युद्धकाण्ड, सर्ग 12
स तां परिषदं कृत्स्नां समीक्ष्य समितिंजयः । प्रचोदयामास तदा प्रहस्तं वाहिनीपतिम् ॥ १ ॥
भावार्थ
शत्रुविजयी रावणने उस सम्पूर्ण सभाकी ओर दृष्टिपात करके सेनापति प्रहस्तको उस समय इस प्रकार आदेश दिया— ॥ १ ॥
सेनापते यथा ते स्युः कृतविद्याश्चतुर्विधाः । योधा नगररक्षायां तथा व्यादेष्टुमर्हसि ॥ २ ॥
भावार्थ
‘सेनापते ! तुम सैनिकोंको ऐसी आज्ञा दो, जिससे तुम्हारे अस्त्रविद्यामें पारंगत रथी, घुड़सवार, हाथीसवार और पैदल योद्धा नगरकी रक्षामें तत्पर रहें’ ॥ २ ॥
स प्रहस्तः प्रणीतात्मा चिकीर्षन् राजशासनम् । विनिक्षिपद् बलं सर्वं बहिरन्तश्च मन्दिरे ॥ ३ ॥
भावार्थ
अपने मनको वशमें रखनेवाले प्रहस्तने राजाके आदेशका पालन करनेकी इच्छासे सारी सेनाको नगरके बाहर और भीतर यथायोग्य स्थानोंपर नियुक्त कर दिया ॥ ३ ॥
ततो विनिक्षिप्य बलं सर्वं नगरगुप्तये । प्रहस्तः प्रमुखे राज्ञो निषसाद जगाद च ॥ ४ ॥
भावार्थ
नगरकी रक्षाके लिये सारी सेनाको तैनात करके प्रहस्त राजा रावणके सामने आ बैठा और इस प्रकार बोला—॥४॥
विहितं बहिरन्तश्च बलं बलवतस्तव । कुरुष्वाविमनाः क्षिप्रं यदभिप्रेतमस्ति ते ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘राक्षसराज ! आप महाबली महाराजकी सेनाको मैंने नगरके बाहर और भीतर यथास्थान नियुक्त कर दिया है । अब आप स्वस्थचित्त होकर शीघ्र ही अपने अभीष्ट कार्यका सम्पादन कीजिये’ ॥ ५ ॥
प्रहस्तस्य वचः श्रुत्वा राजा राज्यहितैषिणः । सुखेप्सुः सुहृदां मध्ये व्याजहार स रावणः ॥ ६ ॥
भावार्थ
राज्यका हित चाहनेवाले प्रहस्तकी यह बात सुनकर अपने सुखकी इच्छा रखनेवाले रावणने सुहृदोंके बीचमें यह बात कही—॥ ६ ॥
प्रियाप्रिये सुखे दुःखे लाभालाभे हिताहिते । धर्मकामार्थकृच्छ्रेषु यूयमर्हथ वेदितुम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘सभासदो ! धर्म, अर्थ और कामविषयक संकट उपस्थित होनेपर आपलोग प्रिय-अप्रिय, सुख-दुःख, लाभ-हानि और हिताहितका विचार करनेमें समर्थ हैं ॥ ७ ॥
सर्वकृत्यानि युष्माभिः समारब्धानि सर्वदा । मन्त्रकर्मनियुक्तानि न जातु विफलानि मे ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘आपलोगोंने सदा परस्पर विचार करके जिन-जिन कार्यों-‘का आरम्भ किया है, वे सब-के-सब मेरे लिये कभी निष्फल नहीं हुए हैं ॥ ८ ॥
ससोमग्रहनक्षत्रैर्मरुद्भिरिव वासवः । भवद्भिरहमत्यर्थं वृतः श्रियमवाप्नुयाम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘जैसे चन्द्रमा, ग्रह और नक्षत्रोंसहित मरुद्गणोंसे घिरे हुए इन्द्र स्वर्गकी सम्पत्तिका उपभोग करते हैं, उसी भाँति आपलोगोंसे घिरा रहकर मैं भी लङ्काकी प्रचुर राजलक्ष्मीका सुख भोगता रहूँ—यही मेरी अभिलाषा है ॥ ९ ॥
अहं तु खलु सर्वान् वः समर्थयितुमुद्यतः । कुम्भकर्णस्य तु स्वप्नान्नेमममर्थमचोदयम् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘मैंने जो काम किया है, उसे मैं पहले ही आप सबके सामने रखकर आपके द्वारा उसका समर्थन चाहता था, परंतु उस समय कुम्भकर्ण सोये हुए थे, इसलिये मैंने इसकी चर्चा नहीं चलायी ॥ १० ॥
अयं हि सुप्तः षण्मासान् कुम्भकर्णो महाबलः । सर्वशस्त्रभृतां मुख्यः स इदानीं समुत्थितः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महाबली कुम्भकर्ण छः महीनेसे सो रहे थे । अभी इनकी नींद खुली है ॥ ११ ॥
इयं च दण्डकारण्याद् रामस्य महिषी प्रिया । रक्षोभिश्चरितोद्देशादानीता जनकात्मजा ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘मैं दण्डकारण्यसे, जो राक्षसोंके विचरनेका स्थान है, रामकी प्यारी रानी जनकदुलारी सीताको हर लाया हूँ ॥ १२ ॥
सा मे न शय्यामारोढुमिच्छत्यलसगामिनी । त्रिषु लोकेषु चान्या मे न सीतासदृशी तथा ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘किंतु वह मन्दगामिनी सीता मेरी शय्यापर आरूढ़ होना नहीं चाहती है । मेरी दृष्टिमें तीनों लोकोंके भीतर सीताके समान सुन्दरी दूसरी कोई स्त्री नहीं है ॥ १३ ॥
तनुमध्या पृथुश्रोणी शरदिन्दुनिभानना । हेमबिम्बनिभा सौम्या मायेव मयनिर्मिता ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘उसके शरीरका मध्यभाग अत्यन्त सूक्ष्म है, कटिके पीछे-का भाग स्थूल है, मुख शरत्कालके चन्द्रमाको लजित करता है, वह सौम्य रूप और स्वभाववाली सीता सोनेकी बनी हुई प्रतिमा-सी जान पड़ती है । ऐसा लगता है, जैसे वह मयासुरकी रची हुई कोई माया हो ॥ १४ ॥
सुलोहिततलौ श्लक्ष्णौ चरणौ सुप्रतिष्ठितौ । दृष्ट्वा ताम्रनखौ तस्या दीप्यते मे शरीरजः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘उसके चरणोंके तलवे लाल रंगके हैं । दोनों पैर सुन्दर, चिकने और सुडौल हैं तथा उनके नख ताँबे-जैसे लाल हैं । सीताके उन चरणोंको देखकर मेरी कामाग्नि प्रज्वलित हो उठती है ॥ १५ ॥
हुताग्नेरर्चिसंकाशामेनां सौरीमिव प्रभाम् । उन्नसं विमलं वल्गु वदनं चारुलोचनम् ॥ १६ ॥ पश्यंस्तदवशस्तस्याः कामस्य वशमेयिवान् ।
भावार्थ
‘जिसमें घीकी आहुति डाली गयी हो, उस अग्निकी लपट और सूर्यकी प्रभाके समान इस तेजस्विनी सीताको देखकर तथा ऊँची नाक और विशाल नेत्रोंसे सुशोभित उसके निर्मल एवं मनोहर मुखका अवलोकन करके मैं अपने वशमें नहीं रह गया हूँ । कामने मुझे अपने अधीन कर लिया है ॥ १६½ ॥
क्रोधहर्षसमानेन दुर्वर्णकरणेन च ॥ १७ ॥ शोकसंतापनित्येन कामेन कलुषीकृतः ।
भावार्थ
‘जो क्रोध और हर्ष दोनों अवस्थाओंमें समानरूपसे बना रहता है, शरीरकी कान्तिको फीकी कर देता है और शोक तथा संतापके समय भी कभी मनसे दूर नहीं होता, उस कामने मेरे हृदयको कलुषित ( व्याकुल ) कर दिया है ॥ १७½ ॥
सा तु संवत्सरं कालं मामयाचत भामिनी ॥ १८ ॥ प्रतीक्षमाणा भर्तारं राममायतलोचना । तन्मया चारुनेत्रायाः प्रतिज्ञातं वचः शुभम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘विशाल नेत्रोंवाली माननीय सीताने मुझसे एक वर्षका समय माँगा है । इस बीचमें वह अपने पति श्रीरामकी प्रतीक्षा करेगी । मैंने मनोहर नेत्रोंवाली सीताके उस सुन्दर वचनको सुनकर उसे पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली है * ॥ १८-१९ ॥
श्रान्तोऽहं सततं कामाद् यातो हय इवाध्वनि । कथं सागरमक्षोभ्यं तरिष्यन्ति वनौकसः ॥ २० ॥ बहुसत्त्वझषाकीर्णं तौ वा दशरथात्मजौ ।
भावार्थ
‘जैसे बड़े मार्गमें चलते-चलते घोड़ा थक जाता है, उसी प्रकार मैं भी कामपीड़ासे थकावटका अनुभव कर रहा हूँ । वैसे तो मुझे शत्रुओंकी ओरसे कोई डर नहीं है; क्योंकि वे वनवासी वानर अथवा वे दोनों दशरथकुमार श्रीराम और लक्ष्मण असंख्य जल-जन्तुओं तथा मत्स्योंसे भरे हुए अलङ्घ्य महासागरको कैसे पार कर सकेंगे ? ॥ २०½ ॥
अथवा कपिनैकेन कृतं नः कदनं महत् ॥ २१ ॥ दुर्ज्ञेयाः कार्यगतयो ब्रूत यस्य यथामति । मानुषाद्यो भयं नास्ति तथापि तु विमृश्यताम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘अथवा एक ही वानरने आकर हमारे यहाँ महान् संहार मचा दिया था । इसलिये कार्यसिद्धिके उपायोंको समझ लेना अत्यन्त कठिन है । अतः जिसको अपनी बुद्धिके अनुसार जैसा उचित जान पड़े, वह वैसा ही बतावे । तुम सब लोग अपने विचार अवश्य व्यक्त करो । यद्यपि हमें मनुष्यसे कोई भय नहीं है, तथापि तुम्हें विजयके उपायपर विचार तो करना ही चाहिये ॥ २१-२२ ॥
तदा देवासुरे युद्धे युष्माभिः सहितोऽजयम् । ते मे भवन्तश्च तथा सुग्रीवप्रमुखान् हरीन् ॥ २३ ॥ परे पारे समुद्रस्य पुरस्कृत्य नृपात्मजौ । सीतायाः पदवीं प्राप्य सम्प्राप्तौ वरुणालयम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘उन दिनों जब देवताओं और असुरोंका युद्ध चल रहा था, उसमें आप सब लोगोंकी सहायतासे ही मैंने विजय प्राप्त की थी । आज भी आप मेरे उसी प्रकार सहायक हैं । वे दोनों राजकुमार सीताका पता पाकर सुग्रीव आदि वानरोंको साथ लिये समुद्रके उस तटतक पहुँच चुके हैं ॥ २३-२४ ॥
अदेया च यथा सीता वध्यौ दशरथात्मजौ । भवद्भिर्मन्यतां मन्त्रः सुनीतं चाभिधीयताम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘अब आपलोग आपसमें सलाह कीजिये और कोई ऐसी सुन्दर नीति बताइये, जिससे सीताको लौटाना न पड़े तथा वे दोनों दशरथकुमार मारे जायँ ॥ २५ ॥
नहि शक्ति प्रपश्यामि जगत्यन्यस्य कस्यचित् । सागरं वानरैस्तीर्त्वा निश्चयेन जयो मम ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘वानरोंके साथ समुद्रको पार करके यहाँतक आनेकी शक्ति जगत्में रामके सिवा और किसीमें नहीं देखता हूँ ( किंतु राम और वानर यहाँ आकर भी मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकते ), अतः यह निश्चय है कि जीत मेरी ही होगी’ ॥ २६ ॥
तस्य कामपरीतस्य निशम्य परिदेवितम् । कुम्भकर्णः प्रचुक्रोध वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २७ ॥
भावार्थ
कामातुर रावणका यह खेदपूर्ण प्रलाप सुनकर कुम्भकर्णको क्रोध आ गया और उसने इस प्रकार कहा—॥ २७ ॥
यदा तु रामस्य सलक्ष्मणस्य प्रसह्य सीता खलु सा इहाहृता । सकृत् समीक्ष्यैव सुनिश्चितं तदा भजेत चित्तं यमुनेव यामुनम् ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘जब तुम लक्ष्मणसहित श्रीरामके आश्रमसे एक बार स्वयं ही मनमाना विचार करके सीताको यहाँ बलपूर्वक हर लाये थे, उसी समय तुम्हारे चित्तको हमलोगोंके साथ इस विषयमें सुनिश्चित विचार कर लेना चाहिये था । ठीक उसी तरह जैसे यमुना जब पृथ्वीपर उतरनेको उद्यत हुईं, तभी उन्होंने यमनोत्री पर्वतके कुण्डविशेषको अपने जलसे पूर्ण किया था ( पृथ्वीपर उतर जानेके बाद उनका वेग जब समुद्रमें जाकर शान्त हो गया, तब वे पुनः उस कुण्डको नहीं भर सकतीं, उसी प्रकार तुमने भी जब विचार करनेका अवसर था, तब तो हमारे साथ बैठकर विचार किया नहीं । अब अवसर बिताकर सारा काम बिगड़ जानेके बाद तुम विचार करने चले हो ) ॥ २८ ॥
सर्वमेतन्महाराज कृतमप्रतिमं तव । विधीयेत सहास्माभिरादावेवास्य कर्मणः ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘महाराज ! तुमने जो यह छलपूर्वक छिपकर परस्त्री-हरण आदि कार्य किया है, यह सब तुम्हारे लिये बहुत अनुचित है । इस पापकर्मको करनेसे पहले ही आपको हमारे साथ परामर्श कर लेना चाहिये था ॥ २९ ॥
न्यायेन राजकार्याणि यः करोति दशानन । न स संतप्यते पश्चान्निश्चितार्थमतिर्नृपः ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘दशानन ! जो राजा सब राजकार्य न्यायपूर्वक करता है, उसकी बुद्धि निश्चयपूर्ण होनेके कारण उसे पीछे पछताना नहीं पड़ता है ॥ ३० ॥
अनुपायेन कर्माणि विपरीतानि यानि च । क्रियमाणानि दुष्यन्ति हवींष्यप्रयतेष्विव ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘जो कर्म उचित उपायका अवलम्बन किये बिना ही किये जाते हैं तथा जो लोक और शास्त्रके विपरीत होते हैं, वे पापकर्म उसी तरह दोषकी प्राप्ति कराते हैं, जैसे अपवित्र आभिचारिक यज्ञोंमें होमे गये हविष्य ॥ ३१ ॥
यः पश्चात् पूर्वकार्याणि कर्माण्यभिचिकीर्षति । पूर्वं चापरकार्याणि स न वेद नयानयौ ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘जो पहले करने योग्य कार्योंको पीछे करना चाहता है और पीछे करने योग्य काम पहले ही कर डालता है, वह नीति और अनीतिको नहीं जानता ॥ ३२ ॥
चपलस्य तु कृत्येषु प्रसमीक्ष्याधिकं बलम् । छिद्रमन्ये प्रपद्यन्ते क्रौञ्चस्य खमिव द्विजाः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘शत्रुलोग अपने विपक्षीके बलको अपनेसे अधिक देखकर भी यदि वह हर काममें चपल ( जल्दबाज ) है तो उसका दमन करनेके लिये उसी तरह उसके छिद्र ढूँढ़ते रहते हैं, जैसे पक्षी दुर्लङ्घ्य क्रौञ्च पर्वतको लाँघकर आगे बढ़नेके लिये उसके ( उस ) छिद्रका आश्रय लेते हैं ( जिसे कुमार कार्तिकेयने अपनी शक्तिका प्रहार करके बनाया था ) ॥ ३३॥
त्वयेदं महदारब्धं कार्यमप्रतिचिन्तितम् । दिष्ट्या त्वां नावधीद् रामो विषमिश्रमिवामिषम् ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘महाराज ! तुमने भावी परिणामका विचार किये बिना ही यह बहुत बड़ा दुष्कर्म आरम्भ किया है । जैसे विषमिश्रित भोजन खानेवालेके प्राण हर लेता है, उसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारा वध कर डालेंगे । उन्होंने अभीतक तुम्हें मार नहीं डाला, इसे अपने लिये सौभाग्यकी बात समझो ॥ ३४ ॥
तस्मात् त्वया समारब्धं कर्म ह्यप्रतिमं परैः । अहं समीकरिष्यामि हत्वा शत्रूंस्तवानघ ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘अनघ ! यद्यपि तुमने शत्रुओंके साथ अनुचित कर्म आरम्भ किया है, तथापि मैं तुम्हारे शत्रुओंका संहार करके सबको ठीक कर दूँगा ॥ ३५ ॥
अहमुत्सादयिष्यामि शत्रूंस्तव निशाचर । यदि शक्रविवस्वन्तौ यदि पावकमारुतौ । तावहं योधयिष्यामि कुबेरवरुणावपि ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘निशाचर ! तुम्हारे शत्रु यदि इन्द्र, सूर्य, अग्नि, वायु, कुबेर और वरुण भी हों तो मैं उनके साथ युद्ध करूँगा और तुम्हारे सभी शत्रुओंको उखाड़ फेंकूँगा ॥ ३६ ॥
गिरिमात्रशरीरस्य महापरिघयोधिनः । नर्दतस्तीक्ष्णदंष्ट्रस्य बिभीयाद् वै पुरंदरः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘मैं पर्वतके समान विशाल एवं तीखी दाढ़ोंसे युक्त शरीर धारण करके महान् परिघ हाथमें ले समरभूमिमें जूझता हुआ जब गर्जना करूँगा, उस समय देवराज इन्द्र भी भयभीत हो जायँगे ॥ ३७ ॥
पुनर्मां स द्वितीयेन शरेण निहनिष्यति । ततोऽहं तस्य पास्यामि रुधिरं काममाश्वस ॥ ३८ ॥
भावार्थ
‘राम मुझे एक बाणसे मारकर दूसरे बाणसे मारने लगेंगे, उसी बीचमें मैं उनका खून पी लूँगा । इसलिये तुम पूर्णतः निश्चिन्त हो जाओ ॥ ३८ ॥
वधेन वै दाशरथेः सुखावहं जयं तवाहर्तुमहं यतिष्ये । हत्वा च रामं सह लक्ष्मणेन खादामि सर्वान् हरियूथमुख्यान्॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘मैं दशरथनन्दन श्रीरामका वध करके तुम्हारे लिये सुखदायिनी विजय सुलभ करानेका प्रयत्न करूँगा । लक्ष्मणसहित रामको मारकर समस्त वानरयूथपतियोंको खा जाऊँगा ॥ ३९ ॥
रमस्व कामं पिब चाग्र्यवारुणीं कुरुष्व कार्याणि हितानि विज्वरः । मया तु रामे गमिते यमक्षयं चिराय सीता वशगा भविष्यति ॥ ४० ॥
भावार्थ
‘तुम मौजसे विहार करो । उत्तम वारुणीका पान करो और निश्चिन्त होकर अपने लिये हितकर कार्य करते रहो । मेरे द्वारा रामके यमलोक भेज दिये जानेपर सीता चिरकालके लिये तुम्हारे अधीन हो जायगी’ ॥ ४० ॥
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