसने ब्रह्मास्त्रका आवाहन किया, तब सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह तथा नक्षत्रोंके साथ अन्तरिक्ष-लोकके सभी प्राणी भयभीत हो गये ॥ २८ ॥
स पावकं पावकदीप्ततेजा हुत्वा महेन्द्रप्रतिमप्रभावः । सचापबाणासिरथाश्वसूतः खेऽन्तर्दधेऽऽत्मानमचिन्त्यवीर्यः ॥ २९ ॥
भावार्थ
जिसका तेज अग्निके समान उद्दीत हो रहा था तथा जो देवराज इन्द्रके समान अनुपम प्रभावसे युक्त था; उस अचिन्त्य पराक्रमी इन्द्रजित्ने अग्निमें आहुति देनेके पश्चात् धनुष, बाण, रथ, खड्ग, घोड़े और सारथिसहित अपने-आपको आकाशमें अदृश्य कर लिया ॥ २९ ॥
ततो हयरथाकीर्णं पताकाध्वजशोभितम् । निर्ययौ राक्षसबलं नर्दमानं युयुत्सया ॥ ३० ॥
भावार्थ
इसके बाद वह घोड़े और रथोंसे व्याप्त तथा ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित राक्षससेनामें गया, जो युद्धकी इच्छासे गर्जना कर रही थी ॥ ३० ॥
ते शरैर्बहुभिश्चित्रैस्तीक्ष्णवेगैरलंकृतैः । तोमरैरङ्कुशैश्चापि वानराञ्छन्वुराहवे ॥ ३१ ॥
भावार्थ
वे राक्षस दुःसह वेगवाले, सुवर्णभूषित, विचित्र एवं बहुसंख्यक बाणों, तोमरों और अङ्कुशोंद्वारा रणभूमिमें वानरोंपर प्रहार कर रहे थे ॥ ३१ ॥
रावणिस्तु सुसंकुद्ध स्तान् निरीक्ष्य निशाचरान् । हृष्टा भवन्तो युध्यन्तु वानराणां जिघांसया ॥ ३२ ॥
भावार्थ
रावणपुत्र इन्द्रजित् शत्रुओंके प्रति अत्यन्त क्रोधसे भरा हुआ था । उसने निशाचरोंकी ओर देखकर कहा— ‘तुम लोग वानरोंको मार डालनेकी इच्छासे हर्ष और उत्साहपूर्वक युद्ध करो’ ॥ ३२ ॥
ततस्ते राक्षसाः सर्वे गर्जन्तो जयकाङ्क्षिणः । अभ्यवर्षंस्ततो घोरं वानराञ्शरवृष्टिभिः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
उसके इस प्रकार प्रेरणा देनेपर विजयकी अभिलाषा रखनेवाले वे समस्त राक्षस जोर-जोरसे गर्जना करते हुए वहाँ वानरोंपर बाणोंकी भयंकर वर्षा करने लगे ॥ ३३ ॥
स तु नालीकनारा चैर्गदाभिर्मुसलैरपि । रक्षोभिः संवृतः संख्ये वानरान् विचकर्ष ह ॥ ३४ ॥
भावार्थ
उस युद्धस्थलमें राक्षसोंसे घिरे रहकर इन्द्रजित्ने भी नालीक, नाराच, गदा और मुसल आदि अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा वानरोंका संहार आरम्भ किया ॥ ३४ ॥
ते वध्यमानाः समरे वानराः पादपायुधाः । अभ्यवर्षन्त सहसा रावणिं शैलपादपैः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
समराङ्गणमें उसके अस्त्र-शस्त्रोंसे घायल होनेवाले वानर भी जो वृक्षोंसे ही हथियारका काम लेते थे, सहसा रावणकुमारपर शैल-शिखरों और वृक्षोंकी वर्षा करने लगे ॥ ३५ ॥
इन्द्रजित् तु तदा क्रुद्धो महातेजा महाबलः । वानराणां शरीराणि व्यधमद् रावणात्मजः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
उस समय कुपित हुए महातेजस्वी महाबली रावणपुत्र इन्द्रजित्ने वानरोंके शरीरोंको छिन्न-भिन्न कर डाला ॥ ३६ ॥
शरेणैकेन च हरीन् नव पञ्च च सप्त च । विभेद समरे क्रुद्धो राक्षसान् सम्प्रहर्षयन् ॥ ३७ ॥
भावार्थ
रणभूमिमें राक्षसोंका हर्ष बढ़ाता हुआ इन्द्रजित् रोषसे भरकर एक-एक बाणसे पाँच-पाँच, सात-सात तथा नौ-नौ वानरोंको विदीर्ण कर डालता था ॥ ३७ ॥
स शरैः सूर्यसंकाशैः शातकुम्भविभूषणैः । वानरान् समरे वीरः प्रममाथ सुदुर्जयः ॥ ३८ ॥
भावार्थ
उस अत्यन्त दुर्जय वीरने सुवर्णभूषित सूर्यतुल्य तेजस्वी सायकोंद्वारा समरभूमिमें वानरोंको मथ डाला ॥ ३८ ॥
ते भिन्नगात्राः समरे वानराः शरपीडिताः । पेतुर्मथितसंकल्पाः सुरैरिव महासुराः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
रणक्षेत्रमें देवताओंद्वारा पीड़ित हुए बड़े-बड़े असुरोंकी भाँति इन्द्रजित्के बाणोंसे व्यथित हुए वानरोंके शरीर छिन्न-भिन्न हो गये । उनकी विजयकी आशापर तुषारपात हो गया और वे अचेत-से होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३९ ॥
ते तपन्तमिवादित्यं घोरैर्बाणगभस्तिभिः । अभ्यधावन्त संक्रुद्धाः संयुगे वानरर्षभाः ॥ ४० ॥
भावार्थ
उस समय युद्धस्थलमें बाणरूपी भयंकर किरणोंद्वारा सूर्यके समान तपते हुए इन्द्रजित्पर प्रधान-प्रधान वानरोंने बड़े रोषके साथ धावा किया ॥ ४० ॥
ततस्तु वानराः सर्वे भिन्नदेहा विचेतसः । व्यथिता विद्रवन्ति स्म रुधिरेण समुक्षिताः ॥ ४१ ॥
भावार्थ
परंतु उसके बाणोंसे शरीरके क्षत-विक्षत हो जानेसे वे सब वानर अचेत-से हो गये और खूनसे लथपथ हो व्यथित होकर इधर-उधर भागने लगे ॥ ४१ ॥
रामस्यार्थे पराक्रम्य वानरास्त्यक्तजीविताः । नर्दन्तस्तेऽनिवृत्तास्तु समरे सशिलायुधाः ॥ ४२ ॥
भावार्थ
वानरोंने भगवान् श्रीरामके लिये अपने जीवनका मोह छोड़ दिया था । वे पराक्रमपूर्वक गर्जना करते हुए हाथमें शिलाएँ लिये समरभूमिमें डटे रहे—युद्धभूमिसे पीछे न हटे ॥ ४२ ॥
ते द्रुमैः पर्वताग्रैश्च शिलाभिश्च प्लवंगमाः । अभ्यवर्षन्त समरे रावणिं समवस्थिताः ॥ ४३ ॥
भावार्थ
समराङ्गणमें खड़े हुए वे वानर रावणकुमारपर वृक्षों, पर्वतशिखरों और शिलाओंकी वर्षा करने लगे ॥ ४३ ॥
तं द्रुमाणां शिलानां च वर्षं प्राणहरं महत् । व्यपोहत महातेजा रावणिः समितिंजयः ॥ ४४ ॥
भावार्थ
वृक्षों और शिलाओंकी वह भारी वृष्टि राक्षसोंके प्राण हर लेनेवाली थी; परंतु समरविजयी महातेजस्वी रावणपुत्रने अपने बाणोंद्वारा उसे दूर हटा दिया ॥ ४४ ॥
ततः पावकसंकाशैः शरैराशीविषोपमैः । वानराणामनीकानि बिभेद समरे प्रभुः ॥ ४५ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् विषधर सर्पोंके समान भयंकर और अग्नितुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा उस शक्तिशाली वीरने समराङ्गणमें वानरसैनिकोंको विदीर्ण करना आरम्भ किया ॥ ४५ ॥
अष्टादशशरैस्तीक्ष्णैः स विद्ध्वा गन्धमादनम् । विव्याध नवभिश्चैव नलं दूरादवस्थितम् ॥ ४६ ॥
भावार्थ
उसने अठारह तीखे बाणोंसे गन्धमादनको घायल करके दूर खड़े हुए नलपर भी नौ बाणोंका प्रहार किया ॥ ४६ ॥
सप्तभिस्तु महावीर्यो मैन्दं मर्मविदारणैः । पञ्चभिर्विशिखैश्चैव गजं विव्याध संयुगे ॥ ४७ ॥
भावार्थ
इसके बाद महापराक्रमी इन्द्रजित्ने सात मर्मभेदी सायकोंद्वारा मैन्दको और पाँच बाणोंसे गजको भी युद्धस्थलमें बींध डाला ॥ ४७ ॥
जाम्बवन्तं तु दशभिर्नीलं त्रिंशद्भिरेव च । सुग्रीवमृषभं चैव सोऽङ्गदं द्विविदं तथा ॥ ४८ ॥ घोरैर्दत्तवरैस्तीक्ष्णैर्निष्प्राणानकरोत् तदा ।
भावार्थ
फिर दस बाणोंसे जाम्बवान्को और तीस सायकोंसे नीलको घायल कर दिया । तदनन्तर वरदानमें प्राप्त हुए बहुसंख्यक तीखे और भयानक सायकोंका प्रहार करके उस समय उसने सुग्रीव, ऋषभ, अङ्गद और द्विविदको भी निष्प्राण-सा कर दिया ॥ ४८½ ॥
अन्यानपि तथा मुख्यान् वानरान् बहुभिः शरैः ॥ ४९ ॥ अर्दयामास संक्रुद्धः कालाग्निरिव मूर्च्छितः ।
भावार्थ
सब ओर फैली हुई प्रलयाग्निके समान अत्यन्त रोषसे भरे हुए इन्द्रजित्ने दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ वानरोंको भी बहुसंख्यक बाणोंकी मारसे व्यथित कर दिया ॥ ४९½ ॥
स शरैः सूर्यसंकाशैः सुमुक्तैः शीघ्रगामिभिः ॥ ५० ॥ वानराणामनीकानि निर्ममन्थ महारणे ।
भावार्थ
उस महासमरमें रावणकुमारने अच्छी तरह छोड़े हुए सूर्यतुल्य तेजस्वी शीघ्रगामी सायकोंद्वारा वानरोंकी सेनाओंको मथ डाला ॥ ५०½ ॥
आकुलां वानरीं सेनां शरजालेन पीडिताम् ॥ ५१ ॥ हृष्टः स परया प्रीत्या ददर्श क्षतजोक्षिताम् ।
भावार्थ
उसके बाणजालसे पीड़ित हो वानरी सेना व्याकुल हो उठी और रक्तसे नहा गयी । उसने बड़े हर्ष और प्रसन्नताके साथ शत्रुसेनाकी इस दुरवस्थाको देखा ॥ ५१½ ॥
पुनरेव महातेजा राक्षसेन्द्रात्मजो बली ॥ ५२ ॥ संसृज्य बाणवर्षं च शस्त्रवर्षं च दारुणम् । ममर्द वानरानीकं परितस्त्विन्द्रजित् बली ॥ ५३ ॥
भावार्थ
वह राक्षसराजकुमार इन्द्रजित् बड़ा तेजस्वी, प्रभावशाली एवं बलवान् था । उसने सब ओरसे बाणों तथा अन्यान्य अस्त्र-शस्त्रोंकी भयंकर वर्षा करके पुनः वानर-सेनाको रौंद डाला ॥ ५२-५३ ॥
स्वसैन्यमुत्सृज्य समेत्य तूर्ण महाहवे वानरवाहिनीषु । अदृश्यमानः शरजालमुग्रं ववर्ष नीलाम्बुधरो यथाम्बु ॥ ५४ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् वह अपनी सेनाके ऊपरी भागको छोड़कर उस महासमरमें तुरंत वानर-सेनाके ऊपर जा पहुँचा और स्वयं आकाशमें अदृश्य रहकर भयानक बाणसमूहकी उसी तरह वर्षा करने लगा, जैसे काला मेघ जलकी वृष्टि करता है ॥ ५४ ॥
ते शक्रजिद्बाणविशीर्णदेहा मायाहता विस्वरमुन्नदन्तः । रणे निपेतुर्हरयोऽद्रिकल्पा यथेन्द्रवज्राभिहता नगेन्द्राः ॥ ५५ ॥
भावार्थ
जैसे इन्द्रके वज्रसे आहत हो बड़े-बड़े पर्वत धराशायी हो जाते हैं, उसी प्रकार वे पर्वताकार वानर रणभूमिमें इन्द्रजित्के बाणोंद्वारा छलसे मारे जाकर शरीरके क्षत-विक्षत हो जानेसे विकृत स्वरमें चीखते-चिल्लाते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ५५ ॥
ते केवलं संदद्दशुः शितााग्रान् बाणान् रणे वानरवाहिनीषु । मायाविगूढं च सुरेन्द्रशत्रुं न चात्र तं राक्षसमप्यपश्यन् ॥ ५६ ॥
भावार्थ
रणभूमिमें वानर-सेनाओंपर जो पैनी धारवाले बाण गिर रहे थे, केवल उन्हींको वे वानर देख रहे थे । मायासे छिपे हुए उस इन्द्रद्रोही राक्षसको कहीं नहीं देख पाते थे ॥ ५६ ॥
ततः स रक्षोधिपतिर्महात्मा सर्वा दिशो बाणगणैः शिताग्रैः । प्रच्छादयामास रविप्रकाशै- र्विदारयामास च वानरेन्द्रान् ॥ ५७ ॥
भावार्थ
उस समय उस महाकाय राक्षसराजने तीखी धारवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी बाण-समूहोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको ढक दिया और वानर-सेनापतियोंको घायल कर दिया ॥ ५७ ॥
स शूलनिस्त्रिंशपरश्वधानि व्याविद्धदीप्तानलसप्रभाणि । सविस्फुलिङ्गोज्ज्वलपावकानि ववर्ष तीव्रं प्लवगेन्द्रसैन्ये ॥ ५८ ॥
भावार्थ
वह वानरराजकी सेनामें बढ़े हुए प्रज्वलित पावकके समान दीप्तिमान् तथा चिनगारियोंसहित उज्ज्वल आग प्रकट करनेवाले शूल, खड्ग और फरसोंकी दुःसह वृष्टि करने लगा ॥ ५८ ॥
ततो ज्वलनसंकाशैर्बाणैर्वानरयूथपाः । ताडिताः शक्रजिद्बाणैः प्रफुल्ला इव किंशुकाः ॥ ५९ ॥
भावार्थ
इन्द्रजित्के चलाये हुए अग्नितुल्य तेजस्वी बाणोंसे घायल हो रक्तसे नहाकर सारे वानर-यूथपति खिले हुए पलाश वृक्षके समान जान पड़ते थे ॥ ५९ ॥
तेऽन्योन्यमभिसर्पन्तो निनदन्तश्च विस्वरम् । राक्षसेन्द्रास्त्रनिर्भिन्ना निपेतुर्वानरर्षभाः ॥ ६० ॥
भावार्थ
राक्षसराज इन्द्रजित्के बाणोंसे विदीर्ण हो वे श्रेष्ठ वानर एक दूसरेके सामने जाकर विकृत स्वरमें चीत्कार करते हुए धराशायी हो जाते थे ॥ ६० ॥
उदीक्षमाणा गगनं केचिन्नेत्रेषु ताडिताः । शरैर्विशीर्णान्योन्यं पेतुश्च जगतीतले ॥ ६१ ॥
भावार्थ
कितने ही वानर आकाशकी ओर देख रहे थे । उसी समय उनके नेत्रोंमें बाणोंकी चोट लगी, अतः वे एक दूसरेके शरीरसे सट गये और पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ६१ ॥
हनूमन्तं च सुग्रीवमङ्गदं गन्धमादनम् । जाम्बवन्तं सुषेणं च वेगदर्शिनमेव च ॥ ६२ ॥ मैन्दं च द्विविदं नीलं गवाक्षं गवयं तथा । केसरिं हरिलोमानं विद्युद्दंष्ट्रं च वानरम् ॥ ६३ ॥ सूर्याननं ज्योतिर्मुखं तथा दधिमुखं हरिम् । पावकाक्षं नलं चैव कुमुदं चैव वानरम् ॥ ६४ ॥ प्रासैः शूलैः शितैर्बाणैरिन्द्रजिन्मन्त्रसंहितैः । विव्याध हरिशार्दूलान् सर्वांस्तान् राक्षसोत्तमः ॥ ६५ ॥
भावार्थ
राक्षसप्रवर इन्द्रजित्ने दिव्य मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित प्रासों, शूलों और पैने बाणोंद्वारा हनुमान्, सुग्रीव, अंगद, गन्धमादन, जाम्बवान्, सुषेण, वेगदर्शी, मैन्द, द्विविद, नील, गवाक्ष, गवय, केसरी, हरिलोमा, विद्युद्दंष्ट्र, सूर्यानन, ज्योतिर्मुख, दधिमुख, पावकाक्ष, नल और कुमुद आदि सभी श्रेष्ठ वानरोंको घायल कर दिया ॥ ६२–६५ ॥
स वै गदाभिर्हरियूथमुख्यान् निर्भिद्य बाणैस्तपनीयवर्णैः । ववर्ष रामं शरवृष्टिजालैः सलक्ष्मणं भास्कररश्मिकल्पैः ॥ ६६ ॥
भावार्थ
गदाओं और सुवर्णके समान कान्तिमान् बाणोंद्वारा वानर-यूथपतियोंको क्षत-विक्षत करके वह लक्ष्मणसहित श्रीरामपर सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगा ॥ ६६ ॥
स बाणवर्षैरभिवृष्यमाणो धारानिपातानिव तानचिन्त्य । समीक्षमाणः परमाद्भुतश्री रामस्तदा लक्ष्मणमित्युवाच ॥ ६७ ॥
भावार्थ
उस बाणवर्षाके लक्ष्य बने हुए परम अद्भुत शोभासे सम्पन्न श्रीराम पानीकी धाराके समान गिरनेवाले उन बाणोंकी कोई परवा न करके लक्ष्मणकी ओर देखते हुए बोले—॥ ६७ ॥
असौ पुनर्लक्ष्मण राक्षसेन्द्रो ब्रह्मास्त्रमाश्रित्य सुरेन्द्रशत्रुः । निपातयित्वा हरिसैन्यमस्रा- fिशितैः शरैरर्दयति प्रसक्तम् ॥ ६८ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! वह इन्द्रद्रोही राक्षसराज इन्द्रजित् प्राप्त हुए ब्रह्मास्त्रका सहारा लेकर वानर-सेनाको धराशायी करनेके पश्चात् अब तीखे बाणोंद्वारा हम दोनोंको भी पीड़ित कर रहा है ॥ ६८ ॥
स्वयंभुवा दत्तवरो महात्मा समाहितोऽन्तर्हितभीमकायः । कथं नु शक्यो युधि नष्टदेहो निहन्तुमद्येन्द्रजिदुद्यतास्त्रः ॥ ६९ ॥
भावार्थ
‘ब्रह्माजीसे वरदान पाकर सदा सावधान रहनेवाले इस महामनस्वी वीरने अपने भीषण शरीरको अदृश्य कर लिया है । युद्धमें इस इन्द्रजित्का शरीर तो दिखायी ही नहीं देता, पर यह अस्त्रोंका प्रयोग करता जा रहा है । ऐसी दशामें इसे हमलोग किस तरह मार सकते हैं ? ॥ ६९ ॥
मन्ये स्वयंभूर्भगवानचिन्त्य- स्तस्यैतदस्त्रं प्रभवश्च योऽस्य । बाणावपातं त्वमिहाद्य धीमन् मया सहाव्यग्रमनाः सहस्व ॥ ७० ॥
भावार्थ
‘स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माका स्वरूप अचिन्त्य है । वे ही इस जगत्के आदि कारण हैं । मैं समझता हूँ, उन्हींका यह अस्त्र है, अतः बुद्धिमान् सुमित्राकुमार ! तुम मनमें किसी प्रकारकी घबराहट न लाकर मेरे साथ यहाँ चुपचाप खड़े हो इन बाणोंं-की मार सहो ॥ ७० ॥
प्रच्छादयत्येष हि राक्षसेन्द्रः सर्वा दिशः सायकवृष्टिजालैः । एतच्च सर्वं पतिताग्र्यशूरं न भ्राजते वानरराजसैन्यम् ॥ ७१ ॥
भावार्थ
‘यह राक्षसराज इन्द्रजित् इस समय बाण-समूहोंकी वर्षा करके सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित किये देता है । वानरराज सुग्रीवकी यह सारी सेना, जिसके प्रधान-प्रधान शूरवीर धराशायी हो गये हैं, अब शोभा नहीं पा रही है ॥ ७१ ॥
आवां तु दृष्ट्वा पतितौ विसंज्ञौ निवृत्तयुद्धौ हतहर्षरोषौ । ध्रुवं प्रवेक्ष्यत्यमरारिवास- मसौ समासाद्य रणाग्र्यलक्ष्मीम् ॥ ७२ ॥
भावार्थ
‘जब हम दोनों हर्ष एवं रोषसे रहित तथा युद्धसे निवृत्त हो अचेत-से होकर गिर जायँगे; तब हमें उस अवस्थामें देख युद्धके मुहानेपर विजय-लक्ष्मीको पाकर अवश्य ही यह राक्षस-पुरी लङ्कामें लौट जायगा’ ॥ ७२ ॥
ततस्तु ताविन्द्रजितोऽस्त्रजालै- र्बभूवतुस्तत्र तदा विशस्तौ । स चापि तौ तत्र विषादयित्वा ननाद हर्षाद् युधि राक्षसेन्द्रः ॥ ७३ ॥
भावार्थ
तदनन्तर वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण वहाँ इन्द्रजित्के बाण-समूहोंसे बहुत घायल हो गये । उस समय उन दोनोंको युद्धमें पीड़ित करके उस राक्षसराजने बड़े हर्षके साथ गर्जना की ॥ ७३ ॥
ततस्तदा वानरसैन्यमेवं रामं च संख्ये सह लक्ष्मणेन । विषादयित्वा सहसा विवेश पुरीं दशाग्रीवभुजाभिगुप्ताम् । संस्तूयमानः स तु यातुधानैः पित्रे च सर्वं हृषितोऽभ्युवाच ॥ ७४ ॥
भावार्थ
इस प्रकार संग्राममें वानरोंकी सेना तथा लक्ष्मणसहित श्रीरामको मूर्छित करके इन्द्रजित् सहसा दशमुख रावणकी भुजाओंद्वारा पालित लङ्कापुरीमें चला गया । उस समय समस्त निशाचर उसकी स्तुति कर रहे थे । वहाँ जाकर उसने पितासे प्रसन्नतापूर्वक अपनी विजयका सारा समाचार बताया ॥ ७४ ॥
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