युद्धकाण्ड, सर्ग 5
सा तु नीलेन विधिवत्स्वारक्षा सुसमाहिता । सागरस्योत्तरे तीरे साधु सा विनिवेशिता ॥ १ ॥
भावार्थ
नीलने, जिसकी विधिवत् रक्षाकी व्यवस्था की गयी थी, उस परम सावधान वानर-सेनाको समुद्रके उत्तर तटपर अच्छे ढंगसे ठहराया ॥ १ ॥
मैन्दश्च द्विविदश्चोभौ तत्र वानरपुङ्गवौ । विचेरतुश्च तां सेनां रक्षार्थं सर्वतोदिशम् ॥ २ ॥
भावार्थ
मैन्द और द्विविद—ये दो प्रमुख वानरवीर उस सेनाकी रक्षाके लिये सब ओर विचरते रहते थे ॥ २ ॥
निविष्टायां तु सेनायां तीरे नदनदीपतेः । पार्श्वस्थं लक्ष्मणं दृष्ट्वा रामो वचनमब्रवीत् ॥ ३ ॥ शोकश्च किल कालेन गच्छता ह्यपगच्छति । मम चापश्यतः कान्तामहन्यहनि वर्धते ॥ ४ ॥
भावार्थ
समुद्रके किनारे सेनाका पड़ाव पड़ जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने अपने पास बैठे हुए लक्ष्मणकी ओर देखकर कहा—॥ ‘सुमित्रानन्दन ! कहा जाता है कि शोक बीतते हुए समयके साथ स्वयं भी दूर हो जाता है; परंतु मेरा शोक तो अपनी प्राणवल्लभाको न देखनेके कारण दिनोंदिन बढ़ रहा है ॥ ४ ॥
न मे दुःखं प्रिया दूरे न मे दुःखं हृतेति च । एतदेवानुशोचामि वयोऽस्या ह्यतिवर्तते ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘मुझे इस बातका दुःख नहीं है कि मेरी प्रिया मुझसे दूर है । उसका अपहरण हुआ—इसका भी दुःख नहीं है । मैं तो बारंबार इसीलिये शोकमें डूबा रहता हूँ कि उसके जीवित रहनेके लिये जो अवधि नियत कर दी गयी है, वह शीघ्रतापूर्वक बीती जा रही है ॥ ५ ॥
वाहि वात यतः कान्ता तां स्पृष्ट्वा मामपि स्पृश । त्वयि मे गात्रसंस्पर्शश्चन्द्रे दृष्टिसमागमः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘हवा ! तुम वहाँ बह, जहाँ मेरी प्राणवल्लभा है । उसका स्पर्श करके मेरा भी स्पर्श कर । उस दशामें तुझसे जो मेरे अङ्गोंका स्पर्श होगा, वह चन्द्रमासे होनेवाले दृष्टिसंयोगकी भाँति मेरे सारे संतापको दूर करनेवाला और आह्लादजनक होगा ॥ ६ ॥
तन्मे दहति गात्राणि विषं पीतमिवाशये । हा नाथेति प्रिया सा मां ह्रियमाणा यदब्रवीत् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘अपहरण होते समय मेरी प्यारी सीताने जो मुझे ‘हा नाथ !’ कहकर पुकारा था, वह पीये हुए उदरस्थित विषकी भाँति मेरे सारे अङ्गोंको दग्ध किये देता है ॥ ७ ॥
तद्वियोगेन्धनवता तच्चिन्ताविमलार्चिषा । रात्रिंदिवं शरीरं मे दह्यते मदनाग्निना ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘प्रियतमाका वियोग ही जिसका ईंधन है, उसकी चिन्ता ही जिसकी दीप्तिमती लपटें हैं, वह प्रेमाग्नि मेरे शरीरको रात-दिन जलाती रहती है ॥ ८ ॥
अवगाह्यार्णवं स्वप्स्ये सौमित्रे भवता विना । एवं च प्रज्वलन् कामो न मा सुप्तं जले दहेत् ॥ ९ ॥ बहेतत् कामयानस्य शक्यमेतेन जीवितुम् । यदहं सा च वामोरुरेकां धरणिमाश्रितौ ॥ १० ॥
भावार्थ
‘सुमित्रानन्दन ! तुम यहीं रहो । मैं तुम्हारे बिना अकेला ही समुद्रके भीतर घुसकर सोऊँगा । इस तरह जलमें शयन करनेपर यह प्रज्वलित प्रेमाग्नि मुझे दग्ध नहीं कर सकेगी ॥ ‘मैं और वह वामोरु सीता एक ही भूतलपर सोते हैं । प्रियतमाके संयोगकी इच्छा रखनेवाले मुझ विरहीके लिये इतना ही बहुत है । इतनेसे भी मैं जीवित रह सकता हूँ ॥ १० ॥
केदारस्येव केदारः सोदकस्य निरूदकः । उपस्नेहेन जीवामि जीवन्तीं यच्छृणोमि ताम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘जैसे जलसे भरी हुई क्यारीके सम्पर्कसे बिना जलकी क्यारीका धान भी जीवित रहता है—सूखता नहीं है, उसी प्रकार मैं जो यह सुनता हूँ कि सीता अभी जीवित है, इसीसे जी रहा हूँ ॥ ११ ॥
कदा नु खलु सुश्रोणीं शतपत्रायतेक्षणाम् । विजित्य शत्रून् द्रक्ष्यामि सीतां स्फीतामिव श्रियम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘कब वह समय आयेगा, जब शत्रुओंको परास्त करके मैं समृद्धिशालिनी राजलक्ष्मीके समान कमलनयनी सुमध्यमा सीताको देखूँगा ॥ १२ ॥
कदा सुचारुदन्तोष्ठं तस्याः पद्ममिवाननम् । ईषदुन्नाम्य पास्यामि रसायनमिवातुरः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘जैसे रोगी रसायनका पान करता है, उसी प्रकार मैं कब सुन्दर दाँतों और बिम्बसदृश मनोहर ओठोंसे युक्त सीताके प्रफुल्लकमल-जैसे मुखको कुछ ऊपर उठाकर चूमूँगा ॥ १३ ॥
तौ तस्याः सहितौ पीनौ स्तनौ तालफलोपमौ । कदा नु खलु सोत्कम्पौ श्लिष्यन्त्या मां भजिष्यतः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘मेरा आलिङ्गन करती हुई प्रिया सीताके वे परस्पर सटे हुए, तालफलके समान गोल और मोटे दोनों स्तन कब किंचित् कम्पनके साथ मेरा स्पर्श करेंगे ॥ १४ ॥
सा नूनमसितापाङ्गी रक्षोमध्यगता सती । मन्नाथा नाथहीनेव त्रातारं नाधिगच्छति ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘कजरारे नेत्रप्रान्तवाली वह सती-साध्वी सीता, जिसका मैं ही नाथ हूँ, आज अनाथकी भाँति राक्षसोंके बीचमें पड़कर निश्चय ही कोई रक्षक नहीं पा रही होगी ॥ १५ ॥
कथं जनकराजस्य दुहिता मम च प्रिया । राक्षसीमध्यगा शेते स्नुषा दशरथस्य च ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘राजा जनककी पुत्री, महाराज दशरथकी पुत्रवधू और मेरी प्रियतमा सीता राक्षसियोंके बीचमें कैसे सोती होगी ?॥१६॥
अविक्षोभ्याणि रक्षांसि सा विधूयोत्पतिष्यति । विधूय जलदान् नीलाञ्शशिलेखा शरत्स्विव ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘वह समय कब आयेगा, जब कि सीता मेरे द्वारा उन दुर्धर्ष राक्षसोंका विनाश करके उसी प्रकार अपना उद्धार करेगी, जैसे शरत्कालमें चन्द्रलेखा काले बादलोंका निवारण करके उनके आवरणसे मुक्त हो जाती है ॥ १७ ॥
स्वभावतनुका नूनं शोकेनानशनेन च। भूयस्तनुतरा सीता देशकालविपर्ययात् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘स्वभावसे ही दुबले-पतले शरीरवाली सीता विपरीत देश-कालमें पड़ जानेके कारण निश्चय ही शोक और उपवास करके और भी लट गयी होगी ॥ १८ ॥
कदा नु राक्षसेन्द्रस्य निधायोरसि सायकान् । शोकं प्रत्याहरिष्यामि शोकमुत्सृज्य मानसम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘मैं राक्षसराज रावणकी छातीमें अपने सायकोंको धँसाकर अपने मानसिक शोकका निराकरण करके कब सीताका शोक दूर करूँगा ॥ १९ ॥
कदा नु खलु मे साध्वी सीतामरसुतोपमा । सोत्कण्ठा कण्ठमालम्ब्य मोक्ष्यत्यानन्दजं जलम् ॥२०॥
भावार्थ
‘देवकन्याके समान सुन्दरी मेरी सती-साध्वी सीता कब उत्कण्ठापूर्वक मेरे गलेसे लगकर अपने नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहायेगी ॥ २० ॥
कदा शोकमिमं घोरं मैथिलीविप्रयोगजम् । सहसा विप्रमोक्ष्यामि वासः शुक्लेतरं यथा ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘ऐसा समय कब आयेगा, जब मैं मिथिलेशकुमारीके वियोगसे होनेवाले इस भयंकर शोकको मलिन वस्त्रकी भाँति सहसा त्याग दूँगा ?’ ॥२१॥
एवं विलपतस्तस्य तत्र रामस्य धीमतः । दिनक्षयान्मन्दवपुर्भास्करोऽस्तमुपागमत् ॥ २२ ॥
भावार्थ
बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजी वहाँ इस प्रकार विलाप कर ही रहे थे कि दिनका अन्त होनेके कारण मन्द किरणोंवाले सूर्यदेव अस्ताचलको जा पहुँचे ॥ २२ ॥
आश्वासितो लक्ष्मणेन रामः संध्यामुपासत । स्मरन् कमलपत्राक्षीं सीतां शोकाकुलीकृतः ॥ २३ ॥
भावार्थ
उस समय लक्ष्मणके धैर्य बँधानेपर शोकसे व्याकुल हुए श्रीरामने कमलनयनी सीताका चिन्तन करते हुए संध्योपासना की ॥ २३ ॥
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