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सुन्दरकाण्ड, सर्ग 27

इत्युक्ताः सीतया घोरं राक्षस्यः क्रोधमूर्च्छिताः। काश्चिज्जग्मुस्तदाख्यातुं रावणस्य दुरात्मनः ॥ १ ॥

भावार्थ

सीताने जब ऐसी भयंकर बात कही, तब वे राक्षसियाँ क्रोधसे अचेत-सी हो गयीं और उनमेंसे कुछ उस दुरात्मा रावणसे वह संवाद कहनेके लिये चल दीं ॥ १ ॥

ततः सीतामुपागम्य राक्षस्यो भीमदर्शनाः। पुनः परुषमेकार्थमनर्थार्थमथाब्रुवन् ॥ २ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् भयंकर दिखायी देनेवाली वे राक्षसियाँ सीताके पास आकर पुनः एक ही प्रयोजनसे सम्बन्ध रखनेवाली कठोर बातें, जो उनके लिये ही अनर्थकारिणी थीं, कहने लगीं—॥२॥

अद्येदानीं तवानार्ये सीते पापविनिश्चये। राक्षस्यो भक्षयिष्यन्ति मांसमेतद् यथासुखम् ॥ ३ ॥ सीतां ताभिरनार्याभिर्दृष्ट्वा संतर्जितां तदा। राक्षसी त्रिजटा वृद्धा प्रबुद्धा वाक्यमब्रवीत् ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘पापपूर्ण विचार रखनेवाली अनार्ये सीते ! आज इसी समय ये सब राक्षसियाँ मौजके साथ तेरा यह मांस खायेंगी’ ॥ उन दुष्ट निशाचरियोंके द्वारा सीताको इस प्रकार डरायी जाती देख बूढ़ी राक्षसी त्रिजटा, जो तत्काल सोकर उठी थी, उन सबसे कहने लगी—॥ ४ ॥

आत्मानं खादतानार्या न सीतां भक्षयिष्यथ। जनकस्य सुतामिष्टां स्नुषां दशरथस्य च ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘नीच निशाचरियो ! तुमलोग अपने-आपको ही खा जाओ। राजा जनककी प्यारी बेटी तथा महाराज दशरथकी प्रिय पुत्रवधू सीताजीको नहीं खा सकोगी ॥ ५ ॥

स्वप्नो ह्यद्य मया दृष्टो दारुणो रोमहर्षणः। राक्षसानामभावाय भर्तुरस्या भवाय च ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘आज मैंने बड़ा भयंकर और रोमाञ्चकारी स्वप्न देखा है, जो राक्षसोंके विनाश और सीतापतिके अभ्युदयकी सूचना देनेवाला है’ ॥ ६ ॥

एवमुक्तास्त्रिजटया राक्षस्यः क्रोधमूर्च्छिताः। सर्वा एवाब्रुवन् भीतास्त्रिजटां तामिदं वचः ॥ ७ ॥

भावार्थ

त्रिजटाके ऐसा कहनेपर वे सब राक्षसियाँ, जो पहले क्रोधसे मूर्च्छित हो रही थीं, भयभीत हो उठीं और त्रिजटासे इस प्रकार बोलीं—॥ ७ ॥

कथयस्व त्वया दृष्टः स्वप्नोऽयं कीदृशो निशि। तासां श्रुत्वा तु वचनं राक्षसीनां मुखोद्गतम् ॥ ८ ॥ उवाच वचनं काले त्रिजटा स्वप्नसंश्रितम्।

भावार्थ

‘अरी ! बताओ तो सही, तुमने आज रातमें यह कैसा स्वप्न देखा है ?’ उन राक्षसियोंके मुखसे निकली हुई यह बात सुनकर त्रिजटाने उस समय वह स्वप्न-सम्बन्धी बात इस प्रकार कही—॥ ८½ ॥

गजदन्तमयीं दिव्यां शिबिकामन्तरिक्षगाम् ॥ ९ ॥ युक्तां वाजिसहस्रेण स्वयमास्थाय राघवः। शुक्लमाल्याम्बरधरो लक्ष्मणेन समागतः ॥ १० ॥

भावार्थ

‘आज स्वप्नमें मैंने देखा है कि आकाशमें चलनेवाली एक दिव्य शिबिका है। वह हाथीदाँतकी बनी हुई है। उसमें एक हजार घोड़े जुते हुए हैं और श्वेत पुष्पोंकी माला तथा श्वेत वस्त्र धारण किये स्वयं श्रीरघुनाथजी लक्ष्मणके साथ उस शिबिकापर चढ़कर यहाँ पधारे हैं ॥ ९-१० ॥

स्वप्ने चाद्य मया दृष्टा सीता शुक्लाम्बरावृता। सागरेण परिक्षिप्तं श्वेतपर्वतमास्थिता ॥ ११ ॥ रामेण संगता सीता भास्करेण प्रभा यथा। राघवश्च पुनर्दृष्टश्चतुर्दन्तं महागजम् ॥ १२ ॥ आरूढः शैलसंकाशं चकास सहलक्ष्मणः।

भावार्थ

‘आज स्वप्नमें मैंने यह भी देखा है कि सीता श्वेत वस्त्र धारण किये श्वेत पर्वतके शिखरपर बैठी हैं और वह पर्वत समुद्रसे घिरा हुआ है, वहाँ जैसे सूर्यदेवसे उनकी प्रभा मिलती है, उसी प्रकार सीता श्रीरामचन्द्रजीसे मिली हैं ॥ ‘मैंने श्रीरघुनाथजीको फिर देखा, वे चार दाँतवाले विशाल गजराजपर, जो पर्वतके समान ऊँचा था, लक्ष्मणके साथ बैठे हुए बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ १२½ ॥

ततस्तु सूर्यसंकाशौ दीप्यमानौ स्वतेजसा ॥ १३ ॥ शुक्लमाल्याम्बरधरौ जानकीं पर्युपस्थितौ।

भावार्थ

‘तदनन्तर अपने तेजसे सूर्यके समान प्रकाशित होते तथा श्वेत माला और श्वेत वस्त्र धारण किये वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण जानकीजीके पास आये ॥ १३½॥

ततस्तस्य नगस्याग्रे ह्याकाशस्थस्य दन्तिनः ॥ १४ ॥ भर्त्रा परिगृहीतस्य जानकी स्कन्धमाश्रिता।

भावार्थ

‘फिर उस पर्वत-शिखरपर आकाशमें ही खड़े हुए और पतिद्वारा पकड़े गये उस हाथीके कंधेपर जानकीजी भी आ पहुँचीं ॥ १४½ ॥

भर्तुरङ्कात् समुत्पत्य ततः कमललोचना ॥ १५ ॥ चन्द्रसूर्यौ मया दृष्टा पाणिभ्यां परिमार्जती।

भावार्थ

‘इसके बाद कमलनयनी सीता अपने पतिके अङ्कसे ऊपरको उछलकर चन्द्रमा और सूर्यके पास पहुँच गयीं। वहाँ मैंने देखा वे अपने दोनों हाथोंसे चन्द्रमा और सूर्यको पोंछ रही हैं—उनपर हाथ फेर रही हैं* ॥ १५½ ॥

ततस्ताभ्यां कुमाराभ्यामास्थितः स गजोत्तमः । सीतया च विशालाक्ष्या लङ्काया उपरि स्थितः ॥ १६ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् जिसपर वे दोनों राजकुमार और विशाललोचना सीताजी विराजमान थीं, वह महान् गजराज लङ्काके ऊपर आकर खड़ा हो गया ॥ १६ ॥

पाण्डुरर्षभयुक्तेन रथेनाप्युजा स्वयम् । इहोपयातः काकुत्स्थः सीतया सह भार्यया ॥ १७ ॥ शुक्लमाल्याम्बरधरो लक्ष्मणेन सहागतः ।

भावार्थ

‘फिर मैंने देखा कि आठ सफेद बैलोंसे जुते हुए एक रथपर आरूढ़ हो ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी श्वेत पुष्पोंकी माला और वस्त्र धारण किये अपनी धर्मपत्नी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ यहाँ पधारे हैं ॥ १७½ ॥

ततोऽन्यत्र मया दृष्टो रामः सत्यपराक्रमः ॥ १८ ॥ लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया सह वीर्यवान् । आरुह्य पुष्पकं दिव्यं विमानं सूर्यसंनिभम् ॥ १९ ॥ उत्तरां दिशामालोक्य प्रस्थितः पुरुषोत्तमः ।

भावार्थ

‘इसके बाद दूसरी जगह मैंने देखा सत्यपराक्रमी और बल-विक्रमशाली पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ सूर्यतुल्य तेजस्वी दिव्य पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो उत्तर दिशाको लक्ष्य करके यहाँसे प्रस्थित हुए हैं ॥ १८-१९½ ॥

एवं स्वप्ने मया दृष्टो रामो विष्णुपराक्रमः ॥ २० ॥ लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया सह भार्यया ।

भावार्थ

‘इस प्रकार मैंने स्वप्नमें भगवान् विष्णुके समान पराक्रमी श्रीरामका उनकी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ दर्शन किया ॥ २०½ ॥

न हि रामो महातेजाः शक्यो जेतुं सुरासुरैः ॥ २१ ॥ राक्षसैर्वापि चान्यैर्वा स्वर्गः पापजनैरिव ।

भावार्थ

‘श्रीरामचन्द्रजी महातेजस्वी हैं । उन्हें देवता, असुर, राक्षस तथा दूसरे लोग भी कदापि जीत नहीं सकते । ठीक उसी तरह, जैसे पापी मनुष्य स्वर्गलोकपर विजय नहीं पा सकते ॥ २१½ ॥

रावणश्च मया दृष्टो मुण्डस्तैलसमुक्षितः ॥ २२ ॥ रक्तवासाः पिबन्मत्तः करवीरकृतस्रजः । विमानात् पुष्पकाद्य रावणः पतितः क्षितौ ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘मैंने रावणको भी सपनेमें देखा था । वह मूड़ मुड़ाये तेलसे नहाकर लाल कपड़े पहने हुए था । मदिरा पीकर मतवाला हो रहा था तथा करवीरके फूलोंकी माला पहने हुए था । इसी वेषभूषामें आज रावण पुष्पक विमानसे पृथ्वीपर गिर पड़ा था ॥ २२-२३ ॥

कृष्यमाणः स्त्रिया मुण्डो दृष्टः कृष्णाम्बरः पुनः । रथेन खरयुक्तेन रक्तमाल्यानुलेपनः ॥ २४ ॥ पिबंस्तैलं हसन्नृत्यन् भ्रान्तचित्ताकुलेन्द्रियः । गर्दभेन ययौ शीघ्रं दक्षिणां दिशमास्थितः ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘एक स्त्री उस मुण्डित-मस्तक रावणको कहीं खींचे लिये जा रही थी । उस समय मैंने फिर देखा रावणने काले कपड़े पहन रक्खे हैं । वह गधे जुते हुए रथसे यात्रा कर रहा था । लाल फूलोंकी माला और लाल चन्दनसे विभूषित था । तेल पीता, हँसता और नाचता था । पागलोंकी तरह उसका चित्त भ्रान्त और इन्द्रियाँ व्याकुल थीं । वह गधेपर सवार हो शीघ्रतापूर्वक दक्षिण दिशाकी ओर जा रहा था ॥२४-२५॥

पुनरेव मया दृष्टो रावणो राक्षसेश्वरः । पतितोऽवाक्शिरा भूमौ गर्दभाद् भयमोहितः ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘तदनन्तर मैंने फिर देखा राक्षसराज रावण गधेसे नीचे भूमिपर गिर पड़ा है । उसका सिर नीचेकी ओर है ( और पैर ऊपरकी ओर ) तथा वह भयसे मोहित हो रहा है ॥२६॥

सहसोत्थाय सम्भ्रान्तो भयार्तो मदविह्वलः । उन्मत्तरूपो दिग्वासा दुर्वाक्यं प्रलपन् बहु ॥ २७ ॥ दुर्गन्धं दुःसहं घोरं तिमिरं नरकोपमम् । मलपङ्कं प्रविश्याशु मग्नस्तत्र स रावणः ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘फिर वह भयातुर हो घबराकर सहसा उठा और मदसे विह्वल हो पागलके समान नंग-धड़ंग वेषमें बहुत-से दुर्वचन ( गाली आदि ) बकता हुआ आगे बढ़ गया । सामने ही दुर्गन्धयुक्त दुःसह घोर अन्धकारपूर्ण और नरकतुल्य मल-का पङ्क था, रावण उसीमें घुसा और वहीं डूब गया २७-२८

प्रस्थितो दक्षिणामाशां प्रविष्टोऽकर्दमं ह्रदम् । कण्ठे बद्ध्वा दशग्रीवं प्रमदा रक्तवासिनी ॥ २९ ॥ काली कर्दमलिप्ताङ्गी दिशं याम्यां प्रकर्षति । एवं तत्र मया दृष्टः कुम्भकर्णो महाबलः ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘तदनन्तर फिर देखा रावण दक्षिणकी ओर जा रहा है । उसने एक ऐसे तालाबमें प्रवेश किया है, जिसमें कीचड़का नाम नहीं है । वहाँ एक काले रंगकी स्त्री है, जिसके अङ्गोंमें कीचड़ लिपटी हुई है । वह युवती लाल वस्त्र पहने हुए है और रावणका गला बाँधकर उसे दक्षिण दिशाकी ओर खींच रही है । वहाँ महाबली कुम्भकर्णको भी मैंने इसी अवस्थामें देखा है ॥ २९-३० ॥

रावणस्य सुताः सर्वे मुण्डास्तैलसमुक्षिताः । वराहेण दशग्रीवः शिशुमारेण चेन्द्रजित् ॥ ३१ ॥ उष्ट्रेण कुम्भकर्णश्च प्रयातो दक्षिणां दिशम् ।

भावार्थ

‘रावणके सभी पुत्र भी मूड़ मुड़ाये और तेलमें नहाये दिखायी दिये हैं । यह भी देखनेमें आया कि रावण सूअरपर, इन्द्रजित् सूँसपर और कुम्भकर्ण ऊँटपर सवार हो दक्षिण दिशाको गये हैं ॥ ३१½ ॥

एकस्तत्र मया दृष्टः श्वेतच्छत्रो विभीषणः ॥ ३२ ॥ शुक्रमाल्याम्बरधरः शुक्रगन्धानुलेपनः ।

भावार्थ

‘राक्षसोंमें एकमात्र विभीषण ही ऐसे हैं, जिन्हें मैंने वहाँ श्वेत छत्र लगाये, सफेद माला पहने, श्वेत वस्त्र धारण किये तथा श्वेत चन्दन और अङ्गराग लगाये देखा है॥३२½॥

शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्नृत्तगीतैरलंकृतः ॥ ३३ ॥ आरुह्य शैलसंकाशं मेघस्तनितनिःस्वनम् । चतुर्दन्तं गजं दिव्यमास्ते तत्र विभीषणः ॥ ३४ ॥ चतुर्भिः सचिवैः सार्धं वैहायसमुपस्थितः ॥ ३५ ॥

भावार्थ

‘उनके पास शङ्खध्वनि हो रही थी, नगाड़े बजाये जा रहे थे । इनके गम्भीर घोषके साथ ही नृत्य और गीत भी हो रहे थे, जो विभीषणकी शोभा बढ़ा रहे थे । विभीषण वहाँ अपने चार मन्त्रियोंके साथ पर्वतके समान विशालकाय मेघके समान गम्भीर शब्द करनेवाले तथा चार दाँतोंवाले दिव्य गजराजपर आरूढ़ हो आकाशमें खड़े थे ॥३३–३५॥

समाजश्च महान् वृत्तो गीतवादित्रनिःस्वनः । पिबतां रक्तमाल्यानां रक्षसां रक्तवाससाम् ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘यह भी देखनेमें आया कि तेल पीनेवाले तथा लाल माला और लाल वस्त्र धारण करनेवाले राक्षसोंका वहाँ बहुत बड़ा समाज जुटा हुआ है एवं गीतों और वाद्योंकी मधुर ध्वनि हो रही है ॥ ३६ ॥

लङ्का चेयं पुरी रम्या सवाजिरथकुञ्जरा । सागरे पतिता दृष्टा भग्नगोपुरतोरणा ॥ ३७ ॥

भावार्थ

‘यह रमणीय लङ्कापुरी घोड़े, रथ और हाथियोंसहित समुद्रमें गिरी हुई देखी गयी है । इसके बाहरी और भीतरी दरवाजे टूट गये हैं ॥ ३७ ॥

लङ्का दृष्टा मया स्वप्ने रावणेनाभिरक्षिता । दग्धा रामस्य दूतेन वानरेण तरस्विना ॥ ३८ ॥

भावार्थ

‘मैंने स्वप्नमें देखा है कि रावणद्वारा सुरक्षित लङ्कापुरीको श्रीरामचन्द्रजीका दूत बनकर आये हुए एक वेगशाली वानरने जलाकर भस्म कर दिया है ॥ ३८ ॥

पीत्वा तैलं प्रमत्ताश्च प्रहसन्त्यो महास्वनाः । लङ्कायां भस्मरूक्षायां सर्वा राक्षसयोषितः ॥ ३९ ॥

भावार्थ

‘राक्षसे रूखी हुई लङ्कामें सारी राक्षसरमणियाँ तेल पीकर मतवाली हो बड़े जोर-जोरसे ठहाका मारकर हँसती हैं ॥ ३९ ॥

कुम्भकर्णादयश्चेमे सर्वे राक्षसपुङ्गवाः । रक्तं निवसनं गृह्य प्रविष्टा गोमयह्रदम् ॥ ४० ॥

भावार्थ

‘कुम्भकर्ण आदि ये समस्त राक्षसशिरोमणि वीर लाल कपड़े पहनकर गोबरके कुण्डमें घुस गये हैं ॥ ४० ॥

अपगच्छत पश्यध्वं सीतामाप्नोति राघवः । घातयेत् परमामर्षी युष्मान् सार्धं हि राक्षसैः ॥ ४१ ॥

भावार्थ

‘अतः अब तुमलोग हट जाओ और देखो कि किस तरह श्रीरघुनाथजी सीताको प्राप्त कर रहे हैं। वे बड़े अमर्षशील हैं, राक्षसोंके साथ तुम सबको भी मरवा डालेंगे ॥ ४१ ॥

प्रियां बहुमतां भार्यां वनवासमनुव्रताम् । भर्त्सितां तर्जितां वापि नानुमंस्यति राघवः ॥ ४२ ॥

भावार्थ

‘जिन्होंने वनवासमें भी उनका साथ दिया है, उन अपनी पतिव्रता भार्या और परमादरणीया प्रियतमा सीताका इस तरह धमकाया और डराया जाना श्रीरघुनाथजी कदापि सहन नहीं करेंगे ॥ ४२ ॥

तदलं क्रूरवाक्यैश्च सान्त्वमेवाभिधीयताम् । अभियाचाम वैदेहीमेतद्धि मम रोचते ॥ ४३ ॥

भावार्थ

‘अतः अब इस तरह कठोर बातें सुनाना छोड़ो; क्योंकि इनसे कोई लाभ नहीं होगा । अब तो मधुर वचनका ही प्रयोग करो । मुझे तो यही अच्छा लगता है कि हमलोग विदेहनन्दिनी सीतासे कृपा और क्षमाकी याचना करें ॥ ४३ ॥

यस्या ह्येवंविधः स्वप्नो दुःखितायाः प्रदृश्यते । सा दुःखैर्बहुभिर्मुक्ता प्रियं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ४४ ॥

भावार्थ

‘जिस दुःखिनी नारीके विषयमें ऐसा स्वप्न देखा जाता है, वह बहुसंख्यक दुःखोंसे छुटकारा पाकर परम उत्तम प्रिय वस्तु प्राप्त कर लेती है ॥ ४४ ॥

भर्त्सितामपि याचध्वं राक्षस्यः किं विवक्षया । राघवाद्धि भयं घोरं राक्षसानामुपस्थितम् ॥ ४५ ॥

भावार्थ

‘राक्षसियो ! मैं जानती हूँ, तुम्हें कुछ और कहने या बोलनेकी इच्छा है; किंतु इससे क्या होगा ? यद्यपि तुमने सीताको बहुत धमकाया है तो भी इनकी शरणमें आकर इनसे अभयकी याचना करो; क्योंकि श्रीरघुनाथजीकी ओरसे राक्षसोंके लिये घोर भय उपस्थित हुआ है ॥ ४५ ॥

प्रणिपातप्रसन्ना हि मैथिली जनकात्मजा । अलमेषा परित्रातुं राक्षस्यो महतो भयात् ॥ ४६ ॥

भावार्थ

‘राक्षसियो ! जनकनन्दिनी मिथिलेशकुमारी सीता केवल प्रणाम करनेसे ही प्रसन्न हो जायँगी । ये ही उस महान् भयसे तुम्हारी रक्षा करनेमें समर्थ हैं ॥ ४६ ॥

अपि चास्या विशालाक्ष्या न किंचिदुपलक्षये । विरूपमपि चाङ्गेषु सुसूक्ष्ममपि लक्षणम् ॥ ४७ ॥

भावार्थ

‘इन विशाललोचना सीताके अङ्गोंमें मुझे कोई सूक्ष्म-से-सूक्ष्म भी विपरीत लक्षण नहीं दिखायी देता ( जिससे समझा जाय कि ये सदा कष्टमें ही रहेंगी ) ॥ ४७ ॥

छायावैगुण्यमात्रं तु शङ्के दुःखमुपस्थितम् । अदुःखार्हामिमां देवीं वैहायससमुपस्थिताम् ॥ ४८ ॥

भावार्थ

‘मैं तो समझती हूँ कि इन्हें जो वर्तमान दुःख प्राप्त हुआ है, वह ग्रहणके समय चन्द्रमापर पड़ी हुई छायाके समान थोड़ी ही देरका है; क्योंकि ये देवी सीता मुझे स्वप्नमें विमानपर बैठी दिखायी दी हैं, अतः ये दुःख भोगनेके योग्य कदापि नहीं हैं ॥ ४८ ॥

अर्थसिद्धिं तु वैदेह्याः पश्याम्यहमुपस्थिताम् । राक्षसेन्द्रविनाशं च विजयं राघवस्य च ॥ ४९ ॥

भावार्थ

‘मुझे तो अब जानकीजीके अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि उपस्थित दिखायी देती है । राक्षसराज रावणके विनाश और रघुनाथजीकी विजयमें अब अधिक विलम्ब नहीं है ॥४९॥

निमित्तभूतमेतत् तु श्रोतुमस्या महत् प्रियम् । दृश्यते च स्फुरच्चक्षुः पद्मपत्रमिवायतम् ॥ ५० ॥

भावार्थ

‘कमलदलके समान इनका विशाल बायाँ नेत्र फड़कता दिखायी देता है । यह इस बातका सूचक है कि इन्हें शीघ्र ही अत्यन्त प्रिय संवाद सुननेको मिलेगा ॥ ५० ॥

ईषद्धि हृषितो वास्या दक्षिणाया ह्यदक्षिणः । अकस्मादेव वैदेह्या बाहुरेकः प्रकम्पते ॥ ५१ ॥

भावार्थ

‘इन उदारहृदया विदेहराजकुमारीकी एक बाँयी बाँह कुछ रोमाञ्चित होकर सहसा काँपने लगी है ( यह भी शुभका ही सूचक है ) ॥ ५१ ॥

करेणुहस्तप्रतिमः सव्यश्चोरुरनुत्तमः । वेपन् कथयतीवास्या राघवं पुरतः स्थितम् ॥ ५२ ॥

भावार्थ

‘हाथीकी सूँड़के समान जो इनकी परम उत्तम बाँयी जाँघ है, वह भी कम्पित होकर मानो यह सूचित कर रही है कि अब श्रीरघुनाथजी शीघ्र ही तुम्हारे सामने उपस्थित होंगे ॥ ५२ ॥

पक्षी च शाखानिलयं प्रविष्टः पुनः पुनश्चोत्तमसान्त्ववादी । सुखागतां वाचमुदीरयाणः पुनः पुनश्चोदयतीव हृष्टः ॥ ५३ ॥

भावार्थ

‘देखो, सामने यह पक्षी शाखाके ऊपर अपने घोंसलेमें बैठकर बारंबार उत्तम सान्त्वनापूर्ण मीठी बोली बोल रहा है । इसकी वाणीसे ‘सुस्वागतम्’की ध्वनि निकल रही है और इसके द्वारा यह हर्षमें भरकर मानो पुनः-पुनः मङ्गलप्राप्ति-की सूचना दे रहा है अथवा आनेवाले प्रियतमकी अगवानीके लिये प्रेरित कर रहा है’ ॥ ५३ ॥

ततः सा ह्रीमती बाला भर्तुर्विजयहर्षिता । अवोचद् यदि तत् तथ्यं भवेयं शरणं हि वः ॥ ५४ ॥

भावार्थ

इस प्रकार पतिदेवकी विजयके संवादसे हर्षमें भरी हुई लजीली सीता उन सबसे बोलीं—‘यदि तुम्हारी बात ठीक हुई तो मैं अवश्य ही तुम सबकी रक्षा करूँगी’ ॥ ५४ ॥

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