सुन्दरकाण्ड, सर्ग 23
इत्युक्त्वा मैथिलीं राजा रावणः शत्रुरावणः । संदिश्य च ततः सर्वा राक्षसीर्निर्जगाम ह ॥ १ ॥
भावार्थ
शत्रुओंको रुलानेवाला राजा रावण सीताजीसे पूर्वोक्त बातें कहकर तथा सब राक्षसियोंको उन्हें वशमें लानेके लिये आदेश दे वहाँसे निकल गया ॥ १ ॥
निष्क्रान्ते राक्षसेन्द्रे तु पुनरन्तःपुरं गते । राक्षस्यो भीमरूपास्ताः सीतां समभिदुद्रुवुः ॥ २ ॥
भावार्थ
अशोकवाटिकासे निकलकर जब राक्षसराज रावण अन्तःपुरको चला गया, तब वहाँ जो भयानक रूपवाली राक्षसियाँ थीं, वे सब चारों ओरसे दौड़ी हुई सीताके पास आयीं ॥ २ ॥
ततः सीतामुपागम्य राक्षस्यः क्रोधमूर्च्छिताः । परं परुषया वाचा वैदेहीमिदमब्रुवन् ॥ ३ ॥
भावार्थ
विदेहकुमारी सीताके समीप आकर क्रोधसे व्याकुल हुई उन राक्षसियोंने अत्यन्त कठोर वाणीद्वारा उनसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ ३ ॥
पौलस्त्यस्य वरिष्ठस्य रावणस्य महात्मनः । दशग्रीवस्य भार्यात्वं सीते न बहु मन्यसे ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘सीते ! तुम पुलस्त्यजीके कुलमें उत्पन्न हुए सर्वश्रेष्ठ दशग्रीव महामना रावणकी भार्या बनना भी कोई बहुत बड़ी बात नहीं समझतीं ?’ ॥ ४ ॥
ततस्त्वेकजटा नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत् । आमन्त्र्य क्रोधताम्राक्षी सीतां करतलोदरीम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् एकजटा नामवाली राक्षसीने क्रोधसे लाल आँखें करके कृशोदरी सीताको पुकारकर कहा—॥ ५ ॥
प्रजापतीनां षण्णां तु चतुर्थोऽयं प्रजापतिः । मानसो ब्रह्मणः पुत्रः पुलस्त्य इति विश्रुतः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘विदेहकुमारी ! पुलस्त्यजी छः प्रजापतियोंमें चौथे हैं और ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं । इस रूपमें उनकी सर्वत्र ख्याति है ॥ ६ ॥
पुलस्त्यस्य तु तेजस्वी महर्षिर्मानसः सुतः । नाम्ना स विश्रवा नाम प्रजापतिसमप्रभः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘पुलस्त्यजीके मानस पुत्र तेजस्वी महर्षि विश्रवा हैं । वे भी प्रजापतिके समान ही प्रकाशित होते हैं ॥ ७ ॥
तस्य पुत्रो विशालाक्षि रावणः शत्रुरावणः । तस्य त्वं राक्षसेन्द्रस्य भार्या भवितुमर्हसि ॥ ८ ॥ मयोक्तं चारुसर्वाङ्गि वाक्यं किं नानुमन्यसे ।
भावार्थ
‘विशाललोचने ! ये शत्रुओंके रुलानेवाले महाराज रावण उन्हींके पुत्र हैं और समस्त राक्षसोंके राजा हैं । तुम्हें इनकी भार्या हो जाना चाहिये । सर्वाङ्गसुन्दरी ! मेरी इस कही हुई बातका तुम अनुमोदन क्यों नहीं करतीं ?’ ॥ ८½ ॥
ततो हरिजटा नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत् ॥ ९ ॥ विवृत्य नयने कोपान्मार्जारसदृशेक्षणा । येन देवास्त्रयस्त्रिंशद् देवराजश्च निर्जितः ॥ १० ॥ तस्य त्वं राक्षसेन्द्रस्य भार्या भवितुमर्हसि ।
भावार्थ
इसके बाद बिल्लीके समान भूरे आँखोंवाली हरिजटा नामकी राक्षसीने क्रोधसे आँखें फाड़कर कहना आरम्भ किया— ‘अरी ! जिन्होंने तैंतीसों² देवताओं तथा देवराज इन्द्रको भी परास्त कर दिया है, उन राक्षसराज रावणकी रानी तो तुम्हें अवश्य बन जाना चाहिये ॥ ९-१०½ ॥
वीर्योत्सिक्तस्य शूरस्य संग्रामेष्वनिवर्तिनः । बलिनो वीर्ययुक्तस्य भार्यात्वं किं न लिप्ससे ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘उन्हें अपने पराक्रमपर गर्व है । वे युद्धसे पीछे न हटनेवाले शूरवीर हैं । ऐसे बल-पराक्रमसम्पन्न पुरुषकी भार्या बनना तुम क्यों नहीं चाहती हो ? ॥ ११ ॥
प्रियां बहुमतां भार्यां त्यक्त्वा राजा महाबलः । सर्वासां च महाभागां त्वामुपैष्यति रावणः ॥ १२ ॥ समृद्धं स्त्रीसहस्रेण नानारत्नोपशोभितम् । अन्तःपुरं तदुत्सृज्य त्वामुपैष्यति रावणः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘महाबली राजा रावण अपनी अधिक प्रिय और सम्मानित भार्या मन्दोदरीको भी, जो सबकी स्वामिनी हैं, छोड़कर तुम्हारे पास पधारेंगे । तुम्हारा कितना महान् सौभाग्य है । वे सहस्रों रमणियोंसे भरे हुए और अनेक प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित उस अन्तःपुरको छोड़कर तुम्हारे पास पधारेंगे ( अतः तुम्हें उनकी प्रार्थना मान लेनी चाहिये )’ ॥ १२-१३ ॥
अन्या तु विकटा नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत् । असकृद् भीमवीर्येण नागा गन्धर्वदानवाः । निर्जिताः समरे येन स ते पार्श्वमुपागतः ॥ १४ ॥ तस्य सर्वसमृद्धस्य रावणस्य महात्मनः । किमर्थं राक्षसेन्द्रस्य भार्यात्वं नेच्छसेऽधमे ॥ १५ ॥
भावार्थ
तदनन्तर विकटा नामवाली दूसरी राक्षसीने कहा— ‘जिन भयानक पराक्रमी राक्षसराजने नागों, गन्धर्वों और दानवोंको भी समराङ्गणमें बारंबार परास्त किया है, वे ही तुम्हारे पास पधारे थे । नीच नारी ! उन्हीं सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न महामना राक्षसराज रावणकी भार्या बननेके लिये तुम्हें क्यों इच्छा नहीं होती है ?’ ॥ १४-१५ ॥
ततस्तां दुर्मुखी नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत् । यस्य सूर्यो न तपति भीतो यस्य स मारुतः । न वाति स्रायतापाङ्गि किं त्वं तस्य न तिष्ठसे ॥ १६ ॥
भावार्थ
फिर उनसे दुर्मुखी नामवाली राक्षसीने कहा— ‘विशाललोचने ! जिनसे भय मानकर सूर्य तपना छोड़ देता है और वायुकी गति रुक जाती है, उनके पास तुम क्यों नहीं रहतीं ? ॥ १६ ॥
पुष्पवृष्टिं च तरवो मुमुचुर्यस्य वै भयात् । शैलाः सुस्रुवुः पानीयं जलदाश्च यदेच्छति ॥ १७ ॥ तस्य नैर्ऋतराजस्य राजराजस्य भामिनि । किं त्वं न कुरुषे बुद्धिं भार्यार्थे रावणस्य हि ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘भामिनि ! जिनके भयसे वृक्ष फूल बरसाने लगते हैं और जो जब इच्छा करते हैं, तभी पर्वत तथा मेघ जलका स्रोत बहाने लगते हैं । उन्हीं राजाधिराज राक्षसराज रावणकी भार्या बननेके लिये तुम्हारे मनमें क्यों नहीं विचार होता है ? ॥ १७-१८ ॥
साधु ते तत्त्वतो देवि कथितं साधु भामिनि । गृहाण सुस्मिते वाक्यमन्यथा न भविष्यसि ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘देवि ! मैंने तुमसे उत्तम, यथार्थ और हितकी बात कही है । सुन्दर मुस्कानवाली सीते ! तुम मेरी बात मान लो, नहीं तो तुम्हें प्राणोंसे हाथ धोना पड़ेगा’ ॥ १९ ॥
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