युद्धकाण्ड, सर्ग 61
ततो रामो महातेजा धनुरादाय वीर्यवान् । किरीटिनं महाकायं कुम्भकर्णं ददर्श ह ॥ १ ॥
भावार्थ
तदनन्तर हाथमें धनुष लेकर बल-विक्रमसे सम्पन्न महातेजस्वी श्रीरामने किरीटधारी महाकाय राक्षस कुम्भकर्णको देखा ॥ १ ॥
तं दृष्ट्वा राक्षसश्रेष्ठं पर्वताकारदर्शनम् । क्रममाणमिवाकाशं पुरा नारायणं यथा ॥ २ ॥ सतोयाम्बुदसंकाशं काञ्चनाङ्गदभूषणम् । दृष्ट्वा पुनः प्रदुद्राव वानराणां महाचमूः ॥ ३ ॥
भावार्थ
वह पर्वतके समान दिखायी देता था और राक्षसोंमें सबसे बड़ा था । जैसे पूर्वकालमें भगवान् नारायणने आकाशको नापनेके लिये डग भरे थे, उसी प्रकार वह भी डग बढ़ाता जा रहा था । सजल जलधरके समान काला कुम्भकर्ण सोनेके बाजूबन्दसे विभूषित था । उसे देखकर वानरोंकी वह विशाल सेना पुनः बड़े वेगसे भागने लगी ॥ २-३ ॥
विद्रुतां वाहिनीं दृष्ट्वा वर्धमानं च राक्षसम् । सविस्मितमिदं रामो विभीषणमुवाच ह ॥ ४ ॥
भावार्थ
अपनी सेनाको भागते तथा राक्षस कुम्भकर्णको बढ़ते देख श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने विभीषणसे पूछा—॥ ४ ॥
कोऽसौ पर्वतसंकाशः किरीटी हरिलोचनः । लङ्कायां दृश्यते वीरः सविद्युदिव तोयदः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘यह लङ्कापुरीमें पर्वतके समान विशालकाय वीर कौन है, जिसके मस्तकपर किरीट शोभा पाता है और नेत्र भूरे हैं ? यह ऐसा दिखायी देता है मानो बिजलीसहित मेघ हो ॥ ५ ॥
पृथिव्यां केतुभूतोऽसौ महानेकोऽत्र दृश्यते । यं दृष्ट्वा वानराः सर्वे विद्रवन्ति ततस्ततः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘इस भूतलपर यह एकमात्र महान् ध्वज-सा दृष्टिगोचर होता है । इसे देखकर सारे वानर इधर-उधर भाग चले हैं ॥ ६ ॥
आचक्ष्व सुमहान् कोऽसौ रक्षो वा यदि वासुरः । न मयैवंविधं भूतं दृष्टपूर्वं कदाचन ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘विभीषण ! बताओ । यह इतने बड़े डील-डौलका कौन पुरुष है ? कोई राक्षस है या असुर ? मैंने ऐसे प्राणीको पहले कभी नहीं देखा था’ ॥ ७ ॥
सम्पृष्टो राजपुत्रेण रामेणाक्लिष्टकर्मणा । विभीषणो महाप्राज्ञः काकुत्स्थमिदमब्रवीत् ॥ ८ ॥
भावार्थ
अनायास ही बड़े-बड़े कर्म करनेवाले राजकुमार श्रीरामने जब इस प्रकार पूछा, तब परम बुद्धिमान् विभीषणने उन ककुत्स्थकुलभूषण रघुनाथजीसे इस प्रकार कहा—॥ ८ ॥
येन वैवस्वतो युद्धे वासवश्च पराजितः । सैष विश्रवसः पुत्रः कुम्भकर्णः प्रतापवान् । अस्य प्रमाणसदृशो राक्षसोऽन्यो न विद्यते ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘भगवन् ! जिसने युद्धमें वैवस्वत यम और देवराज इन्द्रको भी पराजित किया था, वही यह विश्रवाका प्रतापी पुत्र कुम्भकर्ण है । इसके बराबर लंबा दूसरा कोई राक्षस नहीं है ॥ ९ ॥
एतेन देवा युधि दानवाश्च यक्षा भुजंगाः पिशिताशनाश्च । गन्धर्वविद्याधरकिन्नराश्च सहस्रशो राघव सम्प्रभग्नाः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! इसने देवता, दानव, यक्ष, नाग, राक्षस, गन्धर्व, विद्याधर और किन्नरोंको सहस्रों बार युद्धमें मार भगाया है ॥ १० ॥
शूलपाणिं विरूपाक्षं कुम्भकर्णं महाबलम् । हन्तुं न शेकुस्त्रिदशाः कालोऽयमिति मोहिताः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘इसके नेत्र बड़े भयंकर हैं । यह महाबली कुम्भकर्ण जब हाथमें शूल लेकर युद्धमें खड़ा हुआ, उस समय देवता भी इसे मारनेमें समर्थ न हो सके । यह कालरूप है, ऐसा समझकर वे सब-के-सब मोहित हो गये थे ॥ ११ ॥
प्रकृत्या ह्येष तेजस्वी कुम्भकर्णो महाबलः । अन्येषां राक्षसेन्द्राणां वरदानकृतं बलम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘कुम्भकर्ण स्वभावसे ही तेजस्वी और महाबलवान् है । अन्य राक्षसपतियोंके पास जो बल है, वह वरदानसे प्राप्त हुआ है ॥ १२ ॥
बालेन जातमात्रेण क्षुधार्तेन महात्मना । भक्षितानि सहस्राणि प्रजानां सुबहून्यपि ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘इस महाकाय राक्षसने जन्म लेते ही बाल्यावस्थामें भूखसे पीड़ित हो कई सहस्र प्रजाजनोंको खा डाला था ॥ १३ ॥
तेषु सम्भक्ष्यमाणेषु प्रजा भयनिपीडिताः । यान्ति स्म शरणं शक्रं तमप्यर्थे न्यवेदयन् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘जब सहस्रों प्रजाजन इसका आहार बनने लगे, तब भयसे पीड़ित हो वे सब-के-सब देवराज इन्द्रकी शरणमें गये और उन सबने उनके समक्ष अपना कष्ट निवेदन किया ॥१४॥
स कुम्भकर्ण कुपितो महेन्द्रो जघान वज्रेण शितेन वज्री । स शक्रवज्राभिहतो महात्मा चचाल कोपाच्च भृशं ननाद ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘इससे वज्रधारी देवराज इन्द्रको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने अपने तीखे वज्रसे कुम्भकर्णको घायल कर दिया । इन्द्रके वज्रकी चोट खाकर यह महाकाय राक्षस क्षुब्ध हो उठा और रोषपूर्वक जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगा ॥ १५ ॥
तस्य नानद्यमानस्य कुम्भकर्णस्य रक्षसः । श्रुत्वा निनादं वित्रस्ताः प्रजा भूयो वितत्रसुः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘राक्षस कुम्भकर्णके बारंबार गर्जना करनेपर उसका भयंकर सिंहनाद सुनकर प्रजावर्गके लोग भयभीत हो और भी डर गये ॥ १६ ॥
ततः क्रुद्धो महेन्द्रस्य कुम्भकर्णो महाबलः । निष्कृष्यैरावताद् दन्तं जघानोरसि वासवम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘तदनन्तर कुपित हुए महाबली कुम्भकर्णने इन्द्रके ऐरावतके मुँहसे एक दाँत उखाड़ लिया और उसीसे देवेन्द्रकी छातीपर प्रहार किया ॥ १७ ॥
कुम्भकर्णप्रहारार्तो विजज्वाल स वासवः । ततो विषेदुः सहसा देवा ब्रह्मर्षिदानवाः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘कुम्भकर्णके प्रहारसे इन्द्र व्याकुल हो गये और उनके हृदयमें जलन होने लगी । यह देखकर सब देवता, ब्रह्मर्षि और दानव सहसा विषादमें डूब गये ॥ १८ ॥
प्रजाभिः सह शक्रश्च ययौ स्थानं स्वयंभुवः । कुम्भकर्णस्य दौरात्म्यं शशंसुस्ते प्रजापतेः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘तत्पश्चात् इन्द्र उन प्रजाजनोंके साथ ब्रह्माजीके धाममें गये । वहाँ जाकर उन सबने प्रजापतिके समक्ष कुम्भकर्णकी दुष्टताका विस्तारपूर्वक वर्णन किया ॥ १९ ॥
प्रजानां भक्षणं चापि देवानां चापि धर्षणम् । आश्रमध्वंसनं चापि परस्त्रीहरणं भृशम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘इसके द्वारा प्रजाके भक्षण, देवताओंके धर्षण (तिरस्कार), ऋषियोंके आश्रमोंके विध्वंस तथा परायी स्त्रियोंके बारंबार हरण होनेकी भी बात बतायी ॥ २० ॥
एवं प्रजा यदि त्वेष भक्षयिष्यति नित्यशः । अचिरेणैव कालेन शून्यो लोको भविष्यति ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘इन्द्रने कहा—‘भगवन् ! यदि यह नित्यप्रति इसी प्रकार प्रजाजनोंका भक्षण करता रहा तो थोड़े ही समयमें सारा संसार सूना हो जायगा’ ॥ २१ ॥
वासवस्य वचः श्रुत्वा सर्वलोकपितामहः । रक्षांस्यावाहयामास कुम्भकर्णं ददर्श ह ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘इन्द्रकी यह बात सुनकर सर्वलोकपितामह ब्रह्माने सब राक्षसोंको बुलाया और कुम्भकर्णसे भी भेंट की ॥ २२ ॥
कुम्भकर्ण समीक्ष्यैव वित्रास प्रजापतिः । कुम्भकर्णमथाश्वास्तः स्वयंभूरिदमब्रवीत् ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘कुम्भकर्णको देखते ही स्वयम्भू प्रजापति थर्रा उठे । फिर अपनेको सँभालकर वे उस राक्षससे बोले--॥ २३ ॥
ध्रुवं लोकविनाशाय पौलस्त्येनासि निर्मितः । तस्मात् त्वमद्यप्रभृति मृतकल्पः शयिष्यसे ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘‘कुम्भकर्ण ! निश्चय ही इस जगत्का विनाश करनेके लिये ही विश्रवाने तुझे उत्पन्न किया है; अतः मैं शाप देता हूँ, आजसे तू मुर्देके समान सोता रहेगा’ ॥ २४ ॥
ब्रह्मशापाभिभूतोऽथ निपपाताग्रतः प्रभोः । ततः परमसम्भ्रान्तो रावणो वाक्यमब्रवीत् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘ब्रह्माजीके शापसे अभिभूत होकर वह रावणके सामने ही गिर पड़ा । इससे रावणको बड़ी घबराहट हुई और उसने कहा—॥ २५ ॥
प्रवृद्धः काञ्चनो वृक्षः फलकाले निकृत्यते । न नप्तारं स्वकं न्याय्यं शप्तुमेवं प्रजापते ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘‘प्रजापते ! अपने द्वारा लगाया और बढ़ाया हुआ सुवर्ण-रूप फल देनेवाला वृक्ष फल देनेके समय नहीं काटा जाता है । यह आपका नाती है, इसे इस प्रकार शाप देना कदापि उचित नहीं है ॥ २६ ॥
न मिथ्यावचनश्च त्वं स्वप्स्यत्येव न संशयः । कालस्तु क्रियतामस्य शयने जागरे तथा ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘आपकी बात कभी झूठी नहीं होती, इसलिये अब इसे सोना ही पड़ेगा, इसमें संशय नहीं है; परंतु आप इसके सोने और जागनेका कोई समय नियत कर दें’ ॥ २७ ॥
रावणस्य वचः श्रुत्वा स्वयंभूरिदमब्रवीत् । शयिता ह्येष षण्मासमेकाहं जागरिष्यति ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘रावणका यह कथन सुनकर स्वयम्भू ब्रह्माने कहा—‘यह छः मासतक सोता रहेगा और एक दिन जगेगा ॥ २८ ॥
एकेनाह्ना त्वसौ वीरश्चरन् भूमिं बुभुक्षितः । व्यात्तास्यो भक्षयेल्लोकान् संवृद्ध इव पावकः ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘उस एक दिन ही यह वीर भूखा होकर पृथ्वीपर विचरेगा और प्रज्वलित अग्निके समान मुँह फैलाकर बहुत-से लोगोंको खा जायगा’ ॥ २९ ॥
सोऽसौ व्यसनमापन्नः कुम्भकर्णमबोधयत् । त्वत्पराक्रमभीतश्च राजा सम्प्रति रावणः ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘महाराज ! इस समय आपत्तिमें पड़कर और आपके पराक्रमसे भयभीत होकर राजा रावणने कुम्भकर्णको जगाया है ॥ ३० ॥
स एष निर्गतो वीरः शिबिराद् भीमविक्रमः । वानरान् भृशसंक्रुद्धो भक्षयन् परिधावति ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘यह भयानक पराक्रमी वीर अपने शिबिरसे निकला है और अत्यन्त कुपित हो वानरोंको खा जानेके लिये सब ओर दौड़ रहा है ॥ ३१ ॥
कुम्भकर्णं समीक्ष्यैव हरयोऽद्य प्रदुद्रुवुः । कथमेनं रणे क्रुद्धं वारयिष्यन्ति वानराः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘जब कुम्भकर्णको देखकर ही आज सारे वानर भाग चले, तब रणभूमिमें कुपित हुए इस वीरको ये आगे बढ़नेसे कैसे रोक सकेंगे ? ॥ ३२ ॥
उच्यन्तां वानराः सर्वे यन्त्रमेतत् समुच्छ्रितम् । इति विज्ञाय हरयो भविष्यन्तीह निर्भयाः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘सब वानरोंसे यह कह दिया जाय कि यह कोई व्यक्ति नहीं, कायाद्वारा निर्मित ऊँचा यन्त्रमात्र है । ऐसा जानकर वानर निर्भय हो जायँगे’ ॥ ३३ ॥
विभीषणवचः श्रुत्वा हेतुमत् सुमुखोद्गतम् । उवाच राघवो वाक्यं नीलं सेनापतिं तदा ॥ ३४ ॥
भावार्थ
विभीषणके सुन्दर मुखसे निकली हुई यह युक्तियुक्त बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने सेनापति नीलसे कहा—॥ ३४ ॥
गच्छ सैन्यानि सर्वाणि व्यूह्य तिष्ठस्व पावके । द्वाराण्यादाय लङ्कायाश्चर्यांश्चास्याथ संक्रमान् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘अग्निनन्दन ! जाओ, समस्त सेनाओंकी मोर्चेबंदी करके युद्धके लिये तैयार रहो और लङ्काके द्वारों तथा राजमार्गोंपर अधिकार जमाकर वहीं डटे रहो ॥ ३५ ॥
शैलशृङ्गाणि वृक्षांश्च शिलाश्चाप्युपसंहरन् । भवन्तः सायुधाः सर्वे वानराः शैलपाणयः ॥ ३६ ॥ राघवेण समादिष्टो नीलो हरिचमूपतिः । शशास वानरानीकं यथावत् कपिकुञ्जरः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘पर्वतोंके शिखर, वृक्ष और शिलाएँ एकत्र कर लो तथा तुम और सब वानर अस्त्र-शस्त्र एवं पत्थर लिये तैयार रहो’ ॥ श्रीरघुनाथजीकी यह आज्ञा पाकर वानरसेनापति कपिश्रेष्ठ नीलने वानरसैनिकोंको यथोचित कार्यके लिये आदेश दिया ॥ ३७ ॥
ततो गवाक्षः शरभो हनूमानङ्गदस्तथा । शैलशृङ्गाणि शैलाभा गृहीत्वा द्वारमभ्ययुः ॥ ३८ ॥
भावार्थ
तदनन्तर गवाक्ष, शरभ, हनुमान् और अङ्गद आदि पर्वताकार वानर पर्वतशिखर लिये लङ्काके द्वारपर डट गये ॥ ३८ ॥
रामवाक्यमुपश्रुत्य हरयो जितकाशिनः । पादपैर्दर्शयन् वीरा वानराः परवाहिनीम् ॥ ३९ ॥
भावार्थ
विजयोल्लाससे सुशोभित होनेवाले वीर वानर श्रीरामचन्द्रजीकी पूर्वोक्त आज्ञा सुनकर वृक्षोंद्वारा शत्रुसेनाको पीड़ित करने लगे ॥ ३९ ॥
ततो हरीणां तदनीकमुग्रं रराज शैलोद्यतवृक्षहस्तम् । गिरेः समीपानुगतं यथैव महन्महाम्भोधरजालमुग्रम् ॥ ४० ॥
भावार्थ
तदनन्तर हाथोंमें शैल-शिखर और वृक्ष लिये वानरोंकी वह भयंकर सेना पर्वतके समीप घिरी हुई मेघोंकी बड़ी भारी उग्र घटाके समान सुशोभित होने लगी ॥ ४० ॥
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