उत्तरकाण्ड, सर्ग 56
रामस्य भाषितं श्रुत्वा लक्ष्मणः परवीरहा । उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा राघवं दीप्ततेजसम् ॥ १ ॥
भावार्थ
‘श्रीरामचन्द्रजीके मुखसे कही गयी यह कथा सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मण उद्दीप्त तेजवाले श्रीरघुनाथजीसे हाथ जोड़कर बोले—॥ १ ॥
निक्षिप्य देहौ काकुत्स्थ कथं तौ द्विजपार्थिवौ । पुनर्देहेन संयोगं जग्मतुर्देवसम्मतौ ॥ २ ॥
भावार्थ
‘ककुत्स्थकुलभूषण ! वे ब्रह्मर्षि और वे भूपाल दोनों देवताओंके भी सम्मानपात्र थे । उन्होंने अपने शरीरोंका त्याग करके फिर नूतन शरीर कैसे ग्रहण किया ?’ ॥ २ ॥
लक्ष्मणेनैवमुक्तस्तु राम इक्ष्वाकुनन्दनः । प्रत्युवाच महातेजा लक्ष्मणं पुरुषर्षभः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘ लक्ष्मणके इस प्रकार पूछनेपर इक्ष्वाकुकुलनन्दन महातेजस्वी पुरुषप्रवर श्रीरामने उनसे इस प्रकार कहा—॥ ३ ॥
तौ परस्परशापेन देहमुत्सृज्य धार्मिकौ । अभूतां नृपविप्रर्षी वायुभूतौ तपोधनौ ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘सुमित्रानन्दन ! एक दूसरेके शापसे देह त्याग करके तपस्याके धनी वे धर्मात्मा राजर्षि और ब्रह्मर्षि वायुरूप हो गये ॥ ४ ॥
अशरीरः शरीरस्य कृतेऽन्यस्य महामुनिः । वसिष्ठस्तु महातेजा जगाम पितुरन्तिकम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘महातेजस्वी महामुनि वसिष्ठ शरीररहित हो जानेपर दूसरे शरीरकी प्राप्तिके लिये अपने पिता ब्रह्माजीके पास गये ॥ ५ ॥
सोऽभिवाद्य ततः पादौ देवदेवस्य धर्मवित् । पितामहमथोवाच वायुभूत इदं वचः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘धर्मके ज्ञाता वायुरूप वसिष्ठजीने देवाधिदेव ब्रह्माजीके चरणोंमें प्रणाम करके उन पितामहसे इस प्रकार कहा—॥६॥
भगवन् निमिशापेन विदेहत्वमुपागमम् । देवदेव महादेव वायुभूतोऽहमण्डज ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘‘ब्रह्माण्डकटाहसे प्रकट हुए देवाधिदेव महादेव ! भगवन् ! मैं राजा निमिके शापसे देहहीन हो गया हूँ; अतः वायुरूपमें रह रहा हूँ ॥ ७ ॥
सर्वेषां देहहीनानां महद् दुःखं भविष्यति । लुप्यन्ते सर्वकार्याणि हीनदेहस्य वै प्रभो ॥ ८ ॥ देहस्यान्यस्य सद्भावे प्रसादं कर्तुमर्हसि ।
भावार्थ
‘‘प्रभो ! समस्त देहहीनोंको महान् दुःख होता है और होता रहेगा; क्योंकि देहहीन प्राणीके सभी कार्य लुप्त हो जाते हैं । अतः दूसरे शरीरकी प्राप्तिके लिये आप मुझपर कृपा करें’ ॥ ८½ ॥
तमुवाच ततो ब्रह्मा स्वयंभूरमितप्रभः ॥ ९ ॥ मित्रावरुणजं तेज आविश त्वं महायशः । अयोनिजस्त्वं भविता तत्रापि द्विजसत्तम । धर्मेण महता युक्तः पुनरेष्यसि मे वशम् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘तब अमित तेजस्वी स्वयम्भू ब्रह्माने उनसे कहा— ‘महायशस्वी द्विजश्रेष्ठ ! तुम मित्र और वरुणके छोड़े हुए तेज ( वीर्य ) में प्रविष्ट हो जाओ । वहाँ जानेपर भी तुम अयोनिज रूपसे ही उत्पन्न होओगे और महान् धर्मसे युक्त हो पुत्ररूपसे मेरे वशमें आ जाओगे ( मेरे पुत्र होनेके कारण तुम्हें पूर्ववत् प्रजापतिका पद प्राप्त होगा । )’ ॥ ९-१० ॥
एवमुक्तस्तु देवेन अभिवाद्य प्रदक्षिणम् । कृत्वा पितामहं तूर्णं प्रययौ वरुणालयम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर उनके चरणोंमें प्रणाम तथा उनकी परिक्रमा करके वायुरूप वसिष्ठजी वरुणलोकको चले गये ॥ ११ ॥
तमेव कालं मित्रोऽपि वरुणत्वमकारयत् । क्षीरोदेन सहोपेतः पूज्यमानः सुरेश्वरैः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘उन्हीं दिनों मित्रदेवता भी वरुणके अधिकारका पालन कर रहे थे । वे वरुणके साथ रहकर समस्त देवेश्वरोंद्वारा पूजित होते थे ॥ १२ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु उर्वशी परमाप्सराः । यदृच्छया तमुद्देशमागता सखिभिर्वृता ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘इसी समय अप्सराओंमें श्रेष्ठ उर्वशी सखियोंसे घिरी हुई अकस्मात् उस स्थानपर आ गयी ॥ १३ ॥
तां दृष्ट्वा रूपसम्पन्नां क्रीडन्तीं वरुणालये । तदाविशत् परो हर्षो वरुणं चोर्वशीकृते ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘उस परम सुन्दरी अप्सराको क्षीरसागरमें नहाती और जलक्रीडा करती देख वरुणके मनमें उर्वशीके लिये अत्यन्त उल्लास प्रकट हुआ ॥ १४ ॥
स तां पद्मपलाशाक्षीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम् । वरुणो वरयामास मैथुनायाप्सरोवराम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘उन्होंने प्रफुल्ल कमलके समान नेत्र और पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली उस सुन्दरी अप्सराको समागमके लिये आमन्त्रित किया ॥ १५ ॥
प्रत्युवाच ततः सा तु वरुणं प्राञ्जलिः स्थिता । मित्रेणाहं वृता साक्षात् पूर्वमेव सुरेश्वर ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘तब उर्वशीने हाथ जोड़कर वरुणसे कहा——‘सुरेश्वर ! साक्षात् मित्रदेवताने पहलेसे ही मेरा वरण कर लिया है’ ॥१६॥
वरुणस्त्वब्रवीद् वाक्यं कन्दर्पशरपीडितः । इदं तेजः समुत्स्रक्ष्ये कुम्भेऽस्मिन् देवनिर्मिते ॥ १७॥ एवमुत्सृज्य सुश्रोणि त्वय्यहं वरवर्णिनि । कृतकामोभविष्यामि यदि नेच्छसि सङ्गमम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘यह सुनकर वरुणने कामदेवके बाणोंसे पीड़ित होकर कहा—‘सुन्दर रूप रंगवाली सुश्रोणि ! यदि तुम मुझसे समागम करना नहीं चाहतीं तो मैं तुम्हारे समीप इस देवनिर्मित कुम्भमें अपना यह वीर्य छोड़ दूँगा और इस प्रकार छोड़कर ही सफलमनोरथ हो जाऊँगा’ ॥ १७-१८ ॥
तस्य तल्लोकनाथस्य वरुणस्य सुभाषितम् । उर्वशी परमप्रीता श्रुत्वा वाक्यमुवाच ह ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘लोकनाथ वरुणका यह मनोहर वचन सुनकर उर्वशीको बड़ी प्रसन्नता हुई और वह बोली-॥ १९ ॥
काममेतद् भवत्वेवं हृदयं मे त्वयि स्थितम् । भावश्चाप्यधिकं तुभ्यं देहो मित्रस्य तु प्रभो ॥ २० ॥
भावार्थ
‘‘प्रभो ! आपकी इच्छाके अनुसार ऐसा ही हो । मेरा हृदय विशेषतः आपमें अनुरक्त है और आपका अनुराग भी मुझमें अधिक है; इसलिये आप मेरे उद्देश्यसे उस कुम्भमें वीर्याधान कीजिये । इस शरीरपर तो इस समय मित्रका अधिकार हो चुका है’ ॥ २० ॥
उर्वश्या एवमुक्तस्तु रेतस्तन्महदद्भुतम् । ज्वलदग्निसमप्रख्यं तस्मिन् कुम्भे न्यवासृजत्॥ २१ ॥
भावार्थ
‘उर्वशीके ऐसा कहनेपर वरुणने प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशमान अपने अत्यन्त अद्भुत तेज ( वीर्य ) को उस कुम्भमें डाल दिया ॥ २१ ॥
उर्वशी त्वगमत् तत्र मित्रो वै यत्र देवता । तां तु मित्रः सुसंक्रुद्ध उर्वशीमिदमब्रवीत् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘तदनन्तर उर्वशी उस स्थानपर गयी, जहाँ मित्रदेवता विराजमान थे । उस समय मित्र अत्यन्त कुपित हो उस उर्वशीसे इस प्रकार बोले—॥ २२ ॥
मयाभिमन्त्रिता पूर्वं कस्मात् त्वमवसर्जिता । पतिमन्यं वृतवती किमर्थं दुष्टचारिणि ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘‘दुराचारिणि ! पहले मैंने तुझे समागमके लिये आमन्त्रित किया था; फिर किसलिये तूने मेरा त्याग किया और क्यों दूसरे पतिका वरण कर लिया ? ॥ २३ ॥
अनेन दुष्कृतेन त्वं मत्क्रोधकलुषीकृता । मनुष्यलोकमास्थाय कंचित् कालं निवत्स्यसि ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘‘अपने इस पापके कारण मेरे क्रोधसे कलुषित हो तू कुछ कालतक मनुष्यलोकमें जाकर निवास करेगी ॥ २४ ॥
बुधस्य पुत्रो राजर्षिः काशिराजः पुरूरवाः । तमभ्यागच्छ दुर्बुद्धे स ते भर्ता भविष्यति ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘‘दुर्बुद्धे ! बुधके पुत्र राजर्षि पुरूरवा, जो काशिदेशके राजा हैं, उनके पास चली जा, वे ही तेरे पति होंगे’ ॥२५॥
ततः सा शापदोषेण पुरूरवसमभ्यगात् । प्रतिष्ठाने पुरूरवं बुधस्यात्मजमौरसम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘तब वह शाप-दोषसे दूषित हो प्रतिष्ठानपुर ( प्रयाग-झूसी ) में बुधके औरस पुत्र पुरूरवाके पास गयी ॥ २६ ॥
तस्य जज्ञे ततः श्रीमानायुः पुत्रो महाबलः । नहुषो यस्य पुत्रस्तु बभूवेन्द्रसमद्युतिः ॥ २७ ॥ वज्रमुत्सृज्य वृत्राय श्रान्तेऽथ त्रिदिवेश्वरे । शतं वर्षसहस्राणि येनेन्द्रत्वं प्रशासितम् ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘पुरूरवाके उर्वशीके गर्भसे श्रीमान् आयु नामक महाबली पुत्र हुआ, जिसके पुत्र इन्द्रतुल्य तेजस्वी महाराज नहुष थे ॥ ‘वृत्रासुरपर वज्रका प्रहार करके जब देवराज इन्द्र ब्रह्महत्याके भयसे दुखी हो छिप गये थे, तब नहुषने ही एक लाख वर्षोंतक ‘इन्द्र’ पदपर प्रतिष्ठित हो त्रिलोकीके राज्यका शासन किया था ॥ २८ ॥
सा तेन शापेन जगाम भूमिं तदोर्वशी चारुदती सुनेत्रा । बहूनि वर्षाण्यवसच्च सुभ्रूः शापक्षयादिन्द्रसदो ययौ च ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘मनोहर दाँत और सुन्दर नेत्रवाली उर्वशी मित्रके दिये हुए उस शापसे भूतलपर चली गयी । वहाँ वह सुन्दरी बहुत वर्षोंतक रही । फिर शापका क्षय होनेपर इन्द्रसभामें चली गयी’ ॥ २९ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें