युद्धकाण्ड, सर्ग 122
उपस्थितं तु तं कृत्वा पुष्पकं पुष्पभूषितम् । अविदूरे स्थितो राममित्युवाच विभीषणः ॥ १ ॥
भावार्थ
फूलोंसे सजे हुए पुष्पकविमानको वहाँ उपस्थित करके पास ही खड़े हुए विभीषणने श्रीरामसे कुछ कहनेका विचार किया ॥ १ ॥
स तु बद्धाञ्जलिपुटो विनीतो राक्षसेश्वरः । अब्रवीत् त्वरयोपेतः किं करोमीति राघवम् ॥ २ ॥
भावार्थ
राक्षसराज विभीषणने दोनों हाथ जोड़कर बड़ी विनय और उतावलीके साथ श्रीरघुनाथजीसे पूछा—‘प्रभो ! अब मैं क्या सेवा करूँ ?’ ॥ २ ॥
तमब्रवीन्महातेजा लक्ष्मणस्योपशृण्वतः । विमृश्य राघवो वाक्यमिदं स्नेहपुरस्कृतम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
तब महातेजस्वी श्रीरघुनाथजीने कुछ सोचकर लक्ष्मणके सुनते हुए यह स्नेहयुक्त वचन कहा—॥ ३ ॥
कृतप्रयत्नकर्माणः सर्वे एव वनौकसः । रत्नैरर्थैश्च विविधैः सम्पूज्यन्तां विभीषण ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘विभीषण ! इन सारे वानरोंने युद्धमें बड़ा यत्न एवं परिश्रम किया है; अतः तुम नाना प्रकारके रत्न और धन आदिके द्वारा इन सबका सत्कार करो ॥ ४ ॥
सहामीभिस्त्वया लङ्का निर्जिता राक्षसेश्वर । हृष्टैः प्राणभयं त्यक्त्वा संग्रामेष्वनिवर्तिभिः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘राक्षसेश्वर ! ये वीर वानर संग्रामसे कभी पीछे नहीं हटते हैं और सदा हर्ष एवं उत्साहसे भरे रहते हैं । प्राणोंका भय छोड़कर लड़नेवाले इन वानरोंके सहयोगसे तुमने लङ्कापर विजय पायी है ॥ ५ ॥
त इमे कृतकर्माणः सर्वे एव वनौकसः । धनरत्नप्रदानैश्च कर्मैषां सफलं कुरु ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘ये सभी वानर इस समय अपना काम पूरा कर चुके हैं, अतः इन्हें रत्न और धन आदि देकर तुम इनके इस कर्मको सफल करो ॥ ६ ॥
एवं सम्मानिताश्चैते नन्दमाना यथा त्वया । भविष्यन्ति कृतज्ञेन निर्वृता हरियूथपाः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘तुम कृतज्ञ होकर जब इनका इस प्रकार सम्मान और अभिनन्दन करोगे, तब ये वानरयूथपति बहुत संतुष्ट होंगे ॥७॥
त्यागिनं संग्रहीतारं सानुक्रोशं जितेन्द्रियम् । सर्वे त्वामभिगच्छन्ति ततः सम्बोधयामि ते ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘ऐसा करनेसे सब लोग यह जानेंगे कि विभीषण उचित अवसरपर धनका त्याग एवं दान करते हैं, यथासमय न्यायोचित रीतिसे धन और रत्न आदिका संग्रह करते रहते हैं, दयालु हैं और जितेन्द्रिय हैं; इसलिये तुम्हें ऐसा करनेके लिये समझा रहा हूँ ॥ ८ ॥
हीनं रतिगुणैः सर्वैरभिहन्तारमाहवे । सेना त्यजति संविग्ना नृपतिं तं नरेश्वर ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘नरेश्वर ! जो राजा सेवकोंमें प्रेम उत्पन्न करनेवाले दान-मान आदि सब गुणोंसे रहित होता है, उसे युद्धके अवसरपर उद्विग्न हुई सेना छोड़कर चल देती है, वह समझती है कि यह व्यर्थ ही हमारा वध करा रहा है—हमारे भरण-पोषणका या योग-क्षेमकी चिन्ता इसे बिल्कुल नहीं है’ ॥ ९ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण वानरांस्तान् विभीषणः । रत्नार्थसंविभागेन सर्वानेवाभ्यपूजयत् ॥ १० ॥
भावार्थ
श्रीरामके ऐसा कहनेपर विभीषणने उन सब वानरोंको रत्न और धन देकर सभीका पूजन ( सत्कार ) किया ॥१०॥
ततस्तान् पूजितान् दृष्ट्वा रत्नार्थैर्हरियूथपान् । आरुरोह तदा रामस्तद् विमानमनुत्तमम् ॥ ११ ॥ अङ्केनादाय वैदेहीं लज्जमानां मनस्विनीम् । लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा विक्रान्तेन धनुष्मता ॥ १२ ॥
भावार्थ
उन वानरयूथपतियोंको रत्न और धनसे पूजित हुआ देख उस समय भगवान् श्रीराम लजाती हुई मनस्विनी विदेहकुमारीको अङ्कमें लेकर पराक्रमी धनुर्धर बन्धु लक्ष्मणके साथ उस उत्तम विमानपर आरूढ़ हुए ॥ ११-१२ ॥
अब्रवीत् स विमानस्थः पूजयन् सर्वेवानरान् । सुग्रीवं च महावीर्यं काकुत्स्थः सविभीषणम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
विमानपर बैठकर समस्त वानरोंका समादर करते हुए उन ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामने विभीषणसहित महापराक्रमी सुग्रीवसे कहा—॥ १३ ॥
मित्रकार्यं कृतमिदं भवद्भिर्वानरर्षभाः । अनुज्ञाता मया सर्वे यथेष्टं प्रतिगच्छत ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘वानरश्रेष्ठ वीरो ! आपलोगोंने अपने इस मित्रका कार्य मित्रोचित रीतिसे ही भलीभाँति सम्पन्न किया । अब आप सब अपने-अपने अभीष्ट स्थानोंको चले जायँ ॥ १४ ॥
यत् तु कार्ये वयस्येन स्निग्धेन च हितेन च । कृतं सुग्रीव तत् सर्वे भवताधर्मभीरुणा ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘सखे सुग्रीव ! एक हितैषी एवं प्रेमी मित्रको जो काम करना चाहिये, वह सब तुमने पूरा-पूरा कर दिखाया; क्योंकि तुम अधर्मसे डरनेवाले हो ॥ १५ ॥
किष्किन्धां प्रति याह्याशु स्वसैन्येनाभिसंवृतः । स्वराज्ये वस लङ्कायां मया दत्ते विभीषण । न त्वां धर्षयितुं शक्ताः सेन्द्रा अपि दिवौकसः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘वानरराज ! अब तुम अपनी सेनाके साथ शीघ्र ही किष्किन्धापुरीको चले जाओ । विभीषण ! तुम भी लङ्कामें मेरे दिये हुए अपने राज्यपर स्थिर रहो; अब इन्द्र आदि देवता भी तुम्हारा कुछ बिगाड़ नहीं सकते हैं ॥ १६ ॥
अयोध्यां प्रति यास्यामि राजधानीं पितुर्मम । अभ्यनुज्ञातुमिच्छामि सर्वानामन्त्रयामि वः ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘अब इस समय मैं अपने पिताकी राजधानी अयोध्याको जाऊँगा । इसके लिये आप सब लोगोंसे पूछता हूँ और सबकी अनुमति चाहता हूँ’ ॥ १७ ॥
एवमुक्तास्तु रामेण हरीन्द्रा हरयस्तथा । ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे राक्षसश्च विभीषणः ॥ १८ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर सभी वानर-सेनापति तथा राक्षसराज विभीषण हाथ जोड़कर कहने लगे—॥ १८ ॥
अयोध्यां गन्तुमिच्छामः सर्वान् नयतु नो भवान् । मुदुका विचरिष्यामो वनान्युपवनानि च ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘भगवन् ! हम भी अयोध्यापुरीको चलना चाहते हैं, आप हमें भी अपने साथ ले चलिये । वहाँ हम प्रसन्नतापूर्वक वनों और उपवनोंमें विचरेंगे ॥ १९ ॥
दृष्ट्वा त्वामभिषेकार्द्रं कौसल्यामभिवाद्य च । अचिरादागमिष्यामः स्वगृहान् नृपसत्तम ॥ २० ॥
भावार्थ
‘नृपश्रेष्ठ ! राज्याभिषेकके समय मन्त्रपूत जलसे भीगे हुए आपके श्रीविग्रहकी झाँकी करके माता कौसल्याके चरणोंमें मस्तक झुकाकर हम शीघ्र अपने घर लौट आयेंगे’ ॥ २० ॥
एवमुक्तस्तु धर्मात्मा वानरैः सविभीषणैः । अब्रवीद् वानरान् रामः ससुग्रीवविभीषणान् ॥ २१ ॥
भावार्थ
विभीषणसहित वानरोंके इस प्रकार अनुरोध करनेपर श्रीरामने सुग्रीव तथा विभीषणसहित उन वानरोंसे कहा—॥२१॥
प्रियात् प्रियतरं लब्धं यदहं ससुहृज्जनः । सर्वैर्भवद्भिः सहितः प्रीतिं लप्स्ये पुरीं गतः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘मित्रो ! यह तो मेरे लिये प्रियसे भी प्रिय बात होगी— परम प्रिय वस्तुका लाभ होगा, यदि मैं आप सभी सुहृदोंके साथ अयोध्यापुरीको चल सकूँ । इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता प्राप्त होगी ॥ २२ ॥
क्षिप्रमारोह सुग्रीव विमानं सह वानरैः । त्वमप्यारोह सामात्यो राक्षसेन्द्र विभीषण ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘सुग्रीव ! तुम सब वानरोंके साथ शीघ्र ही इस विमानपर चढ़ जाओ । राक्षसराज विभीषण ! तुम भी मन्त्रियोंके साथ विमानपर आरूढ़ हो जाओ’ ॥ २३ ॥
ततः स पुष्पकं दिव्यं सुग्रीवः सह वानरैः । आरुरोह मुदा युक्तः सामात्यश्च विभीषणः ॥ २४ ॥ तेष्वारूढेषु सर्वेषु कौबेरं परमासनम् । राघवेणाभ्यनुज्ञातमुत्पपात विहायसम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
तब वानरोंसहित सुग्रीव और मन्त्रियोंसहित विभीषण बड़ी प्रसन्नताके साथ उस दिव्य पुष्पकविमानपर चढ़ गये ॥ उन सबके चढ़ जानेपर कुबेरका वह उत्तम आसन पुष्पकविमान श्रीरघुनाथजीकी आज्ञा पाकर आकाशको उड़ चला ॥ २५ ॥
खगतेन विमानेन हंसयुक्तेन भास्वता । प्रहृष्टश्च प्रतीतश्च बभौ रामः कुबेरवत् ॥ २६ ॥
भावार्थ
आकाशमें पहुँचे हुए उस हंसयुक्त तेजस्वी विमानसे यात्रा करते हुए पुलकित एवं प्रसन्नचित्त श्रीराम साक्षात् कुबेरके समान शोभा पा रहे थे ॥ २६ ॥
ते सर्वे वानरर्क्षाश्च राक्षसाश्च महाबलाः । यथासुखमसम्बाधं दिव्ये तस्मिन्नुपाविशन् ॥ २७ ॥
भावार्थ
वे सब वानर, भालू और महाबली राक्षस उस दिव्य विमानमें बड़े सुखसे फैलकर बैठे हुए थे । किसीको किसीसे धक्का नहीं खाना पड़ता था ॥ २७ ॥
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