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युद्धकाण्ड, सर्ग 25

सबले सागरं तीर्णं रामे दशरथात्मजे । अमात्यौ रावणः श्रीमानब्रवीच्छुकसारणौ ॥ १ ॥

भावार्थ

दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम जब सेनासहित समुद्र पार कर चुके, तब श्रीमान् रावणने अपने दोनों मन्त्री शुक और सारणसे फिर कहा—॥ १ ॥

समग्रं सागरं तीर्णं दुस्तरं वानरं बलम् । अभूतपूर्वं रामेण सागरे सेतुबन्धनम् ॥ २ ॥

भावार्थ

‘यद्यपि समुद्रको पार करना अत्यन्त कठिन था तो भी सारी वानरसेना उसे लाँघकर इस पार चली आयी। रामके द्वारा सागरपर सेतुका बाँधा जाना अभूतपूर्व कार्य है ॥ २ ॥

सागरे सेतुबन्धं तं न श्रद्दध्यां कथंचन । अवश्यं चापि संख्येयं तन्मया वानरं बलम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘लोगोंके मुँहसे सुननेपर भी मुझे किसी तरह यह विश्वास नहीं होता कि समुद्रपर पुल बाँधा गया होगा। वानरसेना कितनी है ? इसका ज्ञान मुझे अवश्य प्राप्त करना चाहिये ॥३॥

भवन्तौ वानरं सैन्यं प्रविश्यानुपलक्षितौ । परिमाणं च वीर्यं च ये च मुख्याः प्लवंगमाः ॥ ४ ॥ मन्त्रिणो ये च रामस्य सुग्रीवस्य च सम्मताः । ये पूर्वमभिवर्तन्ते ये च शूराः प्लवंगमाः ॥ ५ ॥ स च सेतुर्यथा बद्धः सागरे सलिलार्णवे । निवेशं च यथा तेषां वानराणां महात्मनाम् ॥ ६ ॥ रामस्य व्यवसायं च वीर्यं प्रहरणानि च । लक्ष्मणस्य च वीरस्य तत्त्वतो ज्ञातुमर्हथः ॥ ७ ॥ कश्च सेनापतिस्तेषां वानराणां महात्मनाम् । तच्च ज्ञात्वा यथातत्त्वं शीघ्रमागन्तुमर्हथः ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘तुम दोनों इस तरह वानर-सेनामें प्रवेश करो कि तुम्हें कोई पहचान न सके । वहाँ जाकर यह पता लगाओ कि वानरोंकी संख्या कितनी है ? उनकी शक्ति कैसी है ? उनमें मुख्य-मुख्य वानर कौन-कौनसे हैं । श्रीराम और सुग्रीवके मनोऽनुकूल मन्त्री कौन-कौन हैं ? कौन-कौन शूरवीर वानर-सेनाके आगे रहते हैं ? अगाध जलराशिसे भरे हुए समुद्रमें वह पुल किस तरह बाँधा गया ? महामनस्वी वानरोंकी छावनी कैसे पड़ी है ? श्रीराम और वीर लक्ष्मणका निश्चय क्या है ?—वे क्या करना चाहते हैं ? उनके बल-पराक्रम कैसे हैं ? उन दोनोंके पास कौन-कौनसे अस्त्र-शस्त्र हैं ? और उन महामना वानरोंका प्रधान सेनापति कौन है ? इन सब बातोंकी तुमलोग ठीक-ठीक जानकारी प्राप्त करो और सबका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर शीघ्र लौट आओ’॥४–८॥

इति प्रतिसमादिष्टौ राक्षसौ शुकसारणौ । हरिरूपधरौ वीरौ प्रविष्टौ वानरं बलम् ॥ ९ ॥

भावार्थ

ऐसा आदेश पाकर दोनों वीर राक्षस शुक और सारण वानररूप धारण करके उस वानरी सेनामें घुस गये ॥ ९ ॥

ततस्तद् वानरं सैन्यमचिन्त्यं लोमहर्षणम् । संख्यातुं नाध्यगच्छेतां तदा तौ शुकसारणौ ॥ १० ॥ तत् स्थितं पर्वताग्रेषु निर्झरेषु गुहासु च । समुद्रस्य च तीरेषु वनेषूपवनेषु च । तरमाणं च तीर्णं च तर्तुकामं च सर्वशः ॥ ११ ॥

भावार्थ

वानरोंकी वह सेना कितनी है ? यह गिनना तो दूर रहा; मनसे उसका अंदाजा लगाना भी असम्भव था । उस अपार सेनाको देखकर रोंगटे खड़े हो जाते थे । उस समय शुक और सारण किसी तरह भी उसकी गणना नहीं कर सके ॥ वह सेना पर्वतके शिखरोंपर, झरनोंके आसपास, गुफाओंमें, समुद्रके किनारे तथा वनों और उपवनोंमें भी फैली हुई थी । उसका कुछ भाग समुद्र पार कर रहा था, कुछ पार कर चुका था और कुछ सब प्रकारसे समुद्रको पार करनेकी तैयारीमें लगा था ॥ ११ ॥

निविष्टं निविशच्चैव भीमनादं महाबलम् । तद्बलार्णवमक्षोभ्यं ददृशाते निशाचरौ ॥ १२ ॥

भावार्थ

भयंकर कोलाहल करनेवाली वह विशाल सेना कुछ स्थानोंपर छावनी डाल चुकी थी और कुछ जगहोंपर डालती जा रही थी । दोनों निशाचरोंने देखा, वह वानर-वाहिनी समुद्रके समान अक्षोभ्य थी ॥ १२ ॥

तौ ददर्श महातेजाः प्रतिच्छन्नौ विभीषणः । आचचक्षे स रामाय गृहीत्वा शुकसारणौ ॥ १३ ॥

भावार्थ

वानरवेशमें छिपकर सेनाका निरीक्षण करते हुए दोनों राक्षस शुक और सारणको महातेजस्वी विभीषणने देखा, देखते ही पहचाना और उन दोनोंको पकड़कर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—॥ १३ ॥

तस्यैतौ राक्षसेन्द्रस्य मन्त्रिणौ शुकसारणौ । लङ्कायाः समनुप्राप्तौ चारौ परपुरंजय ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले नरेश्वर ! ये दोनों लङ्कासे आये हुए गुप्तचर एवं राक्षसराज रावणके मन्त्री शुक तथा सारण हैं’ ॥ १४ ॥

तौ दृष्ट्वा व्यथितौ रामं निराशौ जीविते तथा । कृताञ्जलिपुटौ भीतौ वचनं चेदमूचतुः ॥ १५ ॥

भावार्थ

वे दोनों राक्षस श्रीरामचन्द्रजीको देखकर अत्यन्त व्यथित हुए और जीवनसे निराश हो गये । उन दोनोंके मनमें भय समा गया । वे हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले—॥ १५ ॥

आवामिहागतौ सौम्य रावणप्रहितावुभौ । परिज्ञातुं बलं सर्वं तदिदं रघुनन्दन ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘सौम्य ! रघुनन्दन ! हम दोनोंको रावणने भेजा है और हम इस सारी सेनाके विषयमें आवश्यक जानकारी प्राप्त करनेके लिये आये हैं’ ॥ १६ ॥

तयोस्तद् वचनं श्रुत्वा रामो दशरथात्मजः । अब्रवीत् प्रहसन् वाक्यं सर्वभूतहिते रतः ॥ १७ ॥

भावार्थ

उन दोनोंकी वह बात सुनकर सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें लगे रहनेवाले दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम हँसते हुए बोले—॥ १७ ॥

यदि दृष्टं बलं सर्वं वयं वा सुसमाहिताः । यथोक्तं वा कृतं कार्यं छन्दतः प्रतिगम्यताम् ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘यदि तुमने सारी सेना देख ली हो, हमारी सैनिक शक्तिका ज्ञान प्राप्त कर लिया हो तथा रावणके कथनानुसार सब काम पूरा कर लिया हो तो अब तुम दोनों अपनी इच्छाके अनुसार प्रसन्नतापूर्वक लौट जाओ ॥ १८ ॥

अथ किंचिददृष्टं वा भूयस्तद् द्रष्टुमर्हथः । विभीषणो वा कार्त्स्न्येन पुनः संदर्शयिष्यति ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘अथवा यदि अभी कुछ देखना बाकी रह गया हो तो फिर देख लो । विभीषण तुम्हें सब कुछ पुनः पूर्णरूपसे दिखा देंगे ॥१९॥

न चेदं ग्रहणं प्राप्य भेतव्यं जीवितं प्रति । न्यस्तशस्त्रौ गृहीतौ च न दूतौ वधमर्हथः ॥ २० ॥

भावार्थ

‘इस समय जो तुम पकड़ लिये गये हो, इससे तुम्हें अपने जीवनके विषयमें कोई भय नहीं होना चाहिये; क्योंकि शस्त्र-हीन अवस्थामें पकड़े गये तुम दोनों दूत वधके योग्य नहीं हो ॥ २० ॥

प्रच्छन्नौ च विमुञ्चेमौ चारौ रात्रिचरावुभौ । शत्रुपक्षस्य सततं विभीषण विकर्षिणौ ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘विभीषण ! ये दोनों राक्षस रावणके गुप्तचर हैं और छिपकर यहाँका भेद लेनेके लिये आये हैं । ये अपने शत्रुपक्ष ( वानरसेना ) में फूट डालनेका प्रयास कर रहे हैं । अब तो इनका भण्डा फूट ही गया; अतः इन्हें छोड़ दो ॥ २१ ॥

प्रविश्य महतीं लङ्कां भवद्भ्यां धनदानुजः । वक्तव्यो रक्षसां राजा यथोक्तं वचनं मम ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘शुक और सारण ! जब तुम दोनों लङ्कामें पहुँचो, तब कुबेरके छोटे भाई राक्षसराज रावणको मेरी ओरसे यह संदेश सुना देना—॥ २२ ॥

यद् बलं त्वं समाश्रित्य सीतां मे हृतवानसि । तद् दर्शय यथाकामं ससैन्यश्च सबान्धवः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘रावण ! जिस बलके भरोसे तुमने मेरी सीताका अपहरण किया है, उसे अब सेना और बन्धुजनोंसहित आकर इच्छानुसार दिखाओ ॥ २३ ॥

श्वः काल्ये नगरीं लङ्कां सप्राकारां सतोरणाम् । रक्षसां च बलं पश्य शरैर्विध्वंसितं मया ॥ २४ ॥ क्रोधं भीममहं मोक्ष्ये ससैन्ये त्वयि रावण । श्वः काल्ये वज्रवान् वज्रं दानवेष्विव वासवः ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘कल प्रातःकाल ही तुम परकोटे और दरवाजोंके सहित लङ्कापुरी तथा राक्षसी सेनाका मेरे बाणोंसे विध्वंस होता देखोगे ॥ ‘रावण ! जैसे वज्रधारी इन्द्र दानवोंपर अपना वज्र छोड़ते हैं, उसी प्रकार मैं कल सबेरे ही सेनासहित तुमपर अपना भयंकर क्रोध छोड़ूँगा’ ॥ २५ ॥

इति प्रतिसमादिष्टौ राक्षसौ शुकसारणौ । जयेति प्रतिनन्द्यैनं राघवं धर्मवत्सलम् ॥ २६ ॥ आगम्य नगरीं लङ्कामब्रूतां राक्षसाधिपम् ।

भावार्थ

भगवान् श्रीरामका यह संदेश पाकर दोनों राक्षस शुक और सारण धर्मवत्सल श्रीरघुनाथजीका ‘आपकी जय हो’ ‘आप चिरंजीवी हों’ इत्यादि वचनोंद्वारा अभिनन्दन करके लङ्कापुरीमें आकर राक्षसराज रावणसे बोले—॥ २६½ ॥

विभीषणगृहीतौ तु वधार्थं राक्षसेश्वर ॥ २७ ॥ दृष्ट्वा धर्मात्मना मुक्तौ रामेणामिततेजसा ।

भावार्थ

‘राक्षसेश्वर ! हमें तो विभीषणने वध करनेके लिये पकड़ लिया था; किंतु जब अमित तेजस्वी धर्मात्मा श्रीरामने देखा, तब हमें छुड़वा दिया ॥ २७½ ॥

एकस्थानगता यत्र चत्वारः पुरुषर्षभाः ॥ २८ ॥ लोकपालसमाः शूराः कृतास्त्रा दृढविक्रमाः । रामो दाशरथिः श्रीमाॅंल्लक्ष्मणश्च विभीषणः ॥ २९ ॥ सुग्रीवश्च महातेजा महेन्द्रसमविक्रमः । एते शक्काः पुरीं लङ्कां सप्राकारां सतोरणाम् ॥ ३० ॥ उत्पाट्य संक्रामयितुं सर्वे तिष्ठन्तु वानराः ।

भावार्थ

‘दशरथनन्दन श्रीराम, श्रीमान् लक्ष्मण, विभीषण तथा महेन्द्रतुल्य पराक्रमी महातेजस्वी सुग्रीव—ये चारों वीर लोकपालोंके समान शौर्यशाली, दृढ़ पराक्रमी और अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता हैं । जहाँ ये चारों पुरुषप्रवर एक जगह एकत्र हो गये हैं, वहाँ विजय निश्चित है । और सब वानर अलग रहें तो भी ये चार ही परकोटे और दरवाजोंके सहित सारी लङ्कापुरीको उखाड़कर फेंक सकते हैं ॥ २८-३०½ ॥

यादृशं तद्धि रामस्य रूपं प्रहरणानि च ॥ ३१ ॥ वधिष्यति पुरीं लङ्कामेकस्तिष्ठन्तु ते त्रयः ।

भावार्थ

‘श्रीरामचन्द्रजीका जैसा रूप है और जैसे उनके अस्त्र-शस्त्र हैं, उनसे तो यही मालूम होता है कि वे अकेले ही सारी लङ्कापुरीका वध कर डालेंगे । भले ही वे बाकी तीन वीर भी बैठे ही रहें ॥ ३१½ ॥

रामलक्ष्मणगुप्ता सा सुग्रीवेण च वाहिनी । बभूव दुर्धर्षतरा सर्वैरपि सुरासुरैः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘महाराज ! श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीवसे सुरक्षित वह वानरोंकी सेना तो समस्त देवताओं और असुरोंके लिये भी अत्यन्त दुर्जय है ॥ ३२ ॥

प्रहृष्टयोधा ध्वजिनी महात्मनां वनौकसां सम्प्रति योद्धुमिच्छताम् । अलं विरोधेन शमो विधीयतां प्रदीयतां दाशरथाय मैथिली ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘महामनस्वी वानर इस समय युद्ध करनेके लिये उत्सुक हैं । उनकी सेनाके सभी वीर योद्धा बड़े प्रसन्न हैं । अतः उनके साथ ‘विरोध करनेसे आपको कोई लाभ नहीं होगा । इसलिये संधि कर लीजिये और श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें सीताको लौटा दीजिये‘ ॥ ३३ ॥

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