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युद्धकाण्ड, सर्ग 106

सारथिः स रथं हृष्टः परसैन्यप्रधर्षणम् । गन्धर्वनगराकारं समुच्छ्रितपताकिनम् ॥ १ ॥ युक्तं परमसम्पन्नैर्वाजिभिर्हेममालिभिः । युद्धोपकरणैः पूर्णं पताकाध्वजमालिनम् ॥ २ ॥ ग्रसन्तमिव चाकाशं नादयन्तं वसुंधराम् । प्रणाशं परसैन्यानां स्वसैन्यस्य प्रहर्षणम् ॥ ३ ॥ रावणस्य रथं क्षिप्रं चोदयामास सारथिः ।

भावार्थ

रावणके सारथिने हर्ष और उत्साहसे युक्त होकर उसके रथको शीघ्रतापूर्वक हाँका । वह रथ शत्रुसेनाको कुचल डालनेवाला था और गन्धर्वनगरके समान आश्चर्यजनक दिखायी देता था । उसपर बहुत ऊँची पताका फहरा रही थी । उस रथमें उत्तम गुणोंसे सम्पन्न और सोनेके हारोंसे अलंकृत घोड़े जुते हुए थे । रथके भीतर युद्धकी आवश्यक सामग्री भरी पड़ी थी । उस रथने ध्वजा-पताकाओंकी तो माला-सी पहन रक्खी थी । वह आकाशको, अपना ग्रास बनाता हुआ-सा जान पड़ता था । वसुन्धराको अपनी घर्घर-ध्वनिसे निनादित कर रहा था । वह शत्रुकी सेनाओंका नाशक और अपनी सेनाके योद्धाओंका हर्ष बढ़ानेवाला था ॥ १–३½ ॥

तमापतन्तं सहसा स्वनवन्तं महाध्वजम् ॥ ४ ॥ रथं राक्षसराजस्य नरराजो ददर्श ह ।

भावार्थ

नरराज श्रीरामचन्द्रजीनें सहसा वहाँ आते हुए, विशाल ध्वजसे अलंकृत और घोर घर्घर-ध्वनिसे युक्त राक्षसराज रावणके उस रथको देखा ॥ ४½ ॥

कृष्णवाजिसमायुक्तं युक्तं रौद्रेण वर्चसा ॥ ५ ॥ दीप्यमानमिवाकाशे विमानं सूर्यवर्चसम् ।

भावार्थ

उसमें काले रंगके घोड़े जुते हुए थे । उसकी कान्ति बड़ी भयंकर थी । वह आकाशमें प्रकाशित होनेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी विमानके समान दृष्टिगोचर होता था ॥ ५३½ ॥

तडित्पताकागहनं दर्शितेन्द्रायुधप्रभम् ॥ ६ ॥ शरधारा विमुञ्चन्तं धाराधरमिवाम्बुदम् ।

भावार्थ

उसपर फहराती हुई पताकाएँ विद्युत्के समान जान पड़ती थीं । वहाँ जो रावणका धनुष था, उसके द्वारा वह रथ इन्द्र-धनुषकी छटा छटकाता था और बाणोंकी धारावाहिक वृष्टि करता था । इससे वह जलधारावर्षी मेघके समान प्रतीत होता था ॥ ६½ ॥

स दृष्ट्वा मेघसंकाशमापतन्तं रथं रिपोः ॥ ७ ॥ गिरेर्वज्राभिमृष्टस्य दीर्यतः सद्दशाखनम् । विस्फारयन् वै वेगेन बालचन्द्रानतं धनुः ॥ ८ ॥ उवाच मातलिं रामः सहस्राक्षस्य सारथिम् ।

भावार्थ

उसकी आवाज ऐसी मालूम होती थी, मानो वज्रके आघातसे किसी पर्वतके फटनेका शब्द हो रहा हो । मेघके समान प्रतीत होनेवाले शत्रुके उस रथको आता देख श्रीरामचन्द्रजीने बड़े वेगसे अपने धनुषपर टंकार दी । उस समय उनका वह धनुष द्वितीयाके चन्द्रमा-जैसा दिखायी देता था । श्रीरामने इन्द्रसारथि मातलिसे कहा—॥ ७-८½ ॥

मातले पश्य संरब्धमापतन्तं रथं रिपोः ॥ ९ ॥ यथापसव्यं पतता वेगेन महता पुनः । समरे हन्तुमात्मानं तथानेन कृता मतिः ॥ १० ॥

भावार्थ

‘मातले ! देखो, मेरे शत्रु रावणका रथ बड़े वेगसे आ रहा है । रावण जिस प्रकार प्रदक्षिणभावसे महान् वेगके साथ पुनः आ रहा है, उससे जान पड़ता है, इसने समरभूमिमें अपने वधका निश्चय कर लिया है ॥ ९-१० ॥

तदप्रमादमातिष्ठ प्रत्युद्गच्छ रथं रिपोः । विध्वंसयितुमिच्छामि वायुर्मेघमिवोत्थितम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘अतः अब तुम सावधान हो जाओ और शत्रुके रथकी ओर आगे बढ़ो । जैसे हवा उमड़े हुए बादलोंको छिन्न-भिन्न कर डालती है, उसी प्रकार आज मैं शत्रुके रथका विध्वंस करना चाहता हूँ ॥ ११ ॥

अविक्कवमसम्भ्रान्तमव्यग्रहृदयेक्षणम् । रश्मिसंचारनियतं प्रचोदय रथं द्रुतम् ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘भय तथा घबराहट छोड़कर मन और नेत्रोंको स्थिर रखते हुए घोड़ोंकी बागडोर काबूमें रक्खो और रथको तेज चलाओ ॥ १२ ॥

कामं न त्वं समाधेयः पुरंदररथोचितः । युयुत्सुरहमेकाग्रः स्मारये त्वां न शिक्षये ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘तुम्हें देवराज इन्द्रका रथ हाँकनेका अभ्यास है; अतः तुमको कुछ सिखानेकी आवश्यकता नहीं है । मैं एकाग्रचित्त होकर युद्ध करना चाहता हूँ । इसलिये तुम्हारे कर्तव्यका स्मरणमात्र करा रहा हूँ । तुम्हें शिक्षा नहीं देता हूँ’ ॥ १३ ॥

परितुष्टः स रामस्य तेन वाक्येन मातलिः । प्रचोदयामास रथं सुरसारथिरुत्तमः ॥ १४ ॥ अपसव्यं ततः कुर्वन् रावणस्य महारथम् । चक्रसम्भूतरजसा रावणं व्यवधूनयत् ॥ १५ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीके इस वचनसे देवताओंके श्रेष्ठ सारथि मातलिको बड़ा संतोष हुआ और उन्होंने रावणके विशाल रथको दाहिने रखते हुए अपने रथको आगे बढ़ाया । उसके पहियेसे इतनी धूल उड़ी कि रावण उसे देखकर काँप उठा ॥ १४-१५ ॥

ततः क्रुद्धो दशग्रीवस्ताम्रविस्फारितेक्षणः । रथप्रतिमुखं रामं सायकैरवधूनयत् ॥ १६ ॥

भावार्थ

इससे दशमुख रावणको बड़ा क्रोध हुआ । वह अपनी लाल-लाल आँखें फाड़कर देखता हुआ रथके सामने हुए श्रीरामपर बाणोंकी वृष्टि करने लगा ॥ १६ ॥

धर्षणामर्षितो रामो धैर्यं रोषेण लम्भयन् । जग्राह सुमहावेगमैन्द्रं युधि शरासनम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

उसके इस आक्रमणसे श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा क्रोध हुआ । फिर रोषके साथ ही धैर्य धारण करके युद्धस्थलमें उन्होंने इन्द्रका धनुष हाथमें लिया, जो बड़ा ही वेगशाली था ॥ १७ ॥

शरांश्च सुमहावेगान् सूर्यरश्मिसमप्रभान् । तदुपोढं महद् युद्धमन्योन्यवधकाङ्क्षिणोः । परस्पराभिमुखयोर्दृप्तयोरिव सिंहयोः ॥ १८ ॥

भावार्थ

साथ ही सूर्यकी किरणोंके समान प्रकाशित होनेवाले महान् वेगशाली बाण भी ग्रहण किये । तत्पश्चात् एक दूसरेके वधकी इच्छा रखकर श्रीराम और रावण दोनोंमें बड़ा भारी युद्ध आरम्भ हुआ । दोनों दर्पसे भरे हुए दो सिंहोंके समान आमने-सामने डटे हुए थे ॥ १८ ॥

ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः । समीयुर्द्वैरथं द्रष्टुं रावणक्षयकाङ्क्षिणः ॥ १९ ॥

भावार्थ

उस समय रावणके विनाशकी इच्छा रखनेवाले देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षि उन दोनोंके द्वैरथ युद्धको देखनेके लिये वहाँ एकत्र हो गये ॥ १९ ॥

समुत्पेतुरथोत्पाता दारुणा रोमहर्षणाः । रावणस्य विनाशाय राघवस्योदयाय च ॥ २० ॥

भावार्थ

उस युद्धके समय ऐसे भयंकर उत्पात होने लगे, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाले थे । उनसे रावणके विनाश और श्रीरामचन्द्रजीके अभ्युदयकी सूचना मिलती थी ॥ २० ॥

ववर्ष रुधिरं देवो रावणस्य रथोपरि । वाता मण्डलिनस्तीव्रा व्यपसव्यं प्रचक्रमुः ॥ २१ ॥

भावार्थ

मेघ रावणके रथपर रक्तकी वर्षा करने लगे । बड़े वेगसे उठे हुए बवंडर उसकी वामावर्त परिक्रमा करने लगे ॥२१॥

महद्गृध्रकुलं चास्य भ्रममाणं नभस्थले । येन येन रथो याति तेन तेन प्रधावति ॥ २२ ॥

भावार्थ

जिस-जिस मार्गसे रावणका रथ जाता था, उसी-उसी ओर आकाशमें मँडराता हुआ गीधोंका महान् समुदाय दौड़ा जाता था ॥ २२ ॥

संध्यया चावृता लङ्का जपापुष्पनिकाशया । दृश्यते सम्प्रदीप्तेव दिवसेऽपि वसुंधरा ॥ २३ ॥

भावार्थ

असमयमें ही जपा ( अड़हुल ) के फूलकी-सी लाल रंगवाली संध्यासे आवृत हुई लङ्कापुरीकी भूमि दिनमें भी जलती हुई-सी दिखायी देती थी ॥ २३ ॥

सनिर्घाता महोल्काश्च सम्प्रपेतुर्महास्वनाः । विषादयंस्ते रक्षांसि रावणस्य तदाहिताः ॥ २४ ॥

भावार्थ

रावणके सामने वज्रपातकी-सी गड़गड़ाहट और बड़ी भारी आवाजके साथ बड़ी-बड़ी उल्काएँ गिरने लगीं, जो उसके अहितकी सूचना दे रही थीं । उन उत्पातोंने राक्षसोंको विषादमें डाल दिया ॥ २४ ॥

रावणश्च यतस्तत्र प्रचचाल वसुंधरा । रक्षसां च प्रहरतां गृहीता इव बाहवः ॥ २५ ॥

भावार्थ

रावण जहाँ-जहाँ जाता, वहाँ-वहाँकी भूमि डोलने लगती थी । प्रहार करते हुए राक्षसोंकी भुजाएँ ऐसी निकम्मी हो गयी थीं, मानो उन्हें किन्हींने पकड़ लिया हो ॥ २५ ॥

ताम्राः पीताः सिताः श्वेताः पतिताः सूर्यरश्मयः । दृश्यन्ते रावणस्याग्रे पर्वतस्येव धातवः ॥ २६ ॥

भावार्थ

रावणके आगे पड़ी हुई सूर्यदेवकी किरणें पर्वतीय धातुओंके समान लाल, पीले, सफेद और काले रंगकी दिखायी देती थीं ॥ २६ ॥

गृध्रैरनुगताश्चास्य वमन्त्यो ज्वलनं मुखैः । प्रणेदुर्मुखमीक्षन्त्यः संरब्धमशिवं शिवाः ॥ २७ ॥

भावार्थ

रावणके रोषावेशसे पूर्ण मुखकी ओर देखती और अपने-अपने मुखोंसे आग उगलती हुई गीदड़ियाँ अमङ्गलसूचक बोली बोलती थीं और उनके पीछे झुंड-के-झुंड गीध मड़राते चलते थे ॥ २७ ॥

प्रतिकूलं ववौ वायू रणे पांसून् समुत्किरन् । तस्य राक्षसराजस्य कुर्वन् दृष्टिविलोपनम् ॥ २८ ॥

भावार्थ

रणभूमिमें धूल उड़ाती वायु राक्षसराज रावणकी आँखें बंद करती हुई प्रतिकूल दिशाकी ओर बह रही थी ॥ २८ ॥

निपेतुरिन्द्राशनयः सैन्ये चास्य समन्ततः । दुर्विषह्यखरा घोरा विना जलधरोदयम् ॥ २९ ॥

भावार्थ

उसकी सेनापर सब ओरसे बिना बादलके ही दुःसह एवं कठोर आवाजके साथ भयानक बिजलियाँ गिरीं ॥ २९ ॥

दिशश्च प्रदिशः सर्वा बभूवुस्तिमिरावृताः । पांसुवर्षेण महता दुर्दर्शं च नभोऽभवत् ॥ ३० ॥

भावार्थ

समस्त दिशाएँ और विदिशाएँ अन्धकारसे आच्छन्न हो गयीं । धूलकी बड़ी भारी वर्षाके कारण आकाशका दिखायी देना कठिन हो गया ॥ ३० ॥

कुर्वत्यः कलहं घोरं सारिकास्तद्रथं प्रति । निपेतुः शतशस्तत्र दारुणा दारुणारुताः ॥ ३१ ॥ जघनेभ्यः स्फुलिङ्गाश्च नेत्रेभ्योऽश्रूणि संततम् । मुमुचुस्तस्य तुरगास्तुल्यमग्निं च वारि च ॥ ३२ ॥

भावार्थ

भयानक आवाज करनेवाली सैकड़ों दारुण सारिकाएँ आपसमें घोर कलह करती हुई रावणके रथपर गिर पड़ती थीं॥ उसके घोड़े अपने जघनस्थलसे आगकी चिनगारियाँ और नेत्रोंसे आँसू बरसा रहे थे । इस प्रकार वे एक ही साथ आग और पानी दोनों प्रकट करते थे ॥ ३२ ॥

एवंप्रकारा बहवः समुत्पाता भयावहाः । रावणस्य विनाशाय दारुणाः सम्प्रजज्ञिरे ॥ ३३ ॥

भावार्थ

इस तरह बहुत-से दारुण एवं भयंकर उत्पात प्रकट हुए, जो रावणके विनाशकी सूचना दे रहे थे ॥ ३३ ॥

रामस्यापि निमित्तानि सौम्यानि च शिवानि च । बभूवुर्जयशंसीनि प्रादुर्भूतानि सर्वशः ॥ ३४ ॥

भावार्थ

श्रीरामके सामने भी अनेक शकुन प्रकट हुए, जो सब प्रकारसे शुभ, मङ्गलमय तथा विजयके सूचक थे ॥ ३४ ॥

निमित्तानीह सौम्यानि राघवः स्वजयाय वै । दृष्ट्वा परमसंहृष्टो हतं मेने च रावणम् ॥ ३५ ॥

भावार्थ

श्रीरघुनाथजी अपनी विजयकी सूचना देनेवाले इन शुभ शकुनोंको देखकर बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने रावणको मरा हुआ ही समझा ॥ ३५ ॥

ततो निरीक्ष्यात्मगतानि राघवो रणे निमित्तानि निमित्तकोविदः । जगाम हर्षं च परां च निर्वृतिं चकार युद्धे ह्यधिकं च विक्रमम् ॥ ३६ ॥

भावार्थ

शकुनोंके ज्ञाता भगवान् श्रीराम रणभूमिमें अपनेको प्राप्त होनेवाले शुभ शकुनोंका अवलोकन करके बड़े हर्ष और परम संतोषका अनुभव करने लगे तथा उन्होंने युद्धमें अधिक पराक्रम प्रकट किया ॥ ३६ ॥

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