सुन्दरकाण्ड, सर्ग 3
स लंबशिखरे लंबे लंबतोयदसंनिभे । सत्त्वमास्थाय मेधावी हनुमान् मारुतात्मजः ॥ १ ॥ निशि लङ्कां महासत्त्वो विवेश कपिकुञ्जरः । रम्यकाननतोयाढ्यां पुरीं रावणपालिताम् ॥ २ ॥
भावार्थ
ऊँचे शिखरवाले लंब ( त्रिकूट ) पर्वतपर जो महान् मेघोंकी घटाके समान जान पड़ता था, बुद्धिमान् महाशक्ति-शाली कपिश्रेष्ठ पवनकुमार हनुमान्ने सत्त्वगुणका आश्रय ले रातके समय रावणपालित लङ्कापुरीमें प्रवेश किया । वह नगरी सुरम्य वन और जलाशयोंसे सुशोभित थी ॥ १-२ ॥
शारदाम्बुधरप्रख्यैर्भवनैरुपशोभिताम् । सागरोपमनिर्घोषां सागरानिलसेविताम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
शरत्कालके बादलोंकी भाँति श्वेत कान्तिवाले सुन्दर भवन उसकी शोभा बढ़ाते थे । वहाँ समुद्रकी गर्जनाके समान गम्भीर शब्द होता रहता था । सागरकी लहरोंको छूकर बहनेवाली वायु इस पुरीकी सेवा करती थी ॥ ३ ॥
सुपुष्टबलसम्पुष्टां यथैव विटपावतीम् । चारुतोरणनिर्यूहां पाण्डुरद्वारतोरणाम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
वह अलकापुरीके समान शक्तिशालिनी सेनाओंसे सुरक्षित थी । उस पुरीके सुन्दर फाटकोंपर मतवाले हाथी शोभा पाते थे । उस पुरीके अन्तर्द्वार और बहिर्द्वार दोनों ही श्वेत कान्तिसे सुशोभित थे ॥ ४ ॥
भुजगाचरितां गुप्तां शुभां भोगवतीमिव । तां सविद्युद्घनाकीर्णां ज्योतिर्गणनिषेविताम् ॥ ५ ॥ चण्डमारुतनिर्ह्रादां यथा चाप्यमरावतीम् ।
भावार्थ
उस नगरीकी रक्षाके लिये बड़े-बड़े सर्पोंका संचरण ( आना-जाना ) होता रहता है, इसलिये वह नागोंसे सुरक्षित सुन्दर भोगवती पुरीके समान जान पड़ती थी । अमरावती पुरीके समान वहाँ आवश्यकताके अनुसार बिजलियोंसहित मेघ छाये रहते थे । ग्रहों और नक्षत्रोंके सदृश विद्युत्-दीपोंके प्रकाशसे वह पुरी प्रकाशित थी तथा प्रचण्ड वायुकी ध्वनि वहाँ सदा होती रहती थी ॥ ५½ ॥
शातकुम्भेन महता प्राकारेणाभिसंवृताम् ॥ ६ ॥ किङ्किणीजालघोषाभिः पताकाभिरलंकृताम् ।
भावार्थ
सोनेके बने हुए विशाल परकोटेसे घिरी हुई लङ्कापुरी क्षुद्र घंटिकाओंकी झनकारसे युक्त पताकाओंद्वारा अलंकृत थी ॥ ६½ ॥
आसाद्य सहसा हृष्टः प्राकारमभिपेदिवान् ॥ ७ ॥ विस्मयाविष्टहृदयः पुरीमालोक्य सर्वतः ।
भावार्थ
उस पुरीके समीप पहुँचकर हर्ष और उत्साहसे भरे हुए हनुमान्जी सहसा उछलकर उसके परकोटेपर चढ़ गये । वहाँ सब ओरसे लङ्कापुरीका अवलोकन करके हनुमान्जीका चित्त आश्चर्यसे चकित हो उठा ॥ ७½ ॥
जाम्बूनदमयैर्द्वारैर्वैदूर्यकृतवेदिकैः । ॥ ८ ॥ वज्रस्फटिकमुक्ताभिर्मणिकुट्टिमभूषितैः । तप्तहाटकनिर्यूहै राजतामलपाण्डुरैः ॥ ९ ॥ वैदूर्यकृतसोपानैः स्फाटिकान्तरपांसुभिः । चारुसंजवनोपेतैः खमिवोत्पतितैः शुभैः ॥ १० ॥
भावार्थ
सुवर्णके बने हुए द्वारोंसे उस नगरीकी अपूर्व शोभा हो रही थी । उन सभी द्वारोंपर नीलमके चबूतरे बने हुए थे । वे सब द्वार हीरों, स्फटिकों और मोतियोंसे जड़े गये थे । मणिमयी फर्शें उनकी शोभा बढ़ा रही थीं । उनके दोनों ओर तपाये सुवर्णके बने हुए हाथी शोभा पाते थे । उन द्वारोंका ऊपरी भाग चाँदीसे निर्मित होनेके कारण स्वच्छ और श्वेत था । उनकी सीढ़ियाँ नीलमकी बनी हुई थीं । उन द्वारोंके भीतरी भाग स्फटिक मणिके बने हुए और धूलसे रहित थे । वे सभी द्वार रमणीय सभा-भवनोंसे युक्त और सुन्दर थे तथा इतने ऊँचे थे कि आकाशमें उठे हुए-से जान पड़ते थे ॥ ८—१० ॥
क्रौञ्चबर्हिणसंघुष्टै राजहंसनिषेवितैः । तूर्याभरणनिर्घोषैः सर्वतः परिनादिताम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
वहाँ क्रौञ्च और मयूरोंके कलरव गूँजते रहते थे, उन द्वारोंपर राजहंस नामक पक्षी भी निवास करते थे । वहाँ भाँति-भाँतिके वाद्योंओर आभूषणोंकी मधुर ध्वनि होती रहती थी, जिससे लङ्कापुरी सब ओरसे प्रतिध्वनित हो रही थी॥११॥
वस्वोकसारप्रतिमां समीक्ष्य नगरीं ततः । खमिवोत्पतितां लङ्कां जहर्ष हनुमान् कपिः ॥ १२ ॥
भावार्थ
कुबेरकी अलकाके समान शोभा पानेवाली लङ्का नगरी त्रिकूटके शिखरपर प्रतिष्ठित होनेके कारण आकाशमें उठी हुई-सी प्रतीत होती थी । उसे देखकर कपिवर हनुमान्को बड़ा हर्ष हुआ ॥ १२ ॥
तां समीक्ष्य पुरीं लङ्कां राक्षसाधिपतेः शुभाम् । अनुत्तमामृद्धिमतीं चिन्तयामास वीर्यवान् ॥ १३ ॥
भावार्थ
राक्षसराजकी वह सुन्दर पुरी लङ्का सबसे उत्तम और समृद्धिशालिनी थी । उसे देखकर पराक्रमी हनुमान् इस प्रकार सोचने लगे–॥ १३ ॥
नेयमन्येन नगरी शक्या धर्षयितुं बलात् । रक्षिता रावणबलैरुद्यतायुधपाणिभिः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘रावणके सैनिक हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये इस पुरीकी रक्षा करते हैं, अतः दूसरा कोई बलपूर्वक इसे अपने काबूमें नहीं कर सकता ॥ १४ ॥
कुमुदाङ्गदयोर्वापि सुषेणस्य महाकपेः । प्रसिद्धेयं भवेद् भूमिर्मैन्दद्विविदयोरपि ॥ १५ ॥ विवस्वतस्तनूजस्य हरेश्च कुशपर्वणः । ऋक्षस्य कपिमुख्यस्य मम चैव गतिर्भवेत् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘केवल कुमुद, अङ्गद, महाकपि सुषेण, मैन्द, द्विविद, सूर्यपुत्र सुग्रीव, वानर कुशपर्वा और वानरसेनाके प्रमुख वीर ऋक्षराज जाम्बवान्की तथा मेरी भी पहुँच इस पुरीके भीतर हो सकती है’ ॥ १५-१६ ॥
समीक्ष्य च महाबाहो राघवस्य पराक्रमम् । लक्ष्मणस्य च विक्रान्तमभवत् प्रीतिमान् कपिः ॥ १७ ॥
भावार्थ
फिर महाबाहु श्रीराम और लक्ष्मणके पराक्रमका विचार करके कविवर हनुमान्को बड़ी प्रसन्नता हुई ॥१७॥
तां रत्नवसनोपेतां गोष्ठागारावतंसिकाम् । यन्त्रागारस्तनीमृद्धां प्रमदामिव भूषिताम् ॥ १८ ॥ तां नष्टतिमिरां दीपैर्भास्वरैश्च महाग्रहैः । नगरीं राक्षसेन्द्रस्य स ददर्श महाकपिः ॥ १९ ॥
भावार्थ
महाकपि हनुमान्ने देखा, राक्षसराज रावणकी नगरी लङ्का वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सुन्दरी युवतीके समान जान पड़ती है। रत्नमय परकोटे ही इसके वस्त्र हैं, गोष्ठ ( गोशाला ) तथा दूसरे-दूसरे भवन आभूषण हैं । परकोटोंपर लगे हुए यन्त्रोंके जो गृह हैं, ये ही मानो इस लङ्कारूपी युवतीके स्तन हैं । यह सब प्रकारके समृद्धियोंसे सम्पन्न है । प्रकाशपूर्ण द्वीपों और महान् ग्रहोंने यहाँका अन्धकार नष्ट कर दिया है ॥ १८-१९ ॥
अथ सा हरिशार्दूलं प्रविशन्तं महाकपिम् । नगरी स्वेन रूपेण ददर्श पवनात्मजम् ॥ २० ॥
भावार्थ
तदनन्तर वानरश्रेष्ठ महाकपि पवनकुमार हनुमान् उस पुरीमें प्रवेश करने लगे। इतनेमेंही उस नगरीकी अधिष्ठात्री देवी लङ्काने अपने स्वाभाविक रूपमें प्रकट होकर उन्हें देखा ॥ २० ॥
सा तं हरिवरं दृष्ट्वा लङ्का रावणपालिता । स्वयमेवोत्थिता तत्र विकृताननदर्शना ॥ २१ ॥
भावार्थ
वानरश्रेष्ठ हनुमान्को देखते ही रावणपालित लङ्का स्वयं ही उठ खड़ी हुई । उसका मुँह देखनेमें बड़ा विकट था ॥ २१ ॥
पुरस्तात् तस्य वीरस्य वायुसूनोरतिष्ठत । मुञ्चमाना महानादमब्रवीत् पवनात्मजम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
वह उन वीर पवनकुमारके सामने खड़ी हो गयी और बड़े जोरसे गर्जना करती हुई उनसे इस प्रकार बोली–॥२२॥
कस्त्वं केन च कार्येण इह प्राप्तो वनालय । कथयस्वेह यत् तत्त्वं यावत् प्राणा धरन्ति ते ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘वनचारी वानर ! तू कौन है और किस कार्यसे यहाँ आया है ? तुम्हारे प्राण जबतक बने हुए हैं, तबतक ही यहाँ आनेका जो यथार्थ रहस्य है, उसे ठीक-ठीक बता दो ॥२३॥
न शक्यं खल्वियं लङ्का प्रवेष्टुं वानर त्वया । रक्षिता रावणबलैरभिगुप्ता समन्ततः ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘वानर ! रावणकी सेना सब ओरसे इस पुरीकी रक्षा करती है, अतः निश्चय ही तू इस लङ्कामें प्रवेश नहीं कर सकता’ ॥ २४ ॥
अथ तामब्रवीद् वीरो हनुमानग्रतः स्थिताम् । कथयिष्यामि तत् तत्त्वं यन्मां त्वं परिपृच्छसे ॥ २५ ॥ का त्वं विरूपनयना पुरद्वारेऽवतिष्ठसे । किमर्थं चापि मां क्रोधान्निर्भर्त्सयसि दारुणे ॥ २६ ॥
भावार्थ
तब वीरवर हनुमान् अपने सामने खड़ी हुई लङ्कासे बोले—‘क्रूर स्वभाववाली नारी ! तू मुझसे जो कुछ पूछ रही है, उसे मैं ठीक-ठीक बता दूँगा; किंतु पहले यह तो बता, तू है कौन ? तेरी आँखें बड़ी भयंकर हैं । तू इस नगरके द्वारपर खड़ी है । क्या कारण है कि तू इस प्रकार क्रोध करके मुझे डाँट रही है ?’ ॥ २५-२६ ॥
हनुमद्वचनं श्रुत्वा लङ्का सा कामरूपिणी । उवाच वचनं क्रुद्धा परुषं पवनात्मजम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीकी यह बात सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली लङ्का कुपित हो उन पवनकुमारसे कठोर वाणीमें बोली—॥ २७ ॥
अहं राक्षसराजस्य रावणस्य महात्मनः । आज्ञाप्रतीक्षा दुर्धर्षा रक्षामि नगरीमिमाम् ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘मैं महामना राक्षसराज रावणकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करनेवाली उनकी सेविका हूँ । मुझपर आक्रमण करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है । मैं इस नगरीकी रक्षा करती हूँ ॥ २८ ॥
न शक्यं मामवज्ञाय प्रवेष्टुं नगरीमिमाम् । अद्य प्राणैः परित्यक्तः स्वप्स्यसे निहतो मया ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘मेरी अवहेलना करके इस पुरीमें प्रवेश करना किसी के लिये भी सम्भव नहीं है । आज मेरे हाथसे मारा जाकर तू प्राणहीन हो इस पृथ्वीपर शयन करेगा ॥ २९ ॥
अहं हि नगरी लङ्का स्वयमेव प्लवङ्गम । सर्वतः परिरक्षामि अतस्ते कथितं मया ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘वानर ! मैं स्वयं ही लङ्का नगरी हूँ, अतः सब ओरसे इसकी रक्षा करती हूँ । यही कारण है कि मैंने तेरे प्रति कठोर वाणीका प्रयोग किया है’ ॥ ३० ॥
लङ्काया वचनं श्रुत्वा हनूमान् मारुतात्मजः । यत्नवान् स हरिश्रेष्ठः स्थितः शैल इवापरः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
लङ्काकी यह बात सुनकर पवनकुमार कपिश्रेष्ठ हनुमान् उसे जीतनेके लिये यत्नशील हो दूसरे पर्वतके समान वहाँ खड़े हो गये ॥ ३१ ॥
स तां स्त्रीरूपविकृतां दृष्ट्वा वानरपुङ्गवः । आबभाषेऽथ मेधावी सत्त्ववान् प्लवगर्षभः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
लङ्काको विकराल राक्षसीके रूपमें देखकर बुद्धिमान् वानरशिरोमणि शक्तिशाली कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने उससे इस प्रकार कहा—॥ ३२ ॥
द्रक्ष्यामि नगरीं लङ्कां साट्टप्राकारतोरणाम् । इत्यर्थमिह सम्प्राप्तः परं कौतूहलं हि मे ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘मैं अट्टालिकाओं, परकोटों और नगरद्वारोंसहित इस लङ्का नगरीको देखूँगा । इसी प्रयोजनसे यहाँ आया हूँ । इसे देखनेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है ॥ ३३ ॥
वनान्युपवनानीह लङ्कायाः काननानि च । सर्वतो गृहमुख्यानि द्रष्टुमागमनं हि मे ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘इस लङ्काके जो वन, उपवन, कानन और मुख्य-मुख्य भवन हैं, उन्हें देखनेके लिये ही यहाँ मेरा आगमन हुआ है’ ॥ ३४ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा लङ्का सा कामरूपिणी । भूय एव पुनर्वाक्यं बभाषे परुषाक्षरम् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीका यह कथन सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली लङ्का पुनः कठोर वाणीमें बोली—॥ ३५ ॥
मामनिर्जित्य दुर्बुद्धे राक्षसेश्वरपालिताम् । न शक्यं ह्यद्य ते द्रष्टुं पुरीयं वानराधम ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘खोटी बुद्धिवाले नीच वानर । राक्षसेश्वर रावणके द्वारा मेरी रक्षा हो रही है । तू मुझे परास्त किये बिना आज इस पुरीको नहीं देख सकता’ ॥ ३६ ॥
ततः स हरिशार्दूलस्तामुवाच निशाचरीम् । दृष्ट्वा पुरीमिमां भद्रे पुनर्यास्ये यथागतम् ॥ ३७ ॥
भावार्थ
तब उन वानरशिरोमणिने उस निशाचरीसे कहा— ‘भद्रे ! इस पुरीको देखकर मैं फिर जैसे आया हूँ, उसी तरह लौट जाऊँगा’ ॥ ३७ ॥
ततः कृत्वा महानादं सा वै लङ्का भयंकरम् । तलेन वानरश्रेष्ठं ताडयामास वेगिता ॥ ३८ ॥
भावार्थ
यह सुनकर लङ्काने बड़ी भयंकर गर्जना करके वानरश्रेष्ठ हनुमान्को बड़े जोरसे एक थप्पड़ मारा ॥ ३८ ॥
ततः स हरिशार्दूलो लङ्कया ताडितो भृशम् । ननाद सुमहानादं वीर्यवान् मारुतात्मजः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
लङ्काद्वारा इस प्रकार जोरसे पीटे जानेपर उन परम पराक्रमी पवनकुमार कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ३९ ॥
ततः संवर्तयामास वामहस्तस्य सोऽङ्गुलीः । मुष्टिनाभिजघानैनां हनुमान् क्रोधमूर्च्छितः ॥ ४० ॥
भावार्थ
फिर उन्होंने अपने बायें हाथकी अङ्गुलियोंको मोड़कर मुट्ठी बाँध ली और अत्यन्त कुपित हो उस लङ्काको एक मुक्का जमा दिया ॥ ४० ॥
स्त्री चेति मन्यमानेन नातिक्रोधः स्वयं कृतः । सा तु तेन प्रहारेण विह्वलाङ्गी निशाचरी । पपात सहसा भूमौ विकृताननदर्शना ॥ ४१ ॥
भावार्थ
उसे स्त्री समझकर हनुमान्जीने स्वयं ही अधिक क्रोध नहीं किया । किंतु उस लघु प्रहारसे ही उस निशाचरीके सारे अङ्ग व्याकुल हो गये । वह सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ी । उस समय उसका मुख बड़ा विकराल दिखायी देता था ॥ ४१ ॥
ततस्तु हनुमान् वीरस्तां दृष्ट्वा विनिपातिताम् । कृपां चकार तेजस्वी मन्यमानः स्त्रियं च ताम् ॥ ४२ ॥ ततो वै भृशमुद्विग्ना लङ्का सा गद्गदाक्षरम् । उवाचागर्वितं वाक्यं हनुमन्तं प्लवङ्गमम् ॥ ४३ ॥ प्रसीद सुमहाबाहो त्रायस्व हरिसत्तम । समये सौम्य तिष्ठन्ति सत्त्ववन्तो महाबलाः ॥ ४४ ॥
भावार्थ
अपने ही द्वारा गिरायी गयी उस लङ्काकी ओर देखकर और उसे स्त्री समझकर तेजस्वी वीर हनुमान्को उसपर दया आ गयी । उन्होंने उसपर बड़ी कृपा की ॥ उधर अत्यन्त उद्विग्न हुई लङ्का उन वानरवीर हनुमान्से अभिमानशून्य गद्गदवाणीमें इस प्रकार बोली—॥ ‘महाबाहो ! प्रसन्न होइये । कपिश्रेष्ठ ! मेरी रक्षा कीजिये । सौम्य ! महाबली सत्त्वगुणशाली वीर पुरुष शास्त्रकी मर्यादापर स्थिर रहते हैं ( शास्त्रमें स्त्रीको अवध्य बताया है, इसलिये आप मेरे प्राण न लीजिये ) ॥ ४४ ॥
अहं तु नगरी लङ्का स्वयमेव प्लवङ्गम । निर्जिताहं त्वया वीर विक्रमेण महाबल ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘महाबली वीर वानर ! मैं स्वयं लङ्कापुरी ही हूँ, आपने अपने पराक्रमसे मुझे परास्त कर दिया है ॥ ४५ ॥
इदं च तथ्यं शृणु मे ब्रुवन्त्या वै हरीश्वर । स्वयं स्वयम्भुवा दत्तं वरदानं यथा मम ॥ ४६ ॥
भावार्थ
‘वानरेश्वर ! मैं आपसे एक सच्ची बात कहती हूँ । आप इसे सुनिये । साक्षात् स्वयम्भू ब्रह्माजीने मुझे जैसा वरदान दिया था, वह बता रही हूँ ॥ ४६ ॥
यदा त्वां वानरः कश्चिद् विक्रमाद् वशमानयेत् । तदा त्वया हि विज्ञेयं रक्षसां भयमागतम् ॥ ४७ ॥
भावार्थ
‘उन्होंने कहा था—‘जब कोई वानर तुझे अपने पराक्रमसे वशमें कर ले, तब तुझे यह समझ लेना चाहिये कि अब राक्षसोंपर बड़ा भारी भय आ पहुँचा है’ ॥ ४७ ॥
स हि मे समयः सौम्य प्राप्तोऽद्य तव दर्शनात् । स्वयम्भूविहितः सत्यो न तस्यास्ति व्यतिक्रमः ॥४८॥
भावार्थ
‘सौम्य ! आपका दर्शन पाकर आज मेरे सामने वही घड़ी आ गयी है । ब्रह्माजीने जिस सत्यका निश्चय कर दिया है, उसमें कोई उलट-फेर नहीं हो सकता ॥ ४८ ॥
सीतानिमित्तं राक्षसस्तु रावणस्य दुरात्मनः । रक्षसां चैव सर्वेषां विनाशः समुपागतः ॥ ४९ ॥
भावार्थ
‘अब सीताके कारण दुरात्मा राजा रावण तथा समस्त राक्षसोंके विनाशका समय आ पहुँचा है ॥ ४९ ॥
तत् प्रविश्य हरिश्रेष्ठ पुरीं रावणपालिताम् । विधत्स्व सर्वकार्याणि यानि यानीह वाञ्छसि ॥ ५० ॥
भावार्थ
‘कपिश्रेष्ठ ! अतः आप इस रावणपालित पुरीमें प्रवेश कीजिये और यहाँ जो-जो कार्य करना चाहते हों, उन सबको पूर्ण कर लीजिये ॥ ५० ॥
प्रविश्य शापोपहतां हरीश्वर पुरीं शुभां राक्षसमुख्यपालिताम् । यदृच्छया त्वं जनकात्मजां सतीं विमार्ग सर्वत्र गतो यथासुखम् ॥५१॥
भावार्थ
‘वानरेश्वर ! राक्षसराज रावणके द्वारा पालित यह सुन्दर पुरी अभिशापसे नष्टप्राय हो चुकी है । अतः इसमें प्रवेश करके आप स्वेच्छानुसार सुखपूर्वक सर्वत्र सती-साध्वी जनकनन्दिनी सीताकी खोज कीजिये’ ॥ ५१ ॥
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