उत्तरकाण्ड, सर्ग 33
रावणग्रहणं तत् तु वायुग्रहणसंनिभम् । ततः पुलस्त्यः शुश्राव कथितं दिवि दैवतैः ॥ १ ॥
भावार्थ
रावणको पकड़ लेना वायुको पकड़नेके समान था। धीरे-धीरे यह बात स्वर्गमें देवताओंके मुखसे पुलस्त्यजीने सुनी ॥ १ ॥
ततः पुत्रकृतस्नेहात् कम्पमानो महाधृतिः । माहिष्मतीपतिं द्रष्टुमाजगाम महानृषिः ॥ २ ॥
भावार्थ
यद्यपि वे महर्षि महान् धैर्यशाली थे तो भी संतानके प्रति होनेवाले स्नेहके कारण कृपापरवश हो गये और माहिष्मती-नरेशसे मिलनेके लिये भूतलपर चले आये ॥ २ ॥
स वायुमार्गमास्थाय वायुतुल्यगतिर्द्विजः । पुरीं माहिष्मतीं प्राप्तो मनःसम्पातविक्रमः ॥ ३ ॥ सोऽमरावतिसंकाशां हृष्टपुष्टजनावृताम् । प्रविवेश पुरीं ब्रह्मा इन्द्रस्येवामरावतीम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
उनका वेग वायुके समान था और गति मनके समान, वे ब्रह्मर्षि वायुपथका आश्रय ले माहिष्मतीपुरीमें आ पहुँचे ॥ जैसे ब्रह्माजी इन्द्रकी अमरावतीपुरीमें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार पुलस्त्यजीने हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई और अमरावतीके समान शोभासे सम्पन्न माहिष्मती नगरीमें प्रवेश किया ॥ ४ ॥
पादचारमिवादित्यं निष्पतन्तं सुदुर्दशम् । ततस्ते प्रत्यभिज्ञाय अर्जुनाय न्यवेदयन् ॥ ५ ॥
भावार्थ
आकाशसे उतरते समय वे पैरोंसे चलकर आते हुए सूर्यके समान जान पड़ते थे । अत्यन्त तेजके कारण उनकी ओर देखना बहुत ही कठिन जान पड़ता था । अर्जुनके सेवकोंने उन्हें पहचानकर राजा अर्जुनको उनके शुभागमनकी सूचना दी ॥ ५ ॥
पुलस्त्य इति विज्ञाय वचनाद्धैहयाधिपः । शिरस्यञ्जलिमाधाय प्रत्युद्गच्छत् तपस्विनम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
सेवकोंके कहनेसे जब हैहयराजको यह पता चला कि पुलस्त्यजी पधारे हैं, तब वे सिरपर अञ्जलि बाँधे उन तपस्वी मुनिकी अगवानीके लिये आगे बढ़ आये ॥ ६ ॥
पुरोहितोऽस्य गृह्यार्घ्यं मधुपर्कं तथैव च । पुरस्तात् प्रययौ राज्ञः शक्रस्येव बृहस्पतिः ॥ ७ ॥
भावार्थ
राजा अर्जुनके पुरोहित अर्घ्य और मधुपर्क आदि लेकर उनके आगे-आगे चले, मानो इन्द्रके आगे बृहस्पति चल रहे हों ॥ ७ ॥
ततस्तमृषिमायान्तमुद्यन्तमिव भास्करम् । अर्जुनो दृश्य सम्भ्रान्तो ववन्देन्द्र इवेश्वरम् ॥ ८ ॥ स तस्य मधुपर्कं गां पाद्यमर्घ्यं निवेद्य च । पुलस्त्यमाह राजेन्द्रो हर्षगद्गदया गिरा ॥ ९ ॥
भावार्थ
वहाँ आते हुए वे महर्षि उदित होते हुए सूर्यके समान तेजस्वी दिखायी देते थे । उन्हें देखकर राजा अर्जुन चकित रह गया । उसने उन ब्रह्मर्षिके चरणोंमें उसी तरह आदरपूर्वक प्रणाम किया, जैसे इन्द्र ब्रह्माजीके आगे मस्तक झुकाते हैं ॥ ब्रह्मर्षिको पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क और गौ समर्पित करके राजाधिराज अर्जुनने हर्षगद्गद वाणीमें पुलस्त्यजीसे कहा–॥९॥
अद्यैवममरावत्या तुल्या माहिष्मती कृता । अद्याहं तु द्विजेन्द्र त्वां यस्मात् पश्यामि दुर्दशम् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘द्विजेन्द्र ! आपका दर्शन परम दुर्लभ है, तथापि आज मैं आपके दर्शनका सुख उठा रहा हूँ । इस प्रकार यहाँ पधारकर आपने इस माहिष्मतीपुरीको अमरावतीपुरीके समान गौरव-शालिनी बना दिया ॥ १० ॥
अद्य मे कुशलं देव अद्य मे कुशलं व्रतम् । अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलं तपः ॥ ११ ॥ यत् ते देवगणैर्वन्द्यौ वन्देऽहं चरणौ तव । इदं राज्यमिमे पुत्रा इमे दारा इमे वयम् । ब्रह्मन् किं कुर्मः किं कार्यमाज्ञापयतु नो भवान् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘देव ! आज मैं आपके देववन्द्य चरणोंकी वन्दना कर रहा हूँ; अतः आज ही मैं वास्तवमें सकुशल हूँ । आज मेरा व्रत निर्विघ्न पूर्ण हो गया । आज ही मेरा जन्म सफल हुआ और तपस्या भी सार्थक हो गयी । ब्रह्मन् ! यह राज्य, ये स्त्री-पुत्र और हम सब लोग आपके ही हैं । आप आज्ञा दीजिये । हम आपकी क्या सेवा करें ?’ ॥ ११-१२ ॥
तं धर्मेऽग्निषु पुत्रेषु शिवं पृष्ट्वा च पार्थिवम् । पुलस्त्योवाच राजानं हैहयानां तथार्जुनम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
तब पुलस्त्यजी हैहयराज अर्जुनके धर्म, अग्नि और पुत्रोंका कुशल-समाचार पूछकर उससे इस प्रकार बोले–॥ १३ ॥
नरेन्द्राम्बुजपत्राक्ष पूर्णचन्द्रनिभानन । अतुलं ते बलं येन दशग्रीवस्त्वया जितः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले कमलनयन नरेश ! तुम्हारे बलकी कहीं तुलना नहीं है; क्योंकि तुमने दशग्रीवको जीत लिया ॥ १४ ॥
भयाद् यस्योपतिष्ठेतां निष्पन्दौ सागरानिलौ । सोऽयं मृधे त्वया बद्धः पौत्रो मे रणदुर्जयः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘जिसके भयसे समुद्र और वायु भी चञ्चलता छोड़कर सेवामें उपस्थित होते हैं, उस मेरे रणदुर्जय पौत्रको तुमने संग्राममें बाँध लिया ॥ १५ ॥
पुत्रकस्य यशः पीतं नाम विश्रावितं त्वया । मद्वाक्याद् याच्यमानोऽद्य मुञ्च वत्स दशाननम् ॥१६॥
भावार्थ
‘ऐसा करके तुम मेरे इस बच्चेका यश पी गये और सर्वत्र अपने नामका ढिंढोरा पीट दिया । वत्स ! अब मेरे कहनेसे तुम दशाननको छोड़ दो । यह तुमसे मेरी याचना है’ ॥ १६ ॥
पुलस्त्याज्ञां प्रगृह्योचे न किंचन वचोऽर्जुनः । मुमोच वै पार्थिवेन्द्रो राक्षसेन्द्रं प्रहृष्टवत् ॥ १७ ॥
भावार्थ
पुलस्त्यजीकी इस आज्ञाको शिरोधार्य करके अर्जुनने इसके विपरीत कोई बात नहीं कही। उस राजाधिराजने बड़ी प्रसन्नताके साथ राक्षसराज रावणको बन्धनसे मुक्त कर दिया ॥ १७ ॥
स तं प्रमुच्य त्रिदशारिमर्जुनः प्रपूज्य दिव्याभरणस्रगम्बरैः । अहिंसकं सख्यमुपेत्य साग्निकं प्रणम्य तं ब्रह्मसुतं गृहं ययौ ॥ १८ ॥
भावार्थ
उस देवद्रोही राक्षसको बन्धनमुक्त करके अर्जुनने दिव्य आभूषण, माला और वस्त्रोंसे उसका पूजन किया और अग्निको साक्षी बनाकर उसके साथ ऐसी मित्रताका सम्बन्ध स्थापित किया, जिसके द्वारा किसीकी हिंसा न हो ( अर्थात् उन दोनोंने यह प्रतिज्ञा की कि हमलोग अपनी मैत्रीका उपयोग दूसरे प्राणियोंकी हिंसामें नहीं करेंगे ) । इसके बाद ब्रह्मपुत्र पुलस्त्यजीको प्रणाम करके राजा अर्जुन अपने घरको लौट गया ॥ १८ ॥
पुलस्त्येनापि संत्यक्तो राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् । परिष्वक्तः कृतातिथ्यो लज्जमानो विनिर्जितः ॥ १९ ॥
भावार्थ
इस प्रकार अर्जुनद्वारा आतिथ्य-सत्कार करके छोड़े गये प्रतापी राक्षसराज रावणको पुलस्त्यजीने हृदयसे लगा लिया, परंतु वह पराजयके कारण लज्जित ही रहा ॥ १९ ॥
पितामहसुतश्चापि पुलस्त्यो मुनिपुङ्गवः । मोचयित्वा दशग्रीवं ब्रह्मलोकं जगाम ह ॥ २० ॥
भावार्थ
दशग्रीवको छुड़ाकर ब्रह्माजीके पुत्र मुनिवर पुलस्त्यजी पुनः ब्रह्मलोकको चले गये ॥ २० ॥
एवं स रावणः प्राप्तः कीर्तवीर्यात् प्रधर्षणम् । पुलस्त्यवचनाच्चापि पुनर्मुक्तो महाबलः ॥ २१ ॥
भावार्थ
इस प्रकार रावणको कार्तवीर्य अर्जुनके हाथसे पराजित होना पड़ा था और फिर पुलस्त्यजीके कहनेसे उस महाबली राक्षसको छुटकारा मिला था ॥ २१ ॥
एवं बलिभ्यो बलिनः सन्ति राघवनन्दन । नावज्ञा हि परे कार्या य इच्छेच्छ्रेय आत्मनः ॥ २२ ॥
भावार्थ
रघुकुलनन्दन ! इस प्रकार संसारमें बलवान्-से-बलवान् वीर पड़े हुए हैं; अतः जो अपना कल्याण चाहे उसे दूसरेकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये ॥ २२ ॥
ततः स राजा पिशिताशनानां सहस्रबाहोरुपलभ्य मैत्रीम् । पुनर्नृपाणां कदनं चकार चकार सर्वां पृथिवीं च दर्पात् ॥ २३ ॥
भावार्थ
सहस्रबाहुकी मैत्री पाकर राक्षसोंका राजा रावण पुनः घमंडसे भरकर सारी पृथ्वीपर विचरने और नरेशोंका संहार करने लगा ॥ २३ ॥
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