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युद्धकाण्ड, सर्ग 58

ततः प्रहस्तं निर्यान्तं दृष्ट्वा रणकृतोद्यमम् । उवाच सस्मितं रामो विभीषणमरिंदमः ॥ १ ॥

भावार्थ

( इसके पूर्व ) प्रहस्तको युद्धकी तैयारी करके लङ्कासे बाहर निकलते देख शत्रुसूदन श्रीरामचन्द्रजीने विभीषणसे मुस्कराकर कहा—॥ १ ॥

क एष सुमहाकायो बलेन महता वृतः । आगच्छति महावेगः किंरूपबलपौरुषः ॥ २ ॥ आचक्ष्व मे महाबाहो वीर्यवन्तं निशाचरम् ।

भावार्थ

‘महाबाहो ! यह बड़े शरीर और महान् वेगवाला तथा बड़ी भारी सेनासे घिरा हुआ कौन योद्धा आ रहा है ? इसका रूप, बल और पौरुष कैसा है ? इस पराक्रमी निशाचरका मुझे परिचय दो’ ॥ २½ ॥

राघवस्य वचः श्रुत्वा प्रत्युवाच विभीषणः ॥ ३ ॥ एष सेनापतिस्तस्य प्रहस्तो नाम राक्षसः । लङ्कायां राक्षसेन्द्रस्य त्रिभागबलसंवृतः । वीर्यवानस्त्रविच्छूरः सुप्रख्यातपराक्रमः ॥ ४ ॥

भावार्थ

श्रीरघुनाथजीका वचन सुनकर विभीषणने इस प्रकार उत्तर दिया—‘प्रभो ! इस राक्षसका नाम प्रहस्त है । यह राक्षसराज रावणका सेनापति है और लङ्काकी एक तिहाई सेनासे घिरा हुआ है । इसका पराक्रम भलीभाँति विख्यात है । यह नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञाता, बल-विक्रमसे सम्पन्न और शूरवीर है’ ॥ ३-४ ॥

ततः प्रहस्तं निर्यान्तं भीमं भीमपराक्रमम् । गर्जन्तं सुमहाकायं राक्षसैरभिसंवृतम् ॥ ५ ॥ ददर्श महती सेना वानराणां बलीयसाम् । अभिसंजातघोषाणां प्रहस्तमभिगर्जताम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

इसी समय महाबलवान् वानरोंकी विशाल सेनाने भी भयानक पराक्रमी, भीषण रूपधारी तथा महाकाय प्रहस्तको बड़े गर्जन-तर्जनके साथ लङ्कासे बाहर निकलते देखा । वह बहुसंख्यक राक्षसोंसे घिरा हुआ था । उसे देखते ही वानरोंके दलमें भी महान् कोलाहल होने लगा और वे प्रहस्तकी ओर देख-देखकर गर्जने लगे ॥ ५-६ ॥

खड्गशक्त्यृष्टिशूलाश्च बाणानि मुसलानि च । गदाश्च परिघाः प्रासा विविधाश्च परश्वधाः ॥ ७ ॥ धनूंषि च विचित्राणि राक्षसानां जयैषिणाम् । प्रगृहीतान्यराजन्त वानरानभिधावताम् ॥ ८ ॥

भावार्थ

विजयकी इच्छावाले राक्षस वानरोंकी ओर दौड़े । उनके हाथोंमें खड्ग, शक्ति, ऋष्टि, शूल, बाण, मुसल, गदा, परिघ, प्रास, नाना प्रकारके फरसे और विचित्र-विचित्र धनुष शोभा पा रहे थे ॥ ७-८ ॥

जगृहुः पादपांश्चापि पुष्पितांस्तु गिरींस्तथा । शिलाश्च विपुला दीर्घा योद्धुकामाः प्लवंगमाः ॥ ९ ॥

भावार्थ

तब वानरोंने भी युद्धकी इच्छासे खिले हुए वृक्ष, पर्वत तथा बड़े-बड़े पत्थर उठा लिये ॥ ९ ॥

तेषामन्योन्यमासाद्य संग्रामः सुमहानभूत् । बहूनामश्मवृष्टिं च शरवर्षं च वर्षताम् ॥ १० ॥ बहवो राक्षसा युद्धे बहून् वानरपुङ्गवान् । वानरा राक्षसांश्चापि निजघ्नुर्बहवो बहून् ॥ ११ ॥ शूलैः प्रमथिताः केचित् केचित् तु परमायुधैः । परिघैराहताः केचित् केचिच्छिन्नाः परश्वधैः ॥ १२ ॥

भावार्थ

फिर दोनों पक्षोंके बहुसंख्यक वीरोंमें पत्थरों और बाणोंकी वर्षाके साथ-साथ आपसमें बड़ा भारी संग्राम छिड़ गया ॥ उस युद्धस्थलमें बहुत-से राक्षसोंने बहुतेरे वानरोंका और बहुसंख्यक वानरोंने बहुत-से राक्षसोंका संहार कर डाला ॥ वानरोंमेंसे कोई शूलोंसे और कोई चक्रोंसे मथ डाले गये । कितने ही परिघोंकी मारसे आहत हो गये और कितनोंके फरसोंसे टुकड़े-टुकड़े कर डाले गये ॥ १२ ॥

निरुच्छ्वासाः पुनः केचित् पतिता जगतीतले । विभिन्नहृदयाः केचिदिषुसंधानसाधिताः ॥ १३ ॥

भावार्थ

कितने ही योद्धा साँसरहित हो पृथ्वीपर गिर पड़े और कितने ही बाणोंके लक्ष्य बन गये, जिससे उनके हृदय विदीर्ण हो गये ॥ १३ ॥

केचिद् द्विधा कृताः खड्गैः स्फुरन्तः पतिता भुवि। वानरा राक्षसैः शूरैः पार्श्वतश्च विदारिताः ॥ १४ ॥

भावार्थ

कितने ही वानर तलवारोंकी मारसे दो टूक होकर पृथ्वीपर गिर पड़े और तड़फड़ाने लगे । कितने ही शूरवीर राक्षसोंने वानरोंकी पसलियाँ फाड़ डालीं ॥ १४ ॥

वानरैश्चापि संक्रुद्धै राक्षसौघाः समन्ततः । पादपैर्गिरिशृङ्गैश्च सम्पिष्टा वसुधातले ॥ १५ ॥

भावार्थ

इसी तरह वानरोंने भी अत्यन्त कुपित हो वृक्षों और पर्वत-शिखरोंद्वारा सब ओर भूतलपर झुंड-के-झुंड राक्षसोंको पीस डाला ॥ १५ ॥

वज्रस्पर्शतलैर्हस्तैर्मुष्टिभिश्च हता भृशम् । वमञ्शोणितमास्येभ्यो विशीर्णदशनेक्षणाः ॥ १६ ॥

भावार्थ

वानरोंके वज्रतुल्य कठोर थप्पड़ों और मुक्कोंसे भलीभाँति पीटे गये राक्षस मुँहसे रक्त वमन करने लगे । उनके दाँत और नेत्र छिन्न-भिन्न होकर बिखर गये ॥ १६ ॥

आर्तस्वनं च स्वनतां सिंहनादं च नर्दताम् । बभूव तुमुलः शब्दो हरीणां रक्षसामपि ॥ १७ ॥

भावार्थ

कोई आर्तनाद करते तो कोई सिंहोंके समान दहाड़ते थे । इस प्रकार वानरों और राक्षसोंका भयंकर कोलाहल वहाँ सब ओर गूँज उठा ॥ १७ ॥

वानरा राक्षसाः क्रुद्धा वीरमार्गमनुव्रताः । विवृत्तवदनाः क्रूराश्चक्रुः कर्माण्यभीतवत् ॥ १८ ॥

भावार्थ

क्रोधसे भरे हुए वानर और राक्षस वीरोचित मार्गका अनुसरण करके युद्धमें पीठ नहीं दिखाते थे । वे मुँह बा-बाकर निर्भयके समान क्रूरतापूर्ण कर्म करते थे ॥ १८ ॥

नरान्तकः कुम्भहनुर्महानादः समुन्नतः । एते प्रहस्तसचिवाः सर्वे जघ्नुर्वनौकसः ॥ १९ ॥

भावार्थ

नरान्तक, कुम्भहनु, महानाद और समुन्नत—ये प्रहस्तके सारे सचिव वानरोंका वध करने लगे ॥ १९ ॥

तेषां निपततां शीघ्रं निघ्नतां चापि वानरान् । द्विविदो गिरिशृङ्गेण जघानैकं नरान्तकम् ॥ २० ॥

भावार्थ

शीघ्रतापूर्वक आक्रमण करते और वानरोंको मारते हुए प्रहस्तके सचिवोंमेंसे एकको, जिसका नाम नरान्तक था, द्विविदने एक पर्वतके शिखरसे मार डाला ॥ २० ॥

दुर्मुखः पुनरुत्थाय कपिः सविपुलं द्रुमम् । राक्षसं क्षिप्रहस्तं तु समुन्नतमपोथयत् ॥ २१ ॥

भावार्थ

फिर दुर्मुखने एक विशाल वृक्ष लिये उठकर शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले राक्षस समुन्नतको कुचल डाला ॥२१॥

जाम्बवांस्तु सुसंक्रुद्धः प्रगृह्य महतीं शिलाम् । पातयामास तेजस्वी महानादस्य वक्षसि ॥ २२ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् अत्यन्त कुपित हुए तेजस्वी जाम्बवान्ने एक बड़ी भारी शिला उठा ली और उसे महानादकी छातीपर दे मारा ॥ २२ ॥

अथ कुम्भहनुस्तत्र तारेणासाद्य वीर्यवान् । वृक्षेण महता सद्यः प्राणान् संत्याजयद् रणे ॥ २३ ॥

भावार्थ

बाकी रहा पराक्रमी कुम्भहनु । वह तार नामक वानरसे भिड़ा और अन्तमें एक विशाल वृक्षकी चपेटमें आकर उसे भी रणभूमिमें अपने प्राणोंसे हाथ धोने पड़े ॥ २३ ॥

अमृष्यमाणस्तत्कर्म प्रहस्तो रथमास्थितः । चकार कदनं घोरं धनुष्पाणिर्वनौकसाम् ॥ २४ ॥

भावार्थ

रथपर बैठे हुए प्रहस्तसे वानरोंका यह अद्भुत पराक्रम नहीं सहा गया । उसने हाथमें धनुष लेकर वानरोंका घोर संहार आरम्भ किया ॥ २४ ॥

आवर्त इव संजज्ञे सेनयोरुभयोस्तदा । क्षुभितस्याप्रमेयस्य सागरस्येव निःस्वनः ॥ २५ ॥

भावार्थ

उस समय दोनों सेनाएँ जलके भँवरकी भाँति चक्कर काट रही थीं । विक्षुब्ध अपार महासागरकी गर्जनाके समान उनकी गर्जना सुनायी दे रही थी ॥ २५ ॥

महता हि शरौघेण राक्षसो रणदुर्मदः । अर्दयामास संक्रुद्धो वानरान् परमाहवे ॥ २६ ॥

भावार्थ

अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए रणदुर्मद राक्षस प्रहस्तने अपने बाण-समूहोंद्वारा उस महासमरमें वानरोंको पीड़ित करना आरम्भ किया ॥ २६ ॥

वानराणां शरीरैस्तु राक्षसानां च मेदिनी । बभूवातिचिता घोरैः पर्वतैरिव संवृता ॥ २७ ॥

भावार्थ

पृथ्वीपर वानरों और राक्षसोंकी लाशोंके ढेर लग गये । उनसे आच्छादित हुई रणभूमि भयानक पर्वतोंसे ढकी हुई-सी जान पड़ती थी ॥ २७ ॥

सा मही रुधिरौघेण प्रच्छन्ना सम्प्रकाशते । संछन्ना माधवे मासि पलाशैरिव पुष्पितैः ॥ २८ ॥

भावार्थ

रक्तके प्रवाहसे आच्छादित हुई वह युद्धभूमि वैशाख-मासमें खिले हुए पलाश-वृक्षोंसे ढकी हुई वन्य भूमि-सी सुशोभित होती थी ॥ २८ ॥

हतवीरौघवप्रां तु भग्नायुधमहाद्रुमाम् । शोणितौघमहातोयां यमसागरगामिनीम् ॥ २९ ॥ यकृत्प्लीहमहापङ्कां विनिकीर्णान्त्रशैवलाम् । भिन्नकायशिरोमीनामङ्गावयवशाद्वलाम् ॥ ३० ॥ गृध्रहंसवराकीर्णां कङ्कसारससेविताम् । मेदःफेनसमाकीर्णामार्तस्तनितनिःस्वनाम् ॥ ३१ ॥ तां कापुरुषदुस्तारां युद्धभूमिमयीं नदीम् । नदीमिव घनापाये हंससारससेविताम् ॥ ३२ ॥ राक्षसाः कपिमुख्यास्ते तेरुस्तां दुस्तरां नदीम् । यथा पद्मरजोध्वस्तां नलिनीं गजयूथपाः ॥ ३३ ॥ ततः सृजन्तं बाणौघान् प्रहस्तं स्यन्दने स्थितम् । ददर्श तरसा नीलो विधमन्तं प्लवंगमान् ॥ ३४ ॥ उद्धूत इव वायुः खे महदभ्रबलं बलात् । समीक्ष्याभिद्रुतं युद्धे प्रहस्तो वाहिनीपतिः ॥ ३५ ॥ रथेनादित्यवर्णेन नीलमेवाभिदुद्रुवे ।

भावार्थ

मारे गये वीरोंकी लाशें ही जिसके दोनों तट थे । रक्तका प्रवाह ही जिसकी महान् जलराशि थी । टूटे-फूटे अस्त्र-शस्त्र ही जिसके तटवर्ती विशाल वृक्षोंके समान जान पड़ते थे । जो यमलोकरूपी समुद्रसे मिली हुई थी । सैनिकोंके यकृत् और प्लीहा ( हृदयके दाहिने और बायें भाग ) जिसके महान् पंक थे । निकली हुई आँतें जहाँ सेवारका काम देती थीं । कटे हुए सिर और धड़ जहाँ मत्स्य-से प्रतीत होते थे । शरीरके छोटे-छोटे अवयव एवं केश जिसमें घासका भ्रम उत्पन्न करते थे । जहाँ गीध ही हंस बनकर बैठे थे । कङ्करूपी सारस जिसका सेवन करते थे । मेदे ही फेन बनकर जहाँ सब ओर फैले थे । पीड़ितोंकी कराह जिसकी कलकल ध्वनि थी और कायरोंके लिये जिसे पार करना अत्यन्त कठिन था, उस युद्ध-भूमिरूपिणी नदीको प्रवाहित करके राक्षस और श्रेष्ठ वानर वर्षाके अन्तमें हंसों और सारसोंसे सेवित सरिताकी भाँति उस दुस्तर नदीको उसी तरह पार कर रहे थे, जैसे गजयूथपति कमलोंके परागसे आच्छादित किसी पुष्करिणीको पार करते हैं ॥ तदनन्तर नीलने देखा, रथपर बैठा हुआ प्रहस्त बाण-समूहोंकी वर्षा करके वेगपूर्वक वानरोंका संहार कर रहा है ॥ तब जैसे उठी हुई प्रचण्ड वायु आकाशमें महान् मेघोंकी घटाको छिन्न-भिन्न करके उड़ा देती है, उसी प्रकार नील भी बलपूर्वक राक्षस-सेनाका संहार करने लगे । इससे उस युद्धस्थलमें राक्षसी सेना भाग खड़ी हुई । सेनापति प्रहस्तने जब अपनी सेनाकी ऐसी दुरवस्था देखी, तब उसने सूर्यतुल्य तेजस्वी रथके द्वारा नीलपर ही धावा किया ॥ ३५½ ॥

स धनुर्धन्विनां श्रेष्ठो विक्रृष्य परमाहवे ॥ ३६ ॥ नीलाय व्यसृजद् वाणान् प्रहस्तो वाहिनीपतिः ।

भावार्थ

धनुषधारियोंमें श्रेष्ठ और निशाचरोंकी सेनाके नायक प्रहस्तने उस महासमरमें अपने धनुषको खींचकर नीलपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ३६½ ॥

ते प्राप्य विशिखा नीलं विनिर्भिद्य समाहिताः ॥ ३७ ॥ महीं जग्मुर्महावेगा रोषिता इव पन्नगाः ।

भावार्थ

रोषसे भरे हुए सर्पोंके समान वे महान् वेगशाली बाण नीलतक पहुँचकर उन्हें विदीर्ण करके बड़ी सावधानीके साथ धरतीमें समा गये ॥ ३७½ ॥

नीलः शरैरभिहतो निशितैर्ज्वलनोपमैः ॥ ३८ ॥ स तं परमदुर्धर्षमापतन्तं महाकपिः । प्रहस्तं ताडयामास वृक्षमुत्पाट्य वीर्यवान् ॥ ३९ ॥

भावार्थ

प्रहस्तके पैने बाण प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ते थे । उनकी चोटसे नील बहुत घायल हो गये । इस तरह उस परम दुर्जय राक्षस प्रहस्तको अपने ऊपर आक्रमण करते देख बल-विक्रमशाली महाकपि नीलने एक पेड़ उखाड़कर उसीके द्वारा उसपर आघात किया ॥ ३८-३९ ॥

स तेनाभिहतः क्रुद्धो नर्दन् राक्षसपुंगवः । ववर्ष शरवर्षाणि प्लवंगानां चमूपतौ ॥ ४० ॥

भावार्थ

नीलकी चोट खाकर कुपित हुआ राक्षसशिरोमणि प्रहस्त बड़े जोरसे गर्जता हुआ उन वानर-सेनापतिपर बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ ४० ॥

तस्य बाणगणानेव राक्षसस्य दुरात्मनः । अपारयन् वारयितुं प्रत्यगृह्णान्निमीलितः । यथैव गोवृषो वर्षं शारदं शीघ्रमागतम् ॥ ४१ ॥ एवमेव प्रहस्तस्य शरवर्षान् दुरासदान् । निमीलिताक्षः सहसा नीलः सेहे दुरासदान् ॥ ४२ ॥

भावार्थ

उस दुरात्मा राक्षसके बाण-समूहोंका निवारण करनेमें समर्थ न हो सकनेपर नील आँख बंद करके उन सब बाणोंको अपने अङ्गोंपर ही ग्रहण करने लगे । जैसे साँड़ सहसा आयी हुई शरद्-ऋतुकी वर्षाको चुपचाप अपने शरीरपर ही सह लेता है, उसी प्रकार प्रहस्तकी उस दुःसह बाणवर्षाको नील चुपचाप नेत्र बंद करके सहन करते रहे ॥ ४१-४२ ॥

रोषितः शरवर्षेण सालेन महता महान् । प्रजघान हयान् नीलः प्रहस्तस्य महाबलः ॥ ४३ ॥ ततो रोषपरीतात्मा धनुस्तस्य दुरात्मनः । बभञ्ज तरसा नीलो ननाद च पुनः पुनः ॥ ४४ ॥ विधनुः स कृतस्तेन प्रहस्तो वाहिनीपतिः । प्रगृह्य मुसलं घोरं स्यन्दनादवपुप्लुवे ॥ ४५ ॥

भावार्थ

प्रहस्तकी बाणवर्षासे कुपित हो महाबली महाकपि नीलने एक विशाल सालवृक्षके द्वारा उसके घोड़ोंको मार डाला ॥ तत्पश्चात् रोषसे भरे हुए नीलने उस दुरात्माके धनुषको भी वेगपूर्वक तोड़ दिया और बारंबार वे गर्जना करने लगे ॥ नीलके द्वारा धनुषरहित किया गया सेनापति प्रहस्त एक भयानक मुसल हाथमें लेकर अपने रथसे कूद पड़ा ॥ ४५ ॥

तावुभौ वाहिनीमुख्यौ जातवैरौ तरस्विनौ । स्थितौ क्षतजसिक्ताङ्गौ प्रभिन्नाविव कुञ्जरौ ॥ ४६ ॥

भावार्थ

वे दोनों वीर अपनी-अपनी सेनाके प्रधान थे । दोनों ही एक दूसरेके वैरी और वेगशाली थे । वे मदकी धारा बहानेवाले दो गजराजोंके समान खूनसे नहा उठे थे ॥ ४६ ॥

उल्लिखन्तौ सुतीक्ष्णाभिर्दंष्ट्राभिरितरेतरम् । सिंहशार्दूलसदृशौ सिंहशार्दूलचेष्टितौ ॥ ४७ ॥ विक्रान्तविजयौ वीरौ समरेष्वनिवर्तिनौ । काङ्क्षमाणौ यशः प्राप्तुं वृत्रवासवयोरिव ॥ ४८ ॥

भावार्थ

दोनों ही अपनी तीखी दाढ़ोंसे काट-काटकर एक-दूसरेके अङ्गोंको घायल किये देते थे । वे दोनों सिंह और बाघके समान शक्तिशाली और उन्हींके समान विजयके लिये सचेष्ट थे ॥ दोनों वीर पराक्रमी, विजयी और युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले थे तथा वृत्रासुर और इन्द्रके समान युद्धमें यश पानेकी अभिलाषा रखते थे ॥ ४८ ॥

आजघान तदा नीलं ललाटे मुसलेन सः । प्रहस्तः परमायत्तस्ततः सुस्राव शोणितम् ॥ ४९ ॥ ततः शोणितदिग्धाङ्गः प्रगृह्य च महातरुम् । प्रहस्तस्योरसि क्रुद्धो विससर्ज महाकपिः ॥ ५० ॥

भावार्थ

उस समय परम उद्योगी प्रहस्तने नीलके ललाटमें मुसलसे आघात किया । इससे उनके ललाटसे रक्तकी धारा बह चली ॥ उनके सारे अङ्ग रक्तसे भीग गये । तब क्रोधसे भरे हुए महाकपि नीलने एक विशाल वृक्ष उठाकर प्रहस्तकी छातीपर दे मारा ॥ ५० ॥

तमचिन्त्यप्रहारं स प्रगृह्य मुसलं महत् । अभिदुद्राव बलिनं बलान्नीलं प्लवंगमम् ॥ ५१ ॥ तमुग्रवेगं संरब्धमापतन्तं महाकपिः । ततः सम्प्रेक्ष्य जग्राह महावेगो महाशिलाम् ॥ ५२ ॥

भावार्थ

उस प्रहारकी कोई परवा न करके प्रहस्त महान् मुसल हाथमें लिये बलवान् वानर नीलकी ओर बड़े वेगसे दौड़ा ॥ उस भयंकर वेगशाली राक्षसको रोषसे भरकर आक्रमण करते देख महान् वेगशाली महाकपि नीलने एक बड़ी भारी शिला हाथमें ले ली ॥ ५२ ॥

तस्य युद्धाभिकामस्य मृधे मुसलयोधिनः । प्रहस्तस्य शिलां नीलो मूर्ध्नि तूर्णमपातयत् ॥ ५३ ॥ नीलेन कपिमुख्येन विमुक्ता महती शिला । बिभेद बहुधा घोरा प्रहस्तस्य शिरस्तदा ॥ ५४ ॥

भावार्थ

उस शिलाको नीलने रणभूमिमें संग्रामकी इच्छावाले मुसलयोधी निशाचर प्रहस्तके मस्तकपर तत्काल दे मारा ॥ कपिप्रवर नीलके द्वारा चलायी गयी उस भयंकर एवं विशाल शिलाने प्रहस्तके मस्तकको कुचलकर उसके कई टुकड़े कर डाले ॥ ५४ ॥

स गतासुर्गतश्रीको गतसत्त्वो गतेन्द्रियः । पपात सहसा भूमौ छिन्नमूल इव द्रुमः ॥ ५५ ॥

भावार्थ

उसके प्राण-पखेरू उड़ गये । उसकी कान्ति, उसका बल और उसकी सारी इन्द्रियाँ भी चली गयीं । वह राक्षस जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ५५ ॥

विभिन्नशिरसस्तस्य बहु सुस्राव शोणितम् । शरीरादपि स्रुस्राव गिरेः प्रस्रवणं यथा ॥ ५६ ॥ हते प्रहस्ते नीलेन तदकम्प्यं महावलम् । राक्षसानामहृष्टानां लङ्कामभिजगाम ह ॥ ५७ ॥

भावार्थ

उसके छिन्न-भिन्न हुए मस्तकसे और शरीरसे भी बहुत खून गिरने लगा, मानो पर्वतसे पानीका झरना झर रहा हो ॥ नीलके द्वारा प्रहस्तके मारे जानेपर दुखी हुए राक्षसोंकी वह अकम्पनीय विशाल सेना लङ्काको लौट गयी ॥ ५७ ॥

न शेकुः समवस्थातुं निहते वाहिनीपतौ । सेतुबन्धं समासाद्य विशीर्णं सलिलं यथा ॥ ५८ ॥

भावार्थ

सेनापतिके मारे जानेपर वह सेना ठहर न सकी । जैसे बाँध टूट जानेपर नदीका पानी रुक नहीं पाता ॥ ५८ ॥

हते तस्मिन्नध्वमूमुख्ये राक्षसास्ते निरुद्यमाः । रक्षःपतिगृहं गत्वा ध्यानमूकत्वमागताः ॥ ५९ ॥ प्राप्ताः शोकार्णवं तीव्रं विसंज्ञा इव तेऽभवन् ॥ ६० ॥

भावार्थ

सेनानायकके मारे जानेसे वे सारे राक्षस अपना युद्धविषयक उत्साह खो बैठे और राक्षसराज रावणके भवनमें जाकर चिन्ताके कारण चुपचाप खड़े हो गये । तीव्र शोक-समुद्रमें डूब जानेके कारण वे सब-के-सब अचेत-से हो गये थे ॥ ५९-६० ॥

ततस्तु नीलो विजयी महाबलः प्रशस्यमानः सुकृतेन कर्मणा । समेत्य रामेण सलक्ष्मणेन प्रहृष्टरूपस्तु बभूव यूथपः ॥ ६१ ॥

भावार्थ

तदनन्तर विजयी सेनापति महाबली नील अपने इस महान् कर्मके कारण प्रशंसित होते हुए श्रीराम और लक्ष्मणसे आकर मिले और बड़े हर्षका अनुभव करने लगे ॥ ६१ ॥

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