उत्तरकाण्ड, सर्ग 47
अथ नावं सुविस्तीर्णां नैषादीं राघवानुजः । आरुरोह समायुक्तां पूर्वमारोप्य मैथिलीम् ॥ १ ॥
भावार्थ
मल्लाहोंकी वह नाव विस्तृत और सुसज्जित थी । लक्ष्मणने उसपर पहले सीताजीको चढ़ाया, फिर स्वयं चढ़े ॥ १ ॥
सुमन्त्रं चैव सरथं स्थीयतामिति लक्ष्मणः । उवाच शोकसंतप्तः प्रयाहीति च नाविकम् ॥ २ ॥
भावार्थ
उन्होंने रथसहित सुमन्त्रको वहीं ठहरनेके लिये कह दिया और शोकसे संतप्त होकर नाविकसे कहा—‘चलो’ ॥ २ ॥
ततस्तीरमुपागम्य भागीरथ्याः स लक्ष्मणः । उवाच मैथिलीं वाक्यं प्राञ्जलिर्बाष्पसंवृतः ॥ ३ ॥
भावार्थ
तदनन्तर भागीरथीके उस तटपर पहुँचकर लक्ष्मणके नेत्रोंमें आँसू भर आये और उन्होंने मिथिलेशकुमारी सीतासे हाथ जोड़कर कहा—॥ ३ ॥
हृदयं मे महच्छल्यं यस्मादार्येण धीमता । अस्मिन्निमित्ते वैदेहि लोकस्य वचनीकृतः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘विदेहनन्दिनि ! मेरे हृदयमें सबसे बड़ा काँटा यही खटक रहा है कि आज रघुनाथजीने बुद्धिमान् होकर भी मुझे वह काम सौंपा है, जिसके कारण लोकमें मेरी बड़ी निन्दा होगी ॥ ४ ॥
श्रेयो हि मरणं मेऽद्य मृत्युर्वा यत्परं भवेत् । न चास्मिन्नीदृशे कार्ये नियोज्यो लोकनिन्दिते ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘इस दशामें यदि मुझे मृत्युके समान यन्त्रणा प्राप्त होती अथवा मेरी साक्षात् मृत्यु ही हो जाती तो वह मेरे लिये परम कल्याणकारक होती । परंतु इस लोकनिन्दित कार्यमें मुझे लगाना उचित नहीं था ॥ ५ ॥
प्रसीद च न मे पापं कर्तुमर्हसि शोभने । इत्यञ्जलिकृतो भूमौ निपपात स लक्ष्मणः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘शोभने ! आप प्रसन्न हों । मुझे कोई दोष न दें’ ऐसा कहकर हाथ जोड़े हुए लक्ष्मण पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ६ ॥
रुदन्तं प्राञ्जलिं दृष्ट्वा काङ्क्षन्तं मृत्युमात्मनः । मैथिली भृशसंविग्ना लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् ॥ ७ ॥
भावार्थ
लक्ष्मण हाथ जोड़कर रो रहे हैं और अपनी मृत्यु चाह रहे हैं, यह देखकर मिथिलेशकुमारी सीता अत्यन्त उद्विग्न हो उठीं और लक्ष्मणसे बोलीं—॥ ७ ॥
किमिदं नावगच्छामि ब्रूहि तत्त्वेन लक्ष्मण । पश्यामि त्वां न च स्वस्थमपि क्षेमं महीपतेः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! यह क्या बात है ? मैं कुछ समझ नहीं पाती हूँ । ठीक-ठीक बताओ । महाराज कुशलसे तो हैं न । मैं देखती हूँ तुम्हारा मन स्वस्थ नहीं है ॥ ८ ॥
शापितोऽसि नरेन्द्रेण यत् त्वं संतापमागतः । तद् ब्रूयाः संनिधौ मह्यमहमाज्ञापयामि ते ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘मैं महाराजकी शपथ दिलाकर पूछती हूँ, जिस बातसे तुम्हें इतना संताप हो रहा है, वह मेरे निकट सच-सच बताओ । मैं इसके लिये तुम्हें आज्ञा देती हूँ’ ॥ ९ ॥
वैदेह्या चोद्यमानस्तु लक्ष्मणो दीनचेतनः । अवाङ्मुखो बाष्पगलो वाक्यमेतदुवाच ह ॥ १० ॥ श्रुत्वा परिषदो मध्ये ह्यपवादं सुदारुणम् । पुरे जनपदे चैव त्वत्कृते जनकात्मजे ॥ ११ ॥ रामः संतप्तहृदयो मां निवेद्य गृहं गतः ।
भावार्थ
विदेहनन्दिनीके इस प्रकार प्रेरित करनेपर लक्ष्मण दुखी मनसे नीचे मुँह किये अश्रुगद्गद कण्ठद्वारा इस प्रकार बोले—॥ ‘जनकनन्दिनि ! नगर और जनपदमें आपके विषयमें जो अत्यन्त भयंकर अपवाद फैला हुआ है, उसे राजसभामें सुनकर श्रीरघुनाथजीका हृदय संतप्त हो उठा और वे मुझसे सब बातें बताकर महलमें चले गये ॥ ११½ ॥
न तानि वचनीयानि मया देवि तवाग्रतः ॥ १२ ॥ यानि राज्ञा हृदि न्यस्तान्यमर्षात्पृष्ठतः कृतः ।
भावार्थ
‘देवि ! राजा श्रीरामने जिन अपवादवचनोंको दुःख न सह सकनेके कारण अपने हृदयमें रख लिया है, उन्हें मैं आपके सामने बता नहीं सकता । इसीलिये मैंने उनकी चर्चा छोड़ दी है ॥ १२½ ॥
सा त्वं त्यक्ता नृपतिना निर्दोषा मम संनिधौ ॥ १३ ॥ पौरापवादभीतेन ग्राह्यं देवि न तेऽन्यथा । आश्रमान्तेषु च मया त्यक्तव्या त्वं भविष्यसि ॥ १४ ॥ राज्ञः शासनमादाय तथैव किल दौर्हृदम् ।
भावार्थ
‘आप मेरे सामने निर्दोष सिद्ध हो चुकी हैं तो भी महाराजने लोकापवादसे डरकर आपको त्याग दिया है । देवि ! आप कोई और बात न समझें । अब महाराजकी आज्ञा मानकर तथा आपकी भी ऐसी ही इच्छा समझकर मैं आश्रमोंके पास ले जाकर आपको वहीं छोड़ दूँगा ॥ १३-१४½ ॥
तदेतज्जाह्नवीतीरे ब्रह्मर्षीणां तपोवनम् ॥ १५ ॥ पुण्यं च रमणीयं च मा विषादं कृथाः शुभे ।
भावार्थ
‘शुभे ! यह रहा गङ्गाजीके तटपर ब्रह्मर्षियोंका पवित्र एवं रमणीय तपोवन । आप विषाद न करें ॥ १५½ ॥
राज्ञो दशरथस्यैव पितुर्मे मुनिपुङ्गवः ॥ १६ ॥ सखा परमको विप्रो वाल्मीकिः सुमहायशाः । पादच्छायामुपागम्य सुखमस्य महात्मनः । उपवासपरैकाग्रा वस त्वं जनकात्मजे ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘यहाँ मेरे पिता राजा दशरथके घनिष्ठ मित्र महायशस्वी ब्रह्मर्षि मुनिवर वाल्मीकि रहते हैं, आप उन्हीं महात्माके चरणोंकी छायाका आश्रय ले यहाँ सुखपूर्वक रहें । जनकात्मजे ! आप यहाँ उपवासपरायण और एकाग्र हो निवास करें ॥१६-१७॥
पतिव्रतात्वमास्थाय रामं कृत्वा सदा हृदि । श्रेयस्ते परमं देवि तथा कृत्वा भविष्यति ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘देवि ! आप सदा श्रीरघुनाथजीको हृदयमें रखकर पातिव्रत्यका अवलम्बन करें । ऐसा करनेसे आपका परम कल्याण होगा’ ॥ १८ ॥
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