युद्धकाण्ड, सर्ग 103
स तु तेन तदा क्रोधात् काकुत्स्थेनार्दितो भृशम् । रावणः समरश्लाघी महाक्रोधमुपागमत् ॥ १ ॥ स दीप्तनयनोऽमर्षाच्चापमुद्यम्य वीर्यवान् । अभ्यर्दयत् सुसंक्रुद्धो राघवं परमाहवे ॥ २ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा क्रोधपूर्वक अत्यन्त पीड़ित किये जानेपर युद्धकी इच्छा रखनेवाले रावणको महान् क्रोध हुआ ॥ उसके नेत्र अग्निके समान प्रज्वलित हो उठे । उस पराक्रमी वीरने अमर्षपूर्वक धनुष उठाया और अत्यन्त कुपित हो उस महासमरमें श्रीरघुनाथजीको पीड़ित करना आरम्भ किया ॥ २ ॥
बाणधारासहस्रैस्तैः स तोयद इवाम्बरात् । राघवं रावणो बाणैस्तटाकमिव पूरयन् ॥ ३ ॥
भावार्थ
जैसे बादल आकाशसे जलकी धारा बरसाकर तालाबको भर देता है, उसी प्रकार रावणने सहस्रों बाणधाराओंकी वृष्टि करके श्रीरामचन्द्रजीको आच्छादित कर दिया ॥ ३ ॥
पूरितः शरजालेन धनुर्मुक्तेन संयुगे । महागिरिरिवाकम्प्यः काकुत्स्थो न प्रकम्पते ॥ ४ ॥
भावार्थ
युद्धस्थलमें रावणके धनुषसे छूटे हुए बाणसमूहोंसे व्याप्त हो जानेपर भी श्रीरघुनाथजी विचलित नहीं हुए; क्योंकि वे महान् पर्वतकी भाँति अचल थे ॥ ४ ॥
स शरैः शरजालानि वारयन् समरे स्थितः । गभस्तीनिव सूर्यस्य प्रतिजग्राह वीर्यवान् ॥ ५ ॥
भावार्थ
वे समराङ्गणमें अपने बाणोंसे रावणके बाणोंका निवारण करते हुए स्थिरभावसे खड़े रहे । उन पराक्रमी रघुवीरने सूर्यकी किरणोंकी भाँति शत्रुके बाणोंको ग्रहण किया ॥ ५ ॥
ततः शरसहस्राणि क्षिप्रहस्तो निशाचरः । निजघानोरसि क्रुद्धो राघवस्य महात्मनः ॥ ६ ॥
भावार्थ
तदनन्तर शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले निशाचर रावणने कुपित हो महामना राघवेन्द्रकी छातीमें सहस्रों बाण मारे ॥ ६ ॥
स शोणितसमादिग्धः समरे लक्ष्मणाग्रजः । दृश्यः फुल्ल इवारण्ये सुमहान् किंशुकद्रुमः ॥ ७ ॥
भावार्थ
समरभूमिमें उन बाणोंसे घायल हुए लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीराम रक्तसे नहा उठे और जंगलमें खिले हुए पलाशके महान् वृक्षकी भाँति दिखायी देने लगे ॥ ७ ॥
शराभिघातसंरब्धः सोऽभिजग्राह सायकान् । काकुत्स्थः सुमहातेजा युगान्तादित्यवर्चसः ॥ ८ ॥
भावार्थ
उन बाणोंके आघातसे कुपित हो महातेजस्वी श्रीरामने प्रलयकालके सूर्यकी भाँति तेजस्वी सायकोंको हाथमें लिया ॥ ८ ॥
ततोऽन्योन्यं सुसंरब्धौ ताबुभौ रामरावणौ । शरान्धकारे समरे नोपलक्षयतां तदा ॥ ९ ॥
भावार्थ
फिर तो वे दोनों परस्पर रोषावेशसे युक्त हो बाण चलाने लगे । समराङ्गणमें बाणोंसे अन्धकार-सा छा गया । उस समय श्रीराम और रावण दोनों एक दूसरेको देख नहीं पाते थे ॥९॥
ततः क्रोधसमाविष्टो रामो दशरथात्मजः । उवाच रावणं वीरः प्रहस्य परुषं वचः ॥ १० ॥
भावार्थ
इसी समय क्रोधसे भरे हुए वीर दशरथकुमार श्रीरामने रावणसे हँसते हुए कठोर वाणीमें कहा—॥ १० ॥
मम भार्या जनस्थानादज्ञानाद् राक्षसाधम । हृता ते विवशा यस्मात् तस्मात् त्वं नासि वीर्यवान्॥ ११ ॥
भावार्थ
‘नीच राक्षस ! तू मेरे अनजानमें जनस्थानसे मेरी असहाय स्त्रीको हर लाया है, इसलिये तू बलवान् या पराक्रमी तो कदापि नहीं है ॥ ११ ॥
मया विरहितां दीनां वर्तमानां महावने । वैदेहीं प्रसभं हृत्वा शूरोऽहमिति मन्यसे ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘विशाल वनमें मुझसे विलग हुई दीन अवस्थामें विद्यमान विदेहराजकुमारीका बलपूर्वक अपहरण करके तू अपनेको शूरवीर समझता है ? ॥ १२ ॥
स्त्रीषु शूर विनाथासु परदाराभिमर्शनम् । कृत्वा कापुरुषं कर्म शूरोऽहमिति मन्यसे ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘असहाय अबलाओंपर वीरता दिखानेवाले निशाचर ! परस्त्रीके अपहरण-जैसे कापुरुषोचित कर्म करके तू अपनेको शूरवीर मानता है ? ॥ १३ ॥
भिन्नमर्याद निर्लज्ज चारित्रेष्वनवस्थित । दर्पान्मृत्युमुपादाय शूरोऽहमिति मन्यसे ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘धर्मकी मर्यादा भङ्ग करनेवाले पापी, निर्लज्ज और सदाचारशून्य निशाचर ! तूने बलके घमंडसे वैदेहीके रूपमें अपनी मौत बुलायी है । क्या अब भी तू अपनेको शूरवीर समझता है ? ॥ १४ ॥
शूरेण धनदभ्रात्रा बलैः समुदितेन च । श्लाघनीयं महत्कर्म यशस्यं च कृतं त्वया ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘तू बड़ा शूरवीर, बलसम्पन्न और साक्षात् कुबेरका भाई जो है ! इसीलिये तूने यह परम प्रशंसनीय और महान् यशोवर्धक कर्म किया है ॥ १५ ॥
उत्सेकेनाभिपन्नस्य गर्हितस्याहितस्य च । कर्मणः प्राप्नुहीदानीं तस्याद्य सुमहत् फलम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘अभिमानपूर्वक किये गये उन निन्दित और अहितकर पापकर्मका जो महान् फल है, उसे तू आज अभी प्राप्त कर ले ॥ १६ ॥
शूरोऽहमिति चात्मानमवगच्छसि दुर्मते । नैव लज्जास्ति ते सीतां चौरवद् व्यपकर्षतः ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘खोटी बुद्धिवाले निशाचर ! तू अपनेको शूरतासे सम्पन्न समझता है; किंतु सीताको चोरकी तरह चुराते समय तुझे तनिक भी लज्जा नहीं आयी ? ॥ १७ ॥
यदि मत्संनिधौ सीता धर्षिता स्यात् त्वया बलात् । भ्रातरं तु खरं पश्येस्तदा मत्सायकैर्हतः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘यदि मेरे समीप तू सीताका बलपूर्वक अपहरण करता तो अबतक मेरे सायकोंसे मारा जाकर अपने भाई खरका दर्शन करता होता ॥ १८ ॥
दिष्ट्यासि मम मन्दात्मंश्चक्षुर्विषयमागतः । अद्य त्वां सायकैस्तीक्ष्णैर्नयामि यमसादनम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘मन्दबुद्धे ! सौभाग्यकी बात है कि आज तू मेरी आँखोंके सामने आ गया है । मैं अभी तुझे अपने तीखे बाणोंसे यमलोक पहुँचाता हूँ ॥ १९ ॥
अद्य ते मच्छरैश्छिन्नं शिरो ज्वलितकुण्डलम् । क्रव्यादा व्यपकर्षन्तु विकीर्णं रणपांसुषु ॥ २० ॥
भावार्थ
‘आज मेरे बाणोंसे कटकर रणभूमिकी धूलमें पड़े हुए जगमगाते कुण्डलोंसे युक्त तेरे मस्तकको मांसभक्षी जीवजन्तु घसीटें ॥ २० ॥
निपत्योरसि गृध्रास्ते क्षितौ क्षिप्तस्य रावण । पिबन्तु रुधिरं तर्षाद् बाणशल्यान्तरोत्थितम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘रावण ! तेरी लाश पृथ्वीपर फेंकी पड़ी हो, उसकी छातीपर बहुत-से गृध्र टूट पड़ें और बाणोंकी नोकसे किये गये छेदके द्वारा प्रवाहित होनेवाले तेरे खूनको बड़ी प्यासके साथ पियें ॥ २१ ॥
अद्य मद्बाणभिन्नस्य गतासोः पतितस्य ते । कर्षन् त्वन्त्राणि पतगा गरुत्मन्त इवोरगान् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘आज मेरे बाणसे विदीर्ण और प्राणशून्य होकर पड़े हुए तेरे शरीरकी आँतोंको पक्षी उसी तरह खींचें, जैसे गरुड़ सर्पोंको खींचते हैं’ ॥ २२ ॥
इत्येवं स वदन् वीरो रामः शत्रुनिबर्हणः । राक्षसेन्द्रं समीपस्थं शरवर्षैरवाकिरत् ॥ २३ ॥
भावार्थ
ऐसा कहते हुए शत्रुओंका नाश करनेवाले वीर श्रीरामने पास ही खड़े हुए राक्षसराज रावणपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ २३ ॥
बभूव द्विगुणं वीर्यं बलं हर्षश्च संयुगे । रामस्यास्त्रबलं चैव शत्रोर्निधनकाङ्क्षिणः ॥ २४ ॥
भावार्थ
उस समय युद्धस्थलमें शत्रुवधकी इच्छा रखनेवाले श्रीरामका बल, पराक्रम, उत्साह और अस्त्र-बल बढ़कर दूना हो गया ॥ २४ ॥
प्रादुर्बभूवुरस्त्राणि सर्वाणि विदितात्मनः । प्रहर्षाच्च महातेजाः शीघ्रहस्ततरोऽभवत् ॥ २५ ॥
भावार्थ
आत्मज्ञानी रघुनाथजीके सामने सभी अस्त्र अपने-आप प्रकट होने लगे । हर्ष और उत्साहके कारण महातेजस्वी भगवान् श्रीरामका हाथ बड़ी तेजीसे चलने लगा ॥ २५ ॥
शुभान्येतानि चिह्नानि विज्ञायात्मगतानि सः । भूय एवार्दयद् रामो रावणं राक्षसान्तकृत् ॥ २६ ॥ हरीणां चाश्मनिकरैः शरवर्षैश्च राघवात् । हन्यमानो दशग्रीवो विचूर्णहृदयोऽभवत् ॥ २७ ॥
भावार्थ
अपनेमें ये शुभ लक्षण प्रकट हुए जान राक्षसोंका अन्त करनेवाले भगवान् श्रीराम पुनः रावणको पीड़ित करने लगे ॥ वानरोंके चलाये हुए प्रस्तरसमूहों और श्रीरामचन्द्रजीके छोड़े हुए बाणोंकी वर्षासे आहत होकर रावणका हृदय व्याकुल एवं विभ्रान्त हो उठा ॥ २७ ॥
यदा च शस्त्रं नारेभे न चकर्ष शरासनम् । नास्य प्रत्यकरोद् वीर्यं विक्लवेनान्तरात्मना ॥ २८ ॥ क्षिप्ताश्चाशु शरास्तेन शस्त्राणि विविधानि च । मरणार्थाय वर्तन्ते मृत्युकालोऽभ्यवर्तत ॥ २९ ॥ सूतस्तु रथनेतास्य तदवस्थं निरीक्ष्य तम् । शनैर्युद्धादसम्भ्रान्तो रथं तस्यापवाहयत् ॥ ३० ॥
भावार्थ
जब हृदयकी व्याकुलताके कारण उसमें शस्त्र उठाने, धनुषको खींचने और श्रीरामके पराक्रमका सामना करनेकी क्षमता नहीं रह गयी तथा जब श्रीरामके शीघ्रतापूर्वक चलाये हुए बाण एवं भाँति-भाँतिके शस्त्र उसकी मृत्युके साधक बनने लगे और उसका मृत्युकाल समीप आ पहुँचा, तब उसकी ऐसी अवस्था देख उसका रथचालक सारथि बिना किसी घबराहटके उसके रथको रणभूमिसे दूर हटा ले गया २८--३०
रथं च तस्याथ जवेन सारथि- र्निवार्य भीमं जलदस्वनं तदा । जगाम भीत्या समरान्महीपतिं निरस्तवीर्यं पतितं समीक्ष्य ॥ ३१ ॥
भावार्थ
अपने राजाको शक्तिहीन होकर रथपर पड़ा देख रावणका सारथि मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले उसके भयानक रथको लौटाकर उसके साथ ही भयके मारे समरभूमिसे बाहर निकल गया ॥ ३१ ॥
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