युद्धकाण्ड, सर्ग 39
तां रात्रिमुषितास्तत्र सुवेले हरियूथपाः । लङ्कायां दद्दशुर्वीरा वनान्युपवनानि च ॥ १ ॥
भावार्थ
वानर-यूथपतियोंने वह रात उस सुवेलपर्वतपर ही बितायी और वहाँसे उन वीरोंने लङ्काके वन और उपवन भी देखे ॥ १ ॥
समसौम्यानि रम्याणि विशालान्यायतानि च । दृष्टिरम्याणि ते दृष्ट्वा बभूवुर्जातविस्मयाः ॥ २ ॥
भावार्थ
वे बड़े ही चौरस, शान्त, सुन्दर, विशाल और विस्तृत थे तथा देखनेमें अत्यन्त रमणीय जान पड़ते थे । उन्हें देखकर उन सब वानरोंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ २ ॥
चम्पकाशोकबकुलशालतालसमाकुला । तमालवनसंछन्ना नागमालासमावृता ॥ ३ ॥ हिन्तालैरर्जुनैर्नीपैः सप्तपर्णैः सुपुष्पितैः । तिलकैः कर्णिकारैश्च पाटलैश्च समन्ततः ॥ ४ ॥ शुशुभे पुष्पिताग्रैश्च लतापरिगतैर्द्रुमैः । लङ्का बहुविधैर्दिव्यैर्यथेन्द्रस्यामरावती ॥ ५ ॥
भावार्थ
चम्पा, अशोक, बकुल, शाल-और ताल वृक्षोंसे व्याप्त, तमाल-वनसे आच्छादित और नागकेसरोंसे आवृत लङ्कापुरी हिंताल, अर्जुन, नीप ( कदम्ब ), खिले हुए छितवन, तिलक, कनेर तथा पाटल आदि नाना प्रकारके दिव्य वृक्षोंसे जिनके अग्रभाग फूलोंके भारसे लदे थे तथा जिनपर लता-बल्लरियाँ फैली हुई थीं, इन्द्रकी अमरावतीके समान शोभा पाती थी ॥ ३–५ ॥
विचित्रकुसुमोपेतै रक्तकोमलपल्लवैः । शाद्वलैश्च तथा नीलैश्चित्राभिर्वनराजिभिः ॥ ६ ॥
भावार्थ
विचित्र फूलोंसे युक्त लाल कोमल पल्लवों, हरी-हरी घासों तथा विचित्र वनश्रेणियोंसे भी उस पुरीकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ६ ॥
गन्धाढ्यान्यतिरम्याणि पुष्पाणि च फलानि च । धारयन्त्यगमास्तत्र भूषणानीव मानवाः ॥ ७ ॥
भावार्थ
जैसे मनुष्य आभूषण धारण करते हैं, उसी प्रकार वहाँके वृक्ष सुगन्धित फूल और अत्यन्त रमणीय फल धारण करते थे ॥ ७ ॥
तच्चैत्ररथसंकाशं मनोज्ञं नन्दनोपमम् । वनं सर्वर्तुकं रम्यं शुशुभे षट्पदायुतम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
चैत्ररथ और नन्दनवनके समान वहाँका मनोहर वन सभी ऋतुओंमें भ्रमरोंसे व्याप्त हो रमणीय शोभा धारण करता था ॥ ८ ॥
दात्यूहकोयष्टिवकैर्नृत्यमानैश्च बर्हिणैः । रुतं परभृतानां च शुश्रुवे वननिर्झरे ॥ ९ ॥
भावार्थ
दात्यूह, कोयष्टि, बक और नाचते हुए मोर उस वनको सुशोभित करते थे । वनमें झरनोंके आसपास कोकिलकी कूक सुनायी पड़ती थी ॥ ९ ॥
नित्यमत्तविहंगानि भ्रमराचरितानि च । कोकिलाकुलखण्डानि विहंगाभिरुतानि च ॥ १० ॥ भृङ्गराजाधिगीतानि कुररस्वनितानि च । कोणालकविघुष्टानि सारसाभिरुतानि च । विविशुस्ते ततस्तानि वनान्युपवनानि च ॥ ११ ॥
भावार्थ
लङ्काके वन और उपवन नित्य मतवाले विहङ्गमोंसे विभूषित थे । वहाँ वृक्षोंकी डालियोंपर भौंरे मँडराते रहते थे । उनके प्रत्येक खण्डमें कोकिलाएँ कुहू-कुहू बोला करती थीं । पक्षी चहचहाते रहते थे । भृङ्गराजके गीत मुखरित होते थे । कुररके शब्द गूँजा करते थे । कोणालकके कलरव होते रहते थे तथा सारसोंकी स्वरलहरी सब ओर छायी रहती थी । कुछ वानरवीर उन वनों और उपवनोंमें घुस गये ॥ १०-११ ॥
हृष्टाः प्रमुदिता वीरा हरयः कामरूपिणः । तेषां प्रविशतां तत्र वानराणां महौजसाम् ॥ १२ ॥ पुष्पसंसर्गसुरभिर्ववौ घ्राणसुखोऽनिलः । अन्ये तु हरिवीराणां यूथान्निष्क्रम्य यूथपाः । सुग्रीवेणाभ्यनुज्ञाता लङ्कां जग्मुः पताकिनीम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
वे सभी वीर वानर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, उत्साही और आनन्दमग्न थे । उन महातेजस्वी वानरोंके वहाँ प्रवेश करते ही फूलोंके संसर्गसे सुगन्धित तथा घ्राणेन्द्रियको सुख देनेवाली मन्द वायु चलने लगी । दूसरे बहुत-से यूथपति उन वानर वीरोंके समूहसे निकलकर सुग्रीवकी आज्ञा ले ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत लङ्कापुरीमें गये ॥ १२-१३ ॥
वित्रासयन्तो विहगान् म्लापयन्तो मृगद्विपान् । कम्पयन्तश्च तां लङ्कां नादैः स्वैर्नदतां वराः ॥ १४ ॥
भावार्थ
गर्जनेवाले लोगोंमेंसे श्रेष्ठ वे वानरवीर अपने सिंहनादसे पक्षियोंको डराते, मृगों और हाथियोंके हर्ष छीनते तथा लङ्काको कम्पित करते हुए आगे बढ़ रहे थे ॥ १४ ॥
कुर्वन्तस्ते महावेगा महीं चरणपीडिताम् । रजश्च सहसैवोर्ध्वं जगाम चरणोत्थितम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
वे महान् वेगशाली वानर पृथ्वीको जब चरणोंसे दबाते थे, उस समय उनके पैरोंसे उठी हुई धूल सहसा ऊपरको उड़ जाती थी ॥ १५ ॥
ऋक्षाः सिंहाश्च महिषा वारणाश्च मृगाः खगाः । तेन शब्देन वित्रस्ता जग्मुर्भीता दिशो दश ॥ १६ ॥
भावार्थ
वानरोंके उस सिंहनादसे त्रस्त एवं भयभीत हुए रीछ, सिंह, भैंसे, हाथी, मृग और पक्षी दसों दिशाओंकी ओर भाग गये ॥ १६ ॥
शिखरं तु त्रिकूटस्य प्रांशु चैकं दिविस्पृशम् । समन्तात् पुष्पसंछन्नं महारजतसंनिभम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
त्रिकूट पर्वतका एक शिखर बहुत ऊँचा था । वह ऐसा जान पड़ता था, मानो स्वर्गलोकको छू रहा हो । उसपर सब ओर पीले रंगके फूल खिले हुए थे, जिनसे वह सोनेका-सा जान पड़ता था ॥ १७ ॥
शतयोजनविस्तीर्णं विमलं चारुदर्शनम् । श्लक्ष्णं श्रीमन्महच्चैव दुष्प्रापं शकुनैरपि ॥ १८ ॥
भावार्थ
उस शिखरका विस्तार सौ योजन था । वह देखनेमें बड़ा ही सुन्दर, स्वच्छ, स्निग्ध, कान्तिमान् और विशाल था । पक्षियोंके लिये भी उसकी चोटीतक पहुँचना कठिन होता था ॥ १८ ॥
मनसापि दुरारोहं किं पुनः कर्मणा जनैः । निविष्टा तस्य शिखरे लङ्का रावणपालिता ॥ १९ ॥
भावार्थ
लोग त्रिकूटके उस शिखरपर मनके द्वारा चढ़नेकी कल्पना भी नहीं कर सकते थे । फिर क्रियाद्वारा उसपर आरूढ़ होनेकी तो बात ही क्या है ? रावणद्वारा पालित लङ्का त्रिकूटके उसी शिखरपर बसी हुई थी ॥ १९ ॥
दशयोजनविस्तीर्णा विंशद्योजनमायता । सा पुरी गोपुरैरुच्चैः पाण्डुराम्बुदसंनिभैः । काञ्चनेन च शालेन राजतेन च शोभते ॥ २० ॥
भावार्थ
वह पुरी दस योजन चौड़ी और बीस योजन लंबी थी । सफेद बादलोंके समान ऊँचे-ऊँचे गोपुर तथा सोने और चाँदीके परकोटे उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ २० ॥
प्रासादैश्च विमानैश्च लङ्का परमभूषिता । घनैरिवातपापाये मध्यमं वैष्णवं पदम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
जैसे ग्रीष्मके अन्तकाल—वर्षा ऋतुमें घनीभूत बादल आकाशकी शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार प्रासादों और विमानोंसे लङ्कापुरी अत्यन्त सुशोभित हो रही थी ॥ २१ ॥
यस्यां स्तम्भसहस्रेण प्रासादः समलंकृतः । कैलासशिखराकारो दृश्यते खमिवोल्लिखन् ॥ २२ ॥
भावार्थ
उस पुरीमें सहस्र खम्भोंसे अलंकृत एक चैत्यप्रासाद था, जो कैलास-शिखरके समान दिखायी देता था । वह आकाशको मापता हुआ-सा जान पड़ता था ॥ २२ ॥
चैत्यः स राक्षसेन्द्रस्य बभूव पुरभूषणम् । शतेन रक्षसां नित्यं यः समग्रेण रक्ष्यते ॥ २३ ॥
भावार्थ
राक्षसराज रावणका वह चैत्यप्रासाद लङ्कापुरीका आभूषण था । कई सौ राक्षस रक्षाके सभी साधनोंसे सम्पन्न होकर प्रतिदिन उसकी रक्षा करते थे ॥ २३ ॥
मनोज्ञां काञ्चनवतीं पर्वतैरुपशोभिताम् । नानाधातुविचित्रैश्च उद्यानैरुपशोभिताम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
इस प्रकार वह पुरी बड़ी ही मनोहर, सुवर्णमयी, अनेकानेक पर्वतोंसे अलंकृत, नाना प्रकारकी विचित्र धातुओंसे चित्रित और अनेक उद्यानोंसे सुशोभित थी ॥२४॥
नानाविहगसंघुष्टां नानामृगनिषेविताम् । नानाकुसुमसम्पन्नां नानाराक्षससेविताम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
भाँति-भाँतिके विहङ्गम वहाँ अपनी मधुर बोली बोल रहे थे । नाना प्रकारके मृग आदि पशु उसका सेवन करते थे । अनेक प्रकारके फूलोंकी सम्पत्तिसे वह सम्पन्न थी और विविध प्रकारके आकारवाले राक्षस वहाँ निवास करते थे ॥ २५ ॥
तां समृद्धां समृद्धार्थो लक्ष्मीवॉंल्लक्ष्मणाग्रजः । रावणस्य पुरीं रामो ददर्श सह वानरैः ॥ २६ ॥
भावार्थ
धन-धान्यसे सम्पन्न तथा सम्पूर्ण मनोवाञ्छित वस्तुओंसे भरी-पूरी उस रावण-पुरीको लक्ष्मणके बड़े भाई लक्ष्मीवान् श्रीरामने वानरोंके साथ देखा ॥ २६ ॥
तां महागृहसम्बाधां दृष्ट्वा लक्ष्मणपूर्वजः । नगरीं त्रिदिवप्रख्यां विस्मयं प्राप वीर्यवान् ॥ २७ ॥
भावार्थ
बड़े-बड़े महलोंसे सघन बसी हुई उस स्वर्गतुल्य नगरीको देखकर पराक्रमी श्रीराम बड़े विस्मित हुए ॥२७॥
तां रत्नपूर्णां बहुसंविधानां प्रासादमालाभिरलंकृतां च । पुरीं महायन्त्रकवाटमुख्यां ददर्श रामो महता बलेन ॥ २८ ॥
भावार्थ
इस प्रकार अपनी विशाल सेनाके साथ श्रीरघुनाथजीने अनेक प्रकारके रत्नोंसे पूर्ण, तरह-तरहकी रचनाओंसे सुसज्जित, ऊँचे-ऊँचे महलोंकी पंक्तिसे अलंकृत और बड़े-बड़े यन्त्रोंसे युक्त मजबूत किवाड़ोंवाली वह अद्भुत पुरी देखी।२८।
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