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सुन्दरकाण्ड, सर्ग 21

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सीता रौद्रस्य रक्षसः । आर्ता दीनस्वरा दीनं प्रत्युवाच ततः शनैः ॥ १ ॥

भावार्थ

उस भयंकर राक्षसकी वह बात सुनकर सीताको बड़ी पीड़ा हुई । उन्होंने दीन वाणीमें बड़े दुःखके साथ धीरे-धीरे उत्तर देना आरम्भ किया ॥ १ ॥

दुःखार्ता रुदती सीता वेपमाना तपस्विनी । चिन्तयन्ती वरारोहा पतिमेव पतिव्रता ॥ २ ॥

भावार्थ

उस समय सुन्दर अङ्गोंवाली पतिव्रता देवी तपस्विनी सीता दुःखसे आतुर होकर रोती हुई काँप रही थीं और अपने पतिदेवका ही चिन्तन कर रही थीं ॥ २ ॥

तृणमन्तरतः कृत्वा प्रत्युवाच शुचिस्मिता । निवर्तय मनो मत्तः स्वजने प्रीयतां मनः ॥ ३ ॥

भावार्थ

पवित्र मुस्कानवाली विदेहनन्दिनीने तिनकेकी ओट करके रावणको इस प्रकार उत्तर दिया—‘तुम मेरी ओरसे अपना मन हटा लो और आत्मीय जनों ( अपनी ही पत्नियों ) पर प्रेम करो ॥ ३ ॥

न मां प्रार्थयितुं युक्तस्त्वं सिद्धिमिव पापकृत् । अकार्यं न मया कार्यमेकपत्न्या विगर्हितम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘जैसे पापाचारी पुरुष सिद्धिकी इच्छा नहीं कर सकता, उसी प्रकार तुम मेरी इच्छा करनेके योग्य नहीं हो । जो पतिव्रताके लिये निन्दित है, वह न करनेयोग्य कार्य मैं कदापि नहीं कर सकती ॥ ४ ॥

कुलं सम्प्राप्तया पुण्यं कुले महति जातया । एवमुक्त्वा तु वैदेही रावणं तं यशस्विनी ॥ ५ ॥ रावणं पृष्ठतः कृत्वा भूयो वचनमब्रवीत् । नाहमौपयिकी भार्या परभार्या सती तव ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘क्योंकि मैं एक महान् कुलमें उत्पन्न हुई हूँ और ब्याह करके एक पवित्र कुलमें आयी हूँ ।’ रावणसे ऐसा कहकर यशस्विनी विदेहराजकुमारीने उसकी ओर अपनी पीठ फेर ली और इस प्रकार कहा—‘रावण ! मैं सती और परायी स्त्री हूँ । तुम्हारी भार्या बनने योग्य नहीं हूँ ॥ ५-६ ॥

साधु धर्ममवेक्षस्व साधु साधुव्रतं चर । यथा तव तथान्येषां रक्ष्या दारा निशाचर ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘निशाचर ! तुम श्रेष्ठ धर्मकी ओर दृष्टिपात करो और सत्पुरुषोंके व्रतका अच्छी तरह पालन करो । जैसे तुम्हारी स्त्रियाँ तुमसे संरक्षण पाती हैं, उसी प्रकार दूसरोंकी स्त्रियोंकी भी तुम्हें रक्षा करनी चाहिये ॥ ७ ॥

आत्मानमुपमां कृत्वा स्वेषु दारेषु रम्यताम् । अतुष्टं स्वेषु दारेषु चपलं चपलेन्द्रियम् ॥ नयन्ति निकृतिप्रज्ञं परदाराः पराभवम् ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘तुम अपनेको आदर्श बनाकर अपनी ही स्त्रियोंमें अनुरक्त रहो । जो अपनी स्त्रियोंसे संतुष्ट नहीं रहता तथा जिसकी बुद्धि धिक्कार देनेयोग्य है, उस चपल इन्द्रियोंवाले चञ्चल पुरुषको परायी स्त्रियाँ पराभवको पहुँचा देती हैं—उसे फजीहतमें डाल देती हैं ॥ ८ ॥

इह सन्तो न वा सन्ति सतो वा नानुवर्तसे । यथा हि विपरीता ते बुद्धिराचारवर्जिता ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘क्या यहाँ सत्पुरुष नहीं रहते हैं अथवा रहनेपर भी तुम उनका अनुसरण नहीं करते हो ? जिससे तुम्हारी बुद्धि ऐसी विपरीत एवं सदाचारशून्य हो गयी है ? ॥ ९ ॥

वचो मिथ्याप्रणीतात्मा पथ्यमुक्तं विचक्षणैः । राक्षसानामभावाय त्वं वा न प्रतिपद्यसे ॥ १० ॥

भावार्थ

‘अथवा बुद्धिमान् पुरुष जो तुम्हारे हितकी बात कहते हैं, उसे निःसार मानकर राक्षसोंके विनाशपर तुले रहनेके कारण तुम ग्रहण ही नहीं करते हो ? ॥ १० ॥

अकृतात्मानमासाद्य राजानमनये रतम् । समृद्धानि विनश्यन्ति राष्ट्राणि नगराणि च ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘जिसका मन अपवित्र तथा सदुपदेशको नहीं ग्रहण करनेवाला है, ऐसे अन्यायी राजाके हाथमें पड़कर बड़े-बड़े समृद्धिशाली राज्य और नगर नष्ट हो जाते हैं ॥ ११ ॥

तथैव त्वां समासाद्य लङ्का रत्नौघसंकुला । अपराधात् तवैकस्य नचिराद् विनशिष्यति ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘इसी प्रकार यह रत्नराशिसे पूर्ण लङ्कापुरी तुम्हारे हाथमें आ जानेसे अब अकेले तुम्हारे ही अपराधसे बहुत जल्द नष्ट हो जायगी ॥ १२ ॥

स्वकृतैर्हन्यमानस्य रावणादीर्घदर्शिनः । अभिनन्दन्ति भूतानि विनाशे पापकर्मणः ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘रावण ! जब कोई अदूरदर्शी पापाचारी अपने कुकर्मोंसे मारा जाता है, उस समय उसका विनाश होनेपर समस्त प्राणियोंको प्रसन्नता होती है ॥ १३ ॥

एवं त्वां पापकर्माणं वक्ष्यन्ति निकृता जनाः । दिष्ट्यैतद् व्यसनं प्राप्तो रौद्र इत्येव हर्षिताः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘इसी प्रकार तुमने जिन लोगोंको कष्ट पहुँचाया है, वे तुम्हें पापी कहेंगे और ‘बड़ा अच्छा हुआ, जो इस आततायी-को यह कष्ट प्राप्त हुआ’ ऐसा कहकर हर्ष मनायेंगे ॥ १४ ॥

शक्या लोभयितुं नाहमैश्वर्येण धनेन वा । अनन्या राघवेणाहं भास्करेण यथा प्रभा ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘जैसे प्रभा सूर्यसे अलग नहीं होती, उसी प्रकार मैं श्रीरघुनाथजीसे अभिन्न हूँ । ऐश्वर्य या धनके द्वारा तुम मुझे लुभा नहीं सकते ॥ १५ ॥

उपधाय भुजं तम्य लोकनाथस्य सत्कृतम् । कथं नामोपधास्यामि भुजमन्यस्य कस्यचित् ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘जगदीश्वर श्रीरामचन्द्रजीकी सम्मानित भुजापर सिर रखकर अब मैं किसी दूसरेकी बाँहकी तकिया कैसे लगा सकती हूँ ? ॥ १६ ॥

अहमौपयिकी भार्या तस्यैव च धरापतेः । व्रतस्नातस्य विद्येव विप्रस्य विदितात्मनः ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘जिस प्रकार वेदविद्या आत्मज्ञानी स्नातक ब्राह्मणकी ही सम्पत्ति होती है, उसी प्रकार मैं केवल उन पृथ्वीपति रघुनाथजीकी ही भार्या होने योग्य हूँ ॥ १७ ॥

साधु रावण रामेण मां समानय दुःखिताम् । वने वासितया सार्धं करेण्वेव गजाधिपम् ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘रावण ! तुम्हारे लिये यही अच्छा होगा कि जिस प्रकार वनमें समागमकी वासनासे युक्त हथिनीको कोई गजराजसे मिला दे, उसी प्रकार तुम मुझ दुखियाको श्रीरघुनाथजीसे मिला दो ॥ १८ ॥

मित्रमौपयिकं कर्तुं रामः स्थानं परीप्सता । बन्धं चानिच्छता घोरं त्वयासौ पुरुषर्षभः ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘यदि तुम्हें अपने नगरकी रक्षा और दारुण बन्धनसे बचनेकी इच्छा हो तो पुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामको अपना मित्र बना लेना चाहिये; क्योंकि वे ही इसके योग्य हैं ॥ १९ ॥

विदितः सर्वधर्मज्ञः शरणागतवत्सलः । तेन मैत्री भवतु ते यदि जीवितुमिच्छसि ॥ २० ॥

भावार्थ

‘भगवान् श्रीराम समस्त धर्मोंके ज्ञाता और सुप्रसिद्ध शरणागतवत्सल हैं । यदि तुम जीवित रहना चाहते हो तो उनके साथ तुम्हारी मित्रता हो जानी चाहिये ॥ २० ॥

प्रसादयस्व त्वं चैनं शरणागतवत्सलम् । मां चास्मै प्रयतो भूत्वा निर्यातयितुमर्हसि ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘तुम शरणागतवत्सल श्रीरामकी शरण लेकर उन्हें प्रसन्न करो और शुद्धहृदय होकर मुझे उनके पास लौटा दो ॥ २१ ॥

एवं हि ते भवेत् स्वस्ति सम्प्रदाय रघूत्तमे । अन्यथा त्वं हि कुर्वाणः परां प्राप्स्यसि चापदम् ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘इस प्रकार मुझे श्रीरघुनाथजीको सौंप देनेपर तुम्हारा भला होगा । इसके विपरीत आचरण करनेपर तुम बड़ी भारी विपत्तिमें पड़ जाओगे ॥ २२ ॥

वर्जयेद् वज्रमुत्सृष्टं वर्जयेदन्तकश्चिरम् । त्वद्विधं न तु संक्रुद्धो लोकनाथः स राघवः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘तुम्हारे-जैसे निशाचरको कदाचित् हाथसे छूटा हुआ वज्र बिना मारे छोड़ सकता है और काल भी बहुत दिनोंतक तुम्हारी उपेक्षा कर सकता है; किंतु क्रोधमें भरे हुए लोकनाथ रघुनाथजी कदापि नहीं छोड़ेंगे ॥ २३ ॥

रामस्य धनुषः शब्दं श्रोष्यसि त्वं महास्वनम् । शतक्रतुविसृष्टस्य निर्घोषमशनेरिव ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘इन्द्रके छोड़े हुए वज्रकी गड़गड़ाहटके समान तुम श्रीरामचन्द्रजीके धनुषकी घोर टंकार सुनोगे ॥ २४ ॥

इह शीघ्रं सुपर्वाणो ज्वलितास्या इवोरगाः । इषवो निपतिष्यन्ति रामलक्ष्मणलक्षिताः ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘यहाँ श्रीराम और लक्ष्मणके नामोंसे अङ्कित और सुन्दर गाँठवाले बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोंके समान शीघ्र ही गिरेंगे ॥ २५ ॥

रक्षांसि निहनिष्यन्तः पुर्यामस्यां न संशयः । असम्पातं करिष्यन्ति पतन्तः कङ्कवाससः ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘वे कङ्कपत्रवाले बाण इस पुरीमें राक्षसोंका संहार करेंगे, इसमें संशय नहीं है । वे इस तरह बरसेंगे कि यहाँ तिल रखनेकी भी जगह नहीं रह जायगी ॥ २६ ॥

राक्षसेन्द्रमहासर्पान् स रामगरुडो महान् । उद्धरिष्यति वेगेन वैनतेय इवोरगान् ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘जैसे विनतानन्दन गरुड़ सर्पोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार श्रीरामरूपी महान् गरुड़ राक्षसराजरूपी बड़े-बड़े सर्पोंको वेगपूर्वक उच्छिन्न कर डालेंगे ॥ २७ ॥

अपनेष्यति मां भर्ता त्वत्तः शीघ्रमरिंदमः । असुरेभ्यः श्रियं दीप्तां विष्णुस्त्रिभिरिव क्रमैः ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘जैसे भगवान् विष्णुने अपने तीन ही पगोंद्वारा असुरोंसे उनकी उद्दीप्त राजलक्ष्मी छीन ली थी, उसी प्रकार मेरे स्वामी शत्रुसूदन श्रीराम मुझे शीघ्र ही तेरे यहाँसे निकाल ले जायँगे ॥ २८ ॥

जनस्थाने हतस्थाने निहते रक्षसां बले । अशक्तेन त्वया रक्षः कृतमेतदसाधु वै ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘राक्षस ! जब राक्षसोंकी सेनाका संहार हो जानेसे जनस्थानका तुम्हारा आश्रय नष्ट हो गया और तुम युद्ध करनेमें असमर्थ हो गये, तब तुमने छल और चोरीसे यह नीच कर्म किया है ॥ २९ ॥

आश्रमं तत्तयोः शून्यं प्रविश्य नरसिंहयोः । गोचरं गतयोर्भ्रात्रोरपनीता त्वयाधम ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘नीच निशाचर ! तुमने पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मणके सूने आश्रममें घुसकर मेरा हरण किया था । वे दोनों उस समय मायामृगको मारनेके लिये वनमें गये हुए थे ( नहीं तो तभी तुम्हें इसका फल मिल जाता ) ॥ ३० ॥

नहि गन्धमुपाघ्राय रामलक्ष्मणयोस्त्वया । शक्यं संदर्शने स्थातुं शुना शार्दूलयोरिव ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम और लक्ष्मणकी तो गन्ध पाकर भी तुम उनके सामने नहीं ठहर सकते । क्या कुत्ता कभी दो-दो बाघोंके सामने टिक सकता है ! ॥ ३१ ॥

तस्य ते विग्रहे ताभ्यां युगग्रहणमस्थिरम् । वृत्रस्येवेन्द्रबाहुभ्यां बाहोरेकस्य विग्रहे ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘जैसे इन्द्रकी दो बाँहोंके साथ युद्ध छिड़नेपर वृत्रासुरकी एक बाँहके लिये संग्रामके बोझको सँभालना असम्भव हो गया, उसी प्रकार समराङ्गणमें उन दोनों भाइयोंके साथ युद्धका जुआ उठाये रखना या टिकना तुम्हारे लिये सर्वथा असम्भव है ॥ ३२ ॥

क्षिप्रं तव स नाथो मे रामः सौमित्रिणा सह । तोयमल्पमिवादित्यः प्राणानादास्यते शरैः ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘वे मेरे प्राणनाथ श्रीराम सुमित्राकुमार लक्ष्मणके साथ आकर अपने बाणोंद्वारा शीघ्र तुम्हारे प्राण हर लेंगे । ठीक उसी तरह, जैसे सूर्य थोड़ेसे जलको अपनी किरणोंद्वारा शीघ्र सुखा देते हैं ॥ ३३ ॥

गिरिं कुबेरस्य गतोऽथवाऽऽलयं सभां गतो वा वरुणस्य राज्ञः । असंशयं दाशरथेर्विमोक्ष्यसे महाद्रुमः कालहतोऽशनेरिव ॥ ३४ ॥

भावार्थ

‘तुम कुबेरके कैलासपर्वतपर चले जाओ, अथवा वरुणकी सभामें जाकर छिप रहो, किंतु कालका मारा हुआ विशाल वृक्ष जैसे वज्रका आघात लगते ही नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार तुम दशरथनन्दन श्रीरामके बाणसे मारे जाकर तत्काल प्राणोंसे हाथ धो बैठोगे, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि काल तुम्हें पहलेसे ही मार चुका है’ ॥ ३४ ॥

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