सुन्दरकाण्ड, सर्ग 56
ततस्तु शिंशपामूले जानकीं पर्यवस्थिताम् । अभिवाद्याब्रवीद् दिष्टया पश्यामि त्वामिहाक्षताम् ॥ १ ॥
भावार्थ
तदनन्तर हनुमान्जी अशोकवृक्षके नीचे बैठी हुई जानकीजीके पास गये और उन्हें प्रणाम करके बोले— ‘आर्ये ! सौभाग्यकी बात है कि इस समय मैं आपको सकुशल देख रहा हूँ’ ॥ १ ॥
ततस्तं प्रस्थितं सीता वीक्षमाणा पुनः पुनः । भर्तुः स्नेहान्विता वाक्यं हनूमन्तमभाषत ॥ २ ॥
भावार्थ
सीता अपने पतिके स्नेहमें डूबी हुई थीं । वे हनुमान्जीको प्रस्थान करनेके लिये उद्यत जान उन्हें बारंबार देखती हुई बोलीं—॥ २ ॥
यदि त्वं मन्यसे तात वसैकाहमिहानघ । क्वचित् सुसंवृते देशे विश्रान्तः श्वो गमिष्यसि ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘तात ! निष्पाप वानरवीर ! यदि तुम उचित समझो तो एक दिन और यहाँ किसी गुप्त स्थानमें ठहर जाओ, आज विश्राम करके कल चले जाना ॥ ३ ॥
मम चैवाल्पभाग्यायाः सांनिध्यात् तव वानर । शोकस्यास्याप्रमेयस्य मुहूर्तं स्यादपि क्षयः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘वानरप्रवर ! तुम्हारे निकट रहनेसे मुझ मन्दभागिनीका अपार शोक भी थोड़ी देरके लिये कम हो जायगा ॥ ४ ॥
गते हि हरिशार्दूल पुनः सम्प्राप्तये त्वयि । प्राणेष्वपि न विश्वासो मम वानरपुङ्गव ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘कपिश्रेष्ठ ! वानरशिरोमणे ! जब तुम चले जाओगे, तब फिर तुम्हारे आनेतक मेरे प्राण रहेंगे या नहीं, इसका कोई विश्वास नहीं है ॥ ५ ॥
अदर्शनं च ते वीर भूयो मां दारयिष्यति । दुःखाद् दुःखतरं प्राप्तां दुर्मनःशोककर्शिताम् ॥ ६ ॥ अयं च वीर संदेहस्तिष्ठतीव ममाग्रतः । सुमहत्सु सहायेषु हर्यृक्षेषु महाबलः ॥ ७ ॥ कथं नु खलु दुष्पारं संतरिष्यति सागरम् । तानि हर्यृक्षसैन्यानि तौ वा नरवरात्मजौ ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘वीर ! मुझपर दुःख-पर-दुःख पड़ते गये हैं । मैं मानसिक शोकसे दिन-दिन दुर्बल होती जा रही हूँ । अब तुम्हारा दर्शन न होना मेरे हृदयको और भी विदीर्ण करता रहेगा ॥ ‘वीर ! मेरे सामने यह संदेह अभीतक बना ही हुआ है कि बड़े-बड़े वानरों और रीछोंके सहायक होनेपर भी महाबली सुग्रीव इस दुर्लङ्घ्य समुद्रको कैसे पार करेंगे ? उनकी सेनाके वे वानर और भालू तथा वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण भी इस महासागरको कैसे लाँघ सकेंगे ? ॥ ७-८ ॥
त्रयाणामेव भूतानां सागरस्यापि लङ्घने । शक्तिः स्याद् वैनतेयस्य तव वा मारुतस्य वा ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘तीन ही प्राणियोंमें इस समुद्रको लाँघनेकी शक्ति है— तुममें, गरुड़में अथवा वायुदेवतामें ॥ ९ ॥
तदत्र कार्यनिर्बन्धे समुत्पन्ने दुरासदे । किं पश्यसि समाधानं त्वं हि कार्यविशारदः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘इस कार्यसम्बन्धी दुष्कर प्रतिबन्धके उपस्थित होनेपर तुम्हें क्या समाधान दिखायी देता है ? बताओ, क्योंकि तुम कार्यकुशल हो ॥ १० ॥
काममस्य त्वमेवैकः कार्यस्य परिसाधने । पर्याप्तः परवीरघ्न यशस्यस्ते फलोदयः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कपिश्रेष्ठ ! इसमें संदेह नहीं कि इस कार्यको सिद्ध करनेमें तुम अकेले ही पूर्ण समर्थ हो; परंतु तुम्हारेद्वारा जो विजयरूप फलकी प्राप्ति होगी, उससे तुम्हारा ही यश बढ़ेगा, भगवान् श्रीरामका नहीं ॥ ११ ॥
बलैस्तु संकुलां कृत्वा लङ्कां परबलार्दनः । मां नयेद् यदि काकुत्स्थस्तत् तस्य सदृशं भवेत् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘परंतु शत्रुसेनाको पीड़ा देनेवाले श्रीरामचन्द्रजी यदि लङ्काको अपनी सेनासे पददलित करके मुझे यहाँसे ले चलें तो वह उनके योग्य पराक्रम होगा ॥ १२ ॥
तद् यथा तस्य विक्रान्तमनुरूपं महात्मनः । भवत्याहवशूरस्य तथा त्वमुपपादय ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘अतः तुम ऐसा उपाय करो, जिससे युद्धवीर महात्मा श्रीरामचन्द्रजीका उनके योग्य पराक्रम प्रकट हो’ ॥ १३ ॥
तदर्थोपहितं वाक्यं प्रश्रितं हेतुसंहितम् । निशम्य हनुमान् वीरो वाक्यमुत्तरमब्रवीत् ॥ १४ ॥
भावार्थ
सीताजीकी यह बात स्नेहयुक्त तथा विशेष अभिप्रायसे भरी हुई थी । इसे सुनकर वीर हनुमान्ने इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १४ ॥
देवि हर्यृक्षसैन्यानामीश्वरः प्लवतां वरः । सुग्रीवः सत्त्वसम्पन्नस्तवार्थे कृतनिश्चयः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘देवि ! वानर और भालुओंकी सेनाओंके स्वामी कपिश्रेष्ठ सुग्रीव बड़े शक्तिशाली पुरुष हैं । वे तुम्हारे उद्धारके लिये प्रतिज्ञा कर चुके हैं ॥ १५ ॥
स वानरसहस्राणां कोटीभिरभिसंवृतः । क्षिप्रमेष्यति वैदेहि सुग्रीवः प्लवगाधिपः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘विदेहनन्दिनि ! अतः वे वानरराज सुग्रीव सहस्रों कोटि वानरोंसे घिरे हुए तुरंत यहाँ आयेंगे ॥ १६ ॥
तौ च वीरौ नरवरौ सहितौ रामलक्ष्मणौ । आगम्य नगरीं लङ्कां सायकैर्विधमिष्यतः ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘साथ ही वे दोनों वीर नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण भी एक साथ आकर अपने सायकोंसे इस लङ्कापुरीका विध्वंस कर डालेंगे ॥ १७ ॥
सगणं राक्षसं हत्वा नचिराद् रघुनन्दनः । त्वामादाय वरारोहे स्वां पुरीं प्रति यास्यति ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘वरारोहे ! राक्षसराज रावणको उसके सैनिकोंसहित कालके गालमें डालकर श्रीरघुनाथजी आपको साथ ले शीघ्र ही अपनी पुरीको पधारेंगे ॥ १८ ॥
समाश्वसिहि भद्रं ते भव त्वं कालकाङ्क्षिणी । क्षिप्रं द्रक्ष्यसि रामेण निहतं रावणं रणे ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘इसलिये आप धैर्य धारण करें । आपका भला हो । आप समयकी प्रतीक्षा करें । रावण शीघ्र ही रणभूमिमें श्रीरामके हाथसे मारा जायगा, यह आप अपनी आँखों देखेंगी ॥ १९ ॥
निहते राक्षसेन्द्रे च सपुत्रामात्यबान्धवे । त्वं समेष्यसि रामेण शशाङ्केनेव रोहिणी ॥ २० ॥
भावार्थ
‘पुत्र, मन्त्री और भाई-बन्धुओंसहित राक्षसराज रावणके मारे जानेपर आप श्रीरामचन्द्रजीके साथ उसी प्रकार मिलेंगी, जैसे रोहिणी चन्द्रमासे मिलती है ॥ २० ॥
क्षिप्रमेष्यति काकुत्स्थो हर्यृक्षप्रवरैर्वृतः । यस्ते युधि विजित्यारीञ्छोकं व्यपनयिष्यति ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘वानरों और भालुओंके प्रमुख वीरोंके साथ श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र ही यहाँ पधारेंगे और युद्धमें शत्रुओंको जीतकर आपका सारा शोक दूर कर देंगे’ ॥ २१ ॥
एवमाश्वास्य वैदेहीं हनुमान् मारुतात्मजः । गमनाय मतिं कृत्वा वैदेहीमभ्यवादयत् ॥ २२ ॥
भावार्थ
विदेहनन्दिनी सीताको इस प्रकार आश्वासन दे वहाँसे जानेका विचार करके पवनकुमार हनुमान्ने उन्हें प्रणाम किया ॥ २२ ॥
राक्षसान् प्रवरान् हत्वा नाम विश्राव्य चात्मनः । समाश्वास्य च वैदेहीं दर्शयित्वा परं बलम् ॥ २३ ॥ नगरीमाकुलां कृत्वा वञ्चयित्वा च रावणम् । दर्शयित्वा बलं घोरं वैदेहीमभिवाद्य च ॥ २४ ॥ प्रतिगन्तुं मनश्चक्रे पुनर्मध्येन सागरम् । ततः स कपिशार्दूलः स्वामिसंदर्शनोत्सुकः ॥ २५ ॥ आरुरोह गिरिश्रेष्ठमरिष्टमरिमर्दनः ।
भावार्थ
वे बड़े-बड़े राक्षसोंको मारकर अपने महान् बलका परिचय दे वहाँ ख्याति प्राप्त कर चुके थे । उन्होंने सीताको आश्वासन दे, लङ्कापुरीको व्याकुल करके, रावणको चकमा देकर, उसे अपना भयानक बल दिखा, वैदेहीको प्रणाम करके पुनः समुद्रके बीचसे होकर लौट जानेका विचार किया ॥ ( अब यहाँ उनके लिये कोई कार्य बाकी नहीं रह गया था; अतः ) अपने स्वामी श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनके लिये उत्सुक हो वे शत्रुमर्दन कपिश्रेष्ठ हनुमान् पर्वतोंमें उत्तम अरिष्ट गिरिपर चढ़ गये ॥ २५½ ॥
तुङ्गपद्मकजुष्टाभिर्नीलाभिर्वनराजिभिः ॥ २६ ॥ सोत्तरीयमिवाम्भोदैः शृङ्गान्तरविलम्बिभिः ।
भावार्थ
ऊँचे-ऊँचे पद्मकों—पद्मके समान वर्णवाले वृक्षोंसे सेवित नीली वनश्रेणियाँ मानो उस पर्वतका परिधान वस्त्र थीं । शिखरोंपर लटके हुए श्याम मेघ उसके लिये उत्तरीय वस्त्र ( चादर )-से प्रतीत होते थे ॥ २६½ ॥
बोध्यमानमिव प्रीत्या दिवाकरकरैः शुभैः ॥ २७ ॥ उन्मिषन्तमिवोद्धूतैर्लोचनैरिव धातुभिः । तोयौघनिःस्वनैर्मन्द्रैः प्राधीतमिव पर्वतम् ॥ २८ ॥
भावार्थ
सूर्यकी कल्याणमयी किरणें प्रेमपूर्वक उसे जगाती-सी जान पड़ती थीं । नाना प्रकारके धातु मानो उसके खुले हुए नेत्र थे, जिनसे वह सब कुछ देखता हुआ-सा स्थित था । पर्वतीय नदियोंकी जलराशिके गम्भीर घोषसे ऐसा लगता था, मानो वह पर्वत सस्वर वेदपाठ कर रहा हो ॥२७-२८॥
प्रगीतमिव विस्पष्टं नानाप्रस्रवणस्वनैः । देवदारुभिरुद्भूतैरूर्ध्वबाहुमिव स्थितम् ॥ २९ ॥
भावार्थ
अनेकानेक झरनोंके कलकल नादसे वह अरिष्टगिरि स्पष्टतया गीत-सा गा रहा था । ऊँचे-ऊँचे देवदारु वृक्षोंके कारण मानो हाथ ऊपर उठाये खड़ा था ॥ २९ ॥
प्रपातजलनिर्घोषैः प्राक्रुष्टमिव सर्वतः । वेपमानमिव श्यामैः कम्पमानैः शरद्गनैः ॥ ३० ॥
भावार्थ
सब ओर जल-प्रपातोंकी गम्भीर ध्वनिसे व्याप्त होनेके कारण चिल्लाता या हल्ला मचाता-सा जान पड़ता था । झूमते हुए सरकंडोंके श्याम वनोंसे वह काँपता-सा प्रतीत होता था ॥ ३० ॥
वेणुभिर्मारुतोद्धूतैः कूजन्तमिव कीचकैः । निःश्वसन्तमिवामर्षाद् घोरैराशीविषोत्तमैः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
वायुके झोंके खाकर हिलते और मधुरध्वनि करते बाँसोंसे उपलक्षित होनेवाला वह पर्वत मानो बाँसुरी बजा रहा था । भयानक विषधर सर्पोंके फुंकारसे लंबी साँस खींचता-सा जान पड़ता था ॥ ३१ ॥
नीहारकृतगम्भीरैर्ध्यायन्तमिव गह्वरैः । मेघपादनिभैः पादैः प्रक्रान्तमिव सर्वतः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
कुहरेके कारण गहरी प्रतीत होनेवाली निश्चल गुफाओं-द्वारा वह ध्यान-सा कर रहा था । उठते हुए मेघोंके समान शोभा पानेवाले पार्श्ववर्ती पर्वतोंद्वारा सब ओर विचरता-सा प्रतीत होता था ॥ ३२ ॥
जम्भमाणमिवाकाशे शिखरैरभ्रमालिभिः । कूटैश्च बहुधा कीर्णं शोभितं बहुकन्दरैः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
मेघमालाओंसे अलंकृत शिखरोंद्वारा वह आकाशमें अँगड़ाई-सी ले रहा था । अनेकानेक शृङ्गोंसे व्याप्त तथा बहुत-सी कन्दराओंसे सुशोभित था ॥ ३३ ॥
सालतालैश्च कर्णैश्च वंशैश्च बहुभिर्वृतम् । लतावितानैर्विततैः पुष्पवद्भिरलंकृतम् ॥ ३४ ॥
भावार्थ
साल, ताल, कर्ण और बहुसंख्यक बाँसके वृक्ष उसे सब ओरसे घेरे हुए थे । फूलोंके भारसे लदे और फैले हुए लता-वितान उस पर्वतके अलंकार थे ॥ ३४ ॥
नानामृगगणैः कीर्णं धातुनिष्यन्दभूषितम् । बहुप्रस्रवणोपेतं शिलासंचयसंकटम् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
नाना प्रकारके पशु वहाँ सब ओर भरे हुए थे । विविध धातुओंके पिघलनेसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी । वह पर्वत बहुसंख्यक झरनोंसे विभूषित तथा राशि-राशि शिलाओंसे भरा हुआ था ॥ ३५ ॥
महर्षियक्षगन्धर्वकिन्नरोरगसेवितम् । लतापादपसम्बाधं सिंहाधिष्ठितकन्दरम् ॥ ३६ ॥ व्याघ्रादिभिः समाकीर्णं स्वादुमूलफलद्रुमम् । आरुरोहानिलसुतः पर्वतं प्लवगोत्तमः ॥ ३७ ॥ रामदर्शनशीघ्रेण प्रहर्षेणाभिचोदितः ।
भावार्थ
महर्षि, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर और नागगण वहाँ निवास करते थे । लताओं और वृक्षोंद्वारा वह सब ओरसे आच्छादित था । उसकी कन्दराओंमें सिंह दहाड़ रहे थे ॥ व्याघ्र आदि हिंसक जन्तु भी वहाँ सब ओर फैले हुए थे । स्वादिष्ट फलोंसे लदे हुए वृक्ष और मधुर कन्द-मूल आदिकी वहाँ बहुतायत थी । ऐसे रमणीय पर्वतपर वानरशिरोमणि पवनकुमार हनुमान्जी श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकी शीघ्रता और अत्यन्त हर्षसे प्रेरित होकर चढ़ गये ॥३७½॥
तेन पादतलाक्रान्ता रम्येषु गिरिसानुषु ॥ ३८ ॥ सघोषाः समशीर्यन्त शिलाश्चूर्णीकृतास्ततः ।
भावार्थ
उस पर्वतके रमणीय शिखरोंपर जो शिलाएँ थीं, वे उनके पैरोंके आघातसे भारी आवाजके साथ चूर-चूर होकर बिखर जाती थीं ॥ ३८½ ॥
स तमारुह्य शैलेन्द्रं व्यवर्धत महाकपिः ॥ ३९ ॥ दक्षिणादुत्तरं पारं प्रार्थयँल्लवणाम्भसः ।
भावार्थ
उस शैलराज अरिष्टपर आरूढ़ हो महाकपि हनुमान्जीने समुद्रके दक्षिण तटसे उत्तर तटपर जानेकी इच्छासे अपने शरीरको बहुत बड़ा बना लिया ॥ ३९½ ॥
अधिरुह्य ततो वीरः पर्वतं पवनात्मजः ॥ ४० ॥ ददर्श सागरं भीमं भीमोरगनिषेवितम् ।
भावार्थ
उस पर्वतपर आरूढ़ होनेके पश्चात् वीरवर पवनकुमारने भयानक सर्पोंसे सेवित उस भीषण महासागरकी ओर दृष्टिपात किया ॥ ४०½ ॥
स मारुत इवाकाशं मारुतस्यात्मसम्भवः ॥ ४१ ॥ प्रपेदे हरिशार्दूलो दक्षिणादुत्तरां दिशम् ।
भावार्थ
वायुदेवताके औरस पुत्र कपिश्रेष्ठ हनुमान् जैसे वायु आकाशमें तीव्रगतिसे प्रवाहित होती है, उसी प्रकार दक्षिणसे उत्तर दिशाकी ओर बड़े वेगसे ( उछलकर ) चले ॥४१½॥
स तदा पीडितस्तेन कपिना पर्वतोत्तमः ॥ ४२ ॥ ररास विविधैर्भूतैः प्राविशद् वसुधातलम् । कम्पमानैश्च शिखरैः पतद्भिरपि च द्रुमैः ॥ ४३ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीके पैरोंका दबाव पड़नेके कारण उस श्रेष्ठ पर्वतसे बड़ी भयंकर आवाज हुई और वह अपने काँपते हुए शिखरों, टूटकर गिरते हुए वृक्षों तथा भाँति-भाँतिके प्राणियोंसहित तत्काल धरतीमें धँस गया ॥ ४२-४३ ॥
तस्योरुवेगोन्मथिताः पादपाः पुष्पशालिनः । निपेतुर्भूतले भग्नाः शक्रायुधहता इव ॥ ४४ ॥
भावार्थ
उनके महान् वेगसे कम्पित हो फूलोंसे लदे हुए बहुसंख्यक वृक्ष इस प्रकार पृथ्वीपर गिर पड़े, मानो उन्हें वज्र मार गया हो ॥ ४४ ॥
कन्दरोदरसंस्थानां पीडितानां महौजसाम् । सिंहानां निनदो भीमो नभो भिन्दन् हि शुश्रुवे॥४५ ॥
भावार्थ
उस समय उस पर्वतकी कन्दराओंमें रहकर दबे हुए महाबली सिंहोंका भयंकर नाद आकाशको फाड़ता हुआ-सा सुनायी दे रहा था ॥ ४५ ॥
त्रस्तव्याविद्धवसना व्याकुलीकृतभूषणाः । विद्याधर्यः समुत्पेतुः सहसा धरणीधरात् ॥ ४६ ॥
भावार्थ
भयके कारण जिनके वस्त्र ढीले पड़ गये थे और आभूषण उलट-पलट गये थे, वे विद्याधरियाँ सहसा उस पर्वतसे ऊपरकी ओर उड़ चलीं ॥ ४६ ॥
अतिप्रमाणा बलिनो दीप्तजिह्वा महाविषाः । निपीडितशिरोग्रीवा व्यवेष्टन्त महाहयः ॥ ४७ ॥
भावार्थ
बड़े-बड़े आकार और चमकीली जीभवाले महाविषैले बलवान् सर्प अपने फन तथा गलेको दबाकर कुण्डलाकार हो गये ॥ ४७ ॥
किंनरोरगगन्धर्वयक्षविद्याधरास्तथा । पीडितं तं नगवरं त्यक्त्वा गगनमास्थिताः ॥ ४८ ॥
भावार्थ
किन्नर, नाग, गन्धर्व, यक्ष और विद्याधर उस धँसते हुए पर्वतको छोड़कर आकाशमें स्थित हो गये ॥ ४८ ॥
स च भूमिधरः श्रीमान् बलिना तेन पीडितः । सवृक्षशिखरोदग्रः प्रविवेश रसातलम् ॥ ४९ ॥ दशयोजनविस्तारस्त्रिंशद्योजनमुच्छ्रितः । धरण्यां समतां यातः स बभूव धराधरः ॥ ५० ॥
भावार्थ
बलवान् हनुमान्जीके वेगसे दबकर वह शोभाशाली महीधर वृक्षों और ऊँचे शिखरोंसहित रसातलमें चला गया ॥ अरिष्ट पर्वत तीस योजन ऊँचा और दस योजन चौड़ा था। फिर भी उनके पैरोंसे दबकर भूमिके बराबर हो गया ॥ ५० ॥
स लिलङ्घयिषुर्भीमं सलीलं लवणार्णवम् । कल्लोलास्फालवेलान्तमुत्पपात नभो हरिः ॥ ५१ ॥
भावार्थ
जिसकी ऊँची-ऊँची तरङ्गें उठकर अपने किनारोंका चुम्बन करती थीं, उस खारे पानीके भयानक समुद्रको लीलापूर्वक लाँघ जानेकी इच्छासे हनुमान्जी आकाशमें उड़ चले ॥ ५१ ॥
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