उत्तरकाण्ड, सर्ग 95
वर्तमाने तथाभूते यज्ञे च परमाद्भुते । सशिष्य आजगामाशु वाल्मीकिर्भगवानृषिः ॥ १ ॥
भावार्थ
इस प्रकार वह अत्यन्त अद्भुत यज्ञ जब चालू हुआ, उस समय भगवान् वाल्मीकि मुनि अपने शिष्योंके साथ उसमें शीघ्रतापूर्वक पधारे ॥ १ ॥
स दृष्ट्वा दिव्यसंकाशं यज्ञमद्भुतदर्शनम् । एकान्त ऋषिवाहानां चकार उटजाञ्छुभान् ॥ २ ॥
भावार्थ
उन्होंने उस दिव्य एवं अद्भुत यज्ञका दर्शन किया और ऋषियोंके लिये जो बाड़े बने थे, उनके पास ही उन्होंने अपने लिये भी सुन्दर पर्णशालाएँ बनवायीं ॥ २ ॥
शकटांश्च बहून् पूर्णान् फलमूलांश्च शोभनान् । वाल्मीकिवाटे रुचिरे स्थापयन्नविदूरतः ॥ ३ ॥
भावार्थ
वाल्मीकिजीके सुन्दर बाड़ेके समीप अन्न आदिसे भरे-पूरे बहुत-से छकड़े खड़े कर दिये गये थे । साथ ही अच्छे-अच्छे फल और मूल भी रख दिये गये थे ॥ ३ ॥
आसीत् सुपूजितो राज्ञा मुनिभिश्च महात्मभिः । वाल्मीकिः सुमहातेजा न्यवसत् परमात्मवान् ॥ ४ ॥
भावार्थ
राजा श्रीराम तथा बहुसंख्यक महात्मा मुनियोंद्वारा भलीभाँति पूजित एवं सम्मानित हो महातेजस्वी आत्मज्ञानी वाल्मीकि मुनिने बड़े सुखसे वहाँ निवास किया ॥ ४ ॥
स शिष्यावब्रवीद्धृष्टौ युवां गत्वा समाहितौ । कृत्स्नं रामायणं काव्यं गायतां परया मुदा ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘उन्होंने अपने हृष्ट-पुष्ट दो शिष्योंसे कहा—‘तुम दोनों भाई एकाग्रचित्त हो सब ओर घूम-फिरकर बड़े आनन्दके साथ सम्पूर्ण रामायण-काव्यका गान करो ॥ ५ ॥
ऋषिवाटेषु पुण्येषु ब्राह्मणावसथेषु च । रथ्यासु राजमार्गेषु पार्थिवानां गृहेषु च ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘ऋषियों और ब्राह्मणोंके पवित्र स्थानोंपर, गलियोंमें, राजमार्गोंपर तथा राजाओंके वासस्थानोंमें भी इस काव्यका गान करना ॥ ६ ॥
रामस्य भवनद्वारि यत्र कर्म च कुर्वते । ऋत्विजामग्रतश्चैव तत्र गेयं विशेषतः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘श्रीरामचन्द्रजीका जो गृह बना है, उसके दरवाजेपर, जहाँ ब्राह्मणलोग यज्ञकार्य कर रहे हैं, वहाँ तथा ऋत्विजोंके आगे भी इस काव्यका विशेषरूपसे गान करना चाहिये ॥ ७ ॥
इमानि च फलान्यत्र स्वादूनि विविधानि च । जातानि पर्वताग्रेषु आस्वाद्यास्वाद्य गायताम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘यहाँ पर्वतके शिखरोंपर नाना प्रकारके स्वादिष्ट एवं मीठे फल लगे हैं, ( भूख लगनेपर ) उनका स्वाद ले-लेकर इस काव्यका गान करते रहना ॥ ८ ॥
न यास्यथः श्रमं वत्सौ भक्षयित्वा फलान्यथ । मूलानि च सुमृष्टानि न रागात् परिहास्यथः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘बच्चो ! यहाँके सुमधुर फल-मूलोंका भक्षण करनेसे न तो तुम्हें कभी थकावट होगी और न तुम्हारे गलेकी मधुरता ही नष्ट होने पायेगी ॥ ९ ॥
यदि शब्दापयेद् रामः श्रवणाय महीपतिः । ऋषीणामुपविष्टानां यथायोगं प्रवर्तताम् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘यदि महाराज श्रीराम तुम दोनोंको गान सुननेके लिये बुलावें तो तुम उनसे तथा वहाँ बैठे हुए ऋषि-मुनियोंसे यथायोग्य विनयपूर्ण बर्ताव करना ॥ १० ॥
दिवसे विंशतिः सर्गा गेया मधुरया गिरा । प्रमाणैर्बहुभिस्तत्र यथोद्दिष्टं मया पुरा ॥ ११ ॥ लोभश्चापि न कर्तव्यः स्वल्पोऽपि धनवाञ्छया । किं धनेनाश्रमस्थानां फलमूलाशिनां सदा ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘मैंने पहले भिन्न-भिन्न संख्यावाले श्लोकोंसे युक्त रामायण काव्यके सर्गोंका जिस तरह तुम्हें उपदेश दिया है, उसीके अनुसार प्रतिदिन बीस-बीस सर्गोंका मधुर स्वरसे गान करना ॥ ‘धनकी इच्छासे थोड़ा-सा भी लोभ न करना, आश्रममें रहकर फल-मूल भोजन करनेवाले वनवासियोंको धनसे क्या काम ? ॥ १२ ॥
यदि पृच्छेत् स काकुत्स्थो युवां कस्येति दारकौ । वाल्मीकेरथ शिष्यौ द्वौ ब्रूतमेवं नराधिपम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘यदि श्रीरघुनाथजी पूछें—‘बच्चो ! तुम दोनों किसके पुत्र हो ?’ तो तुम दोनों महाराजसे इतना ही कह देना कि हम दोनों भाई महर्षि वाल्मीकिके शिष्य हैं ॥ १३ ॥
इमास्तन्त्रीः सुमधुराः स्थानं वापूर्वदर्शनम् । मूर्च्छयित्वा सुमधुरं गायतां विगतज्वरौ ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘ये वीणाके सात तार हैं । इनसे बड़ी मधुर आवाज निकलती है । इसमें अपूर्व स्वरोंका प्रदर्शन करनेवाले ये स्थान बने हैं । इनके स्वरोंको झंकृत करके—मिलाकर सुमधुर स्वरमें तुम दोनों भाई काव्यका गान करो और सर्वथा निश्चिन्त रहो ॥ १४ ॥
आदिप्रभृति गेयं स्यान्न चावज्ञाय पार्थिवम् । पिता हि सर्वभूतानां राजा भवति धर्मतः ॥ १५ ॥ तद् युवां हृष्टमनसौ श्वः प्रभाते समाहितौ । गायतं मधुरं गेयं तन्त्रीलयसमन्वितम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘आरम्भसे ही इस काव्यका गान करना चाहिये । तुमलोग ऐसा कोई बर्ताव न करना, जिससे राजाका अपमान हो; क्योंकि राजा धर्मकी दृष्टिसे सम्पूर्ण प्राणियोंका पिता होता है ॥ ‘अतएव तुम दोनों भाई प्रसन्न और एकाग्रचित्त होकर कल सबेरेसे ही वीणाके लयपर मधुर स्वरसे रामायण-गान आरम्भ कर दो’ ॥ १६ ॥
इति संदिश्य बहुशो मुनिः प्राचेतसस्तदा । वाल्मीकिः परमोदारस्तूष्णीमासीन्महामुनिः॥ १७ ॥
भावार्थ
इस तरह बहुत कुछ आदेश देकर वरुणके पुत्र परम उदार महामुनि वाल्मीकि चुप हो गये ॥ १७ ॥
संदिष्टौ मुनिना तेन तावुभौ मैथिलीसुतौ । तथैव करवावेति निर्जग्मतुररिंदमौ ॥ १८ ॥
भावार्थ
मुनिके इस प्रकार आदेश देनेपर मिथिलेशकुमारी सीताके वे दोनों शत्रुदमन पुत्र ‘बहुत अच्छा, हम ऐसा ही करेंगे’ यह कहकर वहाँसे चल दिये ॥ १८ ॥
तामद्भुतां तौ हृदये कुमारौ निवेश्य वाणीमृषिभाषितां तदा । समुत्सुकौ तौ सुखमूषतुर्निशां यथाश्विनौ भार्गवनीतिसंहिताम्॥ १९ ॥
भावार्थ
शुक्राचार्यकी बनायी हुई नीतिसंहिताको धारण करनेवाले अश्विनीकुमारोंकी भाँति ऋषिकी कही हुई उस अद्भुत वाणीको हृदयमें धारण करके वे दोनों कुमार मन-ही-मन उत्कण्ठित हो वहाँ रातभर सुखसे रहे ॥ १९ ॥
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