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सुन्दरकाण्ड, सर्ग 25

अथ तासां वदन्तीनां परुषं दारुणं बहु । राक्षसीनामसौम्यानां रुरोद जनकात्मजा ॥ १ ॥

भावार्थ

जब वे क्रूर राक्षसियाँ इस प्रकारकी बहुत-सी कठोर एवं क्रूरतापूर्ण बातें कह रही थीं, उस समय जनकनन्दिनी सीता अधीर हो-होकर रो रही थीं ॥ १ ॥

एवमुक्ता तु वैदेही राक्षसीभिर्मनस्विनी । उवाच परमत्रस्ता बाष्पगद्गदया गिरा ॥ २ ॥

भावार्थ

उन राक्षसियोंके इस प्रकार कहनेपर अत्यन्त भयभीत हुई मनस्विनी विदेहराजकुमारी सीता नेत्रोंसे आँसू बहाती गद्गद वाणीमें बोलीं—॥ २ ॥

न मानुषी राक्षसस्य भार्या भवितुमर्हति । कामं खादत मां सर्वा न करिष्यामि वो वचः ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘राक्षसियो ! मनुष्यकी कन्या कभी राक्षसकी भार्या नहीं हो सकती । तुम्हारा जी चाहे तो तुम सब लोग मिलकर मुझे खा जाओ, परंतु मैं तुम्हारी बात नहीं मानूँगी’ ॥ ३ ॥

सा राक्षसीमध्यगता सीता सुरसुतोपमा । न शर्म लेभे शोकार्ता रावणेनेव भर्त्सिता ॥ ४ ॥

भावार्थ

राक्षसियोंके बीचमें बैठी हुई देवकन्याके समान सुन्दरी सीता रावणके द्वारा धमकायी जानेके कारण शोकसे आर्त-सी होकर चैन नहीं पा रही थीं ॥ ४ ॥

वेपते साधिकं सीता विशान्तीवाङ्गमात्मनः । वने यूथपरिभ्रष्टा मृगी कोकैरिवार्दिता ॥ ५ ॥

भावार्थ

जैसे वनमें अपने यूथसे बिछुड़ी हुई मृगी भेड़ियोंसे पीड़ित होकर भयके मारे काँप रही हो, उसी प्रकार सीता जोर-जोरसे काँप रही थीं और इस तरह सिकुड़ी जा रही थीं, मानो अपने अङ्गोंमें ही समा जायँगी ॥ ५ ॥

सा त्वशोकस्य विपुलां शाखामालम्ब्य पुष्पिताम् । चिन्तयामास शोकेन भर्तारं भग्नमानसा ॥ ६ ॥ सा स्नापयन्ती विपुलौ स्तनौ नेत्रजलस्रवैः । चिन्तयन्ती न शोकस्य तदान्तमधिगच्छति ॥ ७ ॥

भावार्थ

उनका मनोरथ भङ्ग हो गया था । वे हताश-सी होकर अशोकवृक्षकी खिली हुई एक विशाल शाखाका सहारा ले शोकसे पीड़ित हो अपने पतिदेवका चिन्तन करने लगीं ॥ आँसुओंके प्रवाहसे अपने स्थूल उरोजोंका अभिषेक करती हुई वे चिन्तामें डूबी थीं और उस समय शोकका पार नहीं पा रही थीं ॥ ७ ॥

सा वेपमाना पतिता प्रवाते कदली यथा । राक्षसीनां भयत्रस्ता विवर्णवदनाभवत् ॥ ८ ॥ तस्याः सा दीर्घबहुला वेपन्त्याः सीतया तदा । दद्दशे कम्पिता वेणी व्यालीव परिसर्पती ॥ ९ ॥

भावार्थ

प्रचण्ड वायुके चलनेपर कम्पित होकर गिरे हुए केलेके वृक्षकी भाँति वे राक्षसियोंके भयसे त्रस्त हो पृथ्वीपर गिर पड़ीं । उस समय उनके मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी ॥ उस बेलामें काँपती हुई सीताकी विशाल एवं घनीभूत वेणी भी कम्पित हो रही थी, इसलिये वह रेंगती हुई सर्पिणीके समान दिखायी देती थी ॥ ९ ॥

सा निःश्वसन्ती शोकार्ता कोपोपहतचेतना । आर्ता व्यसृजदश्रूणि मैथिली विललाप च ॥ १० ॥

भावार्थ

वे शोकसे पीड़ित होकर लंबी साँसें खींच रही थीं और क्रोधसे अचेत-सी होकर आर्तभावसे आँसू बहा रही थीं । उस समय मिथिलेशकुमारी इस प्रकार विलाप करने लगीं—॥ १० ॥

हा रामेति च दुःखार्ता हा पुनर्लक्ष्मणेति च । हा श्वश्रूर्मम कौसल्ये हा सुमित्रेति भामिनी ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘हा राम ! हा लक्ष्मण ! हा मेरी सासु कौसल्ये ! हा आर्ये सुमित्रे !’ बारंबार ऐसा कहकर दुःखसे पीड़ित हुई भामिनी सीता रोने-बिलखने लगीं ॥ ११ ॥

लोकप्रवादः सत्योऽयं पण्डितैः समुदाहृतः । अकाले दुर्लभो मृत्युः स्त्रिया वा पुरुषस्य वा ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘हाय ! पण्डितोंने यह लोकोक्ति ठीक ही कही है कि ‘किसी भी स्त्री या पुरुषकी मृत्यु बिना समय आये नहीं होती’ ॥ १२ ॥

यत्राहमाभिः क्रूराभी राक्षसीभिरिहार्दिता । जीवामि हीना रामेण मुहूर्तमपि दुःखिता ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘तभी तो मैं श्रीरामके दर्शनसे वञ्चित तथा इन क्रूर राक्षसियोंद्वारा पीड़ित होनेपर भी यहाँ मुहूर्तभर भी जी रही हूँ ॥ १३ ॥

पशात्यपुण्या कृपणा विनशिष्याम्यनाथवत् । समुद्रमध्ये नौः पूर्णा वायुवेगैरिवाहता ॥ १४ ॥ भर्तारं तमपश्यन्ती राक्षसीवशमागता । सीदामि खलु शोकेन कूलं तोयहृतं यथा ॥ १५ ॥ तं पद्मदलपत्राक्षं सिंहविक्रान्तगामिनम् । धन्याः पश्यन्ति मे नाथं कृतज्ञं प्रियवादिनम् ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘मैंने पूर्वजन्ममें बहुत थोड़े पुण्य किये थे, इसीलिये इस दीन दशामें पड़कर मैं अनाथकी भाँति मारी जाऊँगी । जैसे समुद्रके भीतर सामानसे भरी हुई नौका वायुके वेगसे आहत हो डूब जाती है, उसी प्रकार मैं भी नष्ट हो जाऊँगी॥ ‘मुझे पतिदेवके दर्शन नहीं हो रहे हैं। मैं इन राक्षसियोंके चंगुलमें फँस गयी हूँ और पानीके थपेड़ोंसे आहत हो कटते हुए कगारोंके समान शोकसे क्षीण होती जा रही हूँ ॥ ‘आज जिन लोगोंको सिंहके समान पराक्रमी और सिंहकी-सी चालवाले मेरे कमलदललोचन, कृतज्ञ और प्रियवादी प्राणनाथके दर्शन हो रहे हैं, वे धन्य हैं ॥ १६ ॥

सर्वथा तेन हीनाया रामेण विदितात्मना । तीक्ष्णं विषमिवास्वाद्य दुर्लभं मम जीवनम् ॥ १७ ॥ कीदृशं तु महापापं मया देहान्तरे कृतम् । तेनेदं प्राप्यते घोरं महादुःखं सुदारुणम् ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘उन आत्मज्ञानी भगवान् श्रीरामसे बिछुड़कर मेरा जीवित रहना उसी तरह सर्वथा दुर्लभ है, जैसे तेज विषका पान करके किसीका भी जीना अत्यन्त कठिन हो जाता है ॥ ‘पता नहीं, मैंने पूर्व-जन्ममें दूसरे शरीरसे कैसा महान् पाप किया था, जिससे यह अत्यन्त कठोर, घोर और महान् दुःख मुझे प्राप्त हुआ है ? ॥ १८ ॥

जीवितं त्यक्तुमिच्छामि शोकेन महता वृता । राक्षसीभिश्च रक्षन्त्या रामो नासाद्यते मया ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘इन राक्षसियोंके संरक्षणमें रहकर तो मैं अपने प्राणाराम श्रीरामको कदापि नहीं पा सकती, इसलिये महान् शोकसे घिर गयी हूँ और इससे तंग आकर अपने जीवनका अन्त कर देना चाहती हूँ ॥ १९ ॥

धिगस्तु खलु मानुष्यं धिगस्तु परवश्यताम् । न शक्यं यत् परित्यक्तुमात्मच्छन्देन जीवितम् ॥ २० ॥

भावार्थ

‘इस मानव-जीवन और परतन्त्रताको धिक्कार है, जहाँ अपनी इच्छाके अनुसार प्राणोंका परित्याग भी नहीं किया जा सकता’ ॥ २० ॥

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