सुन्दरकाण्ड, सर्ग 15
स वीक्षमाणस्तत्रस्थो मार्गमाणश्च मैथिलीम् । अवेक्षमाणश्च महीं सर्वां तामन्ववैक्षत ॥ १ ॥
भावार्थ
उस अशोकवृक्षपर बैठे-बैठे हनुमान्जी सम्पूर्ण वनको देखते और सीताको ढूँढ़ते हुए वहाँकी सारी भूमिपर दृष्टिपात करने लगे ॥ १ ॥
संतानकलताभिश्च पादपैरुपशोभिताम् । दिव्यगन्धरसोपेतां सर्वतः समलंकृताम् ॥ २ ॥
भावार्थ
वह भूमि कल्पवृक्षकी लताओं तथा वृक्षोंसे सुशोभित थी, दिव्य गन्ध तथा दिव्य रससे परिपूर्ण थी और सब ओरसे सजायी गयी थी ॥ २ ॥
तां स नन्दनसंकाशां मृगपक्षिभिरावृताम् । हर्म्यप्रासादसम्बाधां कोकिलाकुलनिःस्वनाम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
मृगों और पक्षियोंसे व्याप्त होकर वह भूमि नन्दनवनके समान शोभा पा रही थी, अट्टालिकाओं तथा राजभवनोंसे युक्त थी तथा कोकिल-समूहोंकी काकलीसे कोलाहलपूर्ण जान पड़ती थी ॥ ३ ॥
काञ्चनोत्पलपद्माभिर्वापीभिरुपशोभिताम् । बह्वासनकुथोपेतां बहुभूमिगृहायुताम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
सुवर्णमय उत्पल और कमलोंसे भरी हुई बावड़ियाँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं । बहुत-से आसन और कालीन वहाँ बिछे हुए थे । अनेकानेक भूमिगृह वहाँ शोभा पा रहे थे ॥ ४ ॥
सर्वर्तुकुसुमै रम्यैः फलवद्भिश्च पादपैः । पुष्पितानामशोकानां श्रिया सूर्योदयप्रभाम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
सभी ऋतुओंमें फूल देनेवाले और फलोंसे भरे हुए रमणीय वृक्ष उस भूमिको विभूषित कर रहे थे । खिले हुए अशोकोंकी शोभासे सूर्योदयकालकी छटा-सी छिटक रही थी ॥ ५ ॥
प्रदीप्तामिव तत्रस्थो मारुतिः समुदैक्षत । निष्पत्रशाखां विहगैः क्रियमाणामिवासकृत् ॥ ६ ॥
भावार्थ
पवनकुमार हनुमान्ने उस अशोकपर बैठे-बैठे ही उस दमकती हुई-सी वाटिकाको देखा । वहाँके पक्षी उस वाटिकाको बारंबार पत्रों और शाखाओंसे हीन कर रहे थे ॥ ६ ॥
विनिष्पतद्भिः शतशश्चित्रैः पुष्पावतंसकैः । समूलपुष्परचितैरशोकैः शोकनाशनैः ॥ ७ ॥ पुष्पभारातिभारैश्च स्पृशद्भिरिव मेदिनीम् । कर्णिकारैः कुसुमितैः किंशुकैश्च सुपुष्पितैः ॥ ८ ॥ स देशः प्रभया तेषां प्रदीप्त इव सर्वतः ।
भावार्थ
वृक्षोंसे झड़ते हुए सैकड़ों विचित्र पुष्प-गुच्छोंसे नीचेसे ऊपरतक मानो फूलसे बने हुए शोकनाशक अशोकोंसे, फूलोंके भारी भारसे झुककर पृथ्वीका स्पर्श-सा करते हुए खिले हुए कनेरोंसे तथा सुन्दर फूलवाले पलाशोंसे उपलक्षित वह भूभाग उनकी प्रभाके कारण सब ओरसे उद्दीप्त-सा हो रहा था ॥ ७-८½ ॥
पुंनागाः सप्तपर्णाश्च चम्पकोद्दालकास्तथा ॥ ९ ॥ विवृद्धमूला बहवः शोभन्ते स्म सुपुष्पिताः ।
भावार्थ
पुंनाग ( श्वेत कमल या नागकेसर ), छितवन, चम्पा तथा बहुवार आदि बहुत-से सुन्दर पुष्पवाले वृक्ष, जिनकी जड़ें बहुत मोटी थीं, वहाँ शोभा पा रहे थे ॥ ९½ ॥
शातकुम्भनिभाः केचित् केचिदग्निशिखप्रभाः ॥ १० ॥ नीलाञ्जननिभाः केचित् तत्राशोकाः सहस्रशः ।
भावार्थ
वहाँ सहस्रों अशोकके वृक्ष थे, जिनमेंसे कुछ तो सुवर्णके समान कान्तिमान् थे, कुछ आगकी ज्वालाके समान प्रकाशित हो रहे थे और कोई-कोई काले काजलकी-सी कान्तिवाले थे ॥ १०½ ॥
नन्दनं विबुधोद्यानं चित्रं चैत्ररथं यथा ॥ ११ ॥ अतिवृत्तमिवाचिन्त्यं दिव्यं रम्यश्रियायुतम् ।
भावार्थ
वह अशोकवन देवोद्यान नन्दनके समान आनन्ददायी, कुबेरके चैत्ररथ वनके समान विचित्र तथा उन दोनोंसे भी बढ़कर अचिन्त्य, दिव्य एवं रमणीय शोभासे सम्पन्न था ॥ ११½ ॥
द्वितीयमिव चाकाशं पुष्पज्योतिर्गणायुतम् ॥ १२ ॥ पुष्परत्नशतैश्चित्रं पञ्चमं सागरं यथा ।
भावार्थ
वह पुष्परूपी नक्षत्रोंसे युक्त दूसरे आकाशके समान सुशोभित होता था तथा पुष्पमय सैकड़ों रत्नोंसे विचित्र शोभा पानेवाले पाँचवें समुद्रके समान जान पड़ता था ॥ १२½ ॥
सर्वर्तुपुष्पैर्निचितं पादपैर्मधुगन्धिभिः ॥ १३ ॥ नानानिनादैरुद्यानं रम्यं मृगगणद्विजैः । अनेकगन्धप्रवहं पुण्यगन्धं मनोहरम् ॥ १४ ॥ शैलेन्द्रमिव गन्धाढ्यं द्वितीयं गन्धमादनम् ।
भावार्थ
सब ऋतुओंमें फूल देनेवाले मनोरम गन्धयुक्त वृक्षोंसे भरा हुआ तथा भाँति-भाँतिके कलरव करनेवाले मृगों और पक्षियोंसे सुशोभित वह उद्यान बड़ा रमणीय प्रतीत होता था । वह अनेक प्रकारकी सुगन्धका भार वहन करनेके कारण पवित्र गन्धसे युक्त और मनोहर जान पड़ता था । दूसरे गिरिराज गन्धमादनके समान उत्तम सुगन्धसे व्याप्त था ॥ १३-१४½ ॥
अशोकवनिकायां तु तस्यां वानरपुङ्गवः ॥ १५ ॥ स ददर्शाविदूरस्थं चैत्यप्रासादमूर्जितम् । मध्ये स्तम्भसहस्रेण स्थितं कैलासपाण्डुरम् ॥ १६ ॥ प्रवालकृतसोपानं तप्तकाञ्चनवेदिकम् । मुष्णन्तमिव चक्षूंषि द्योतमानमिव श्रिया ॥ १७ ॥ निर्मलं प्रांशुभावत्वादुल्लिखन्तमिवाम्बरम् ।
भावार्थ
उस अशोकवाटिकामें वानर-शिरोमणि हनुमान्ने थोड़ी ही दूरपर एक गोलाकार ऊँचा मन्दिर देखा, जिसके भीतर एक हजार खंभे लगे हुए थे । वह मन्दिर कैलास पर्वतके समान श्वेत वर्णका था । उसमें मूँगेकी सीढ़ियाँ बनी थीं तथा तपाये हुए सोनेकी वेदियाँ बनायी गयी थीं । वह निर्मल प्रासाद अपनी शोभासे देदीप्यमान-सा हो रहा था । दर्शकोंकी दृष्टिमें चकाचौंध-सा पैदा कर देता था और बहुत ऊँचा होनेके कारण आकाशमें रेखा खींचता-सा जान पड़ता था ॥ १५–१७½ ॥
ततो मलिनसंवीतां राक्षसीभिः समावृताम् ॥ १८ ॥ उपवासकृशां दीनां निःश्वसन्तीं पुनः पुनः । दद्र्श शुक्लपक्षादौ चन्द्ररेखामिवामलाम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
वह चैत्यप्रासाद ( मन्दिर ) देखनेके अनन्तर उनकी दृष्टि वहाँ एक सुन्दरी स्त्रीपर पड़ी, जो मलिन वस्त्र धारण किये राक्षसियोंसे घिरी हुई बैठी थी । वह उपवास करनेके कारण अत्यन्त दुर्बल और दीन दिखायी देती थी तथा बारंबार सिसक रही थी । शुक्लपक्षके आरम्भमें चन्द्रमाकी कला जैसी निर्मल और कृश दिखायी देती है, वैसी ही वह भी दृष्टिगोचर होती थी ॥ १८-१९ ॥
मन्दप्रख्यायमानेन रूपेण रुचिरप्रभाम् । पिनद्धां धूमजालेन शिखामिव विभावसोः ॥ २० ॥
भावार्थ
धुँधली-सी स्मृतिके आधारपर कुछ-कुछ पहचाने जानेवाले अपने रूपसे वह सुन्दर प्रभा बिखेर रही थी और धूएँसे ढकी हुई अग्निकी ज्वालाके समान जान पड़ती थी ॥ २० ॥
पीतेनैकेन संवीतां क्लिष्टेनोत्तमवाससा । सपङ्कामनलंकारां विपद्मामिव पद्मिनीम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
एक ही पीले रंगके पुराने रेशमी वस्त्रसे उसका शरीर ढका हुआ था । वह मलिन, अलंकारशून्य होनेके कारण कमलोंसे रहित पुष्करिणीके समान श्रीहीन दिखायी देती थी ॥ २१ ॥
पीडितां दुःखसंतप्तां परिक्षीणां तपस्विनीम् । ग्रहेणाङ्गारकेणेव पीडितामिव रोहिणीम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
वह तपस्विनी मंगलग्रहसे आक्रान्त रोहिणीके समान शोकसे पीड़ित, दुःखसे संतप्त और सर्वथा क्षीणकाय हो रही थी ॥ २२ ॥
अश्रुपूर्णमुखीं दीनां कृशामनशनेन च । शोकध्यानपरां दीनां नित्यं दुःखपरायणाम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
उपवाससे दुर्बल हुई उस दुखिया नारीके मुँहपर आँसुओंकी धारा बह रही थी । वह शोक और चिन्तामें मग्न हो दीन दशामें पड़ी हुई थी एवं निरन्तर दुःखमें ही डूबी रहती थी ॥ २३ ॥
प्रियं जनमपश्यन्तीं पश्यन्तीं राक्षसीगणम् । स्वगणेन मृगीं हीनां श्वगणेनावृतामिव ॥ २४ ॥
भावार्थ
वह अपने प्रियजनोंको तो देख नहीं पाती थी । उसकी दृष्टिके समक्ष सदा राक्षसियोंका समूह ही बैठा रहता था । जैसे कोई मृगी अपने यूथसे बिछुड़कर कुत्तोंके झुंडसे घिर गयी हो, वही दशा उसकी भी हो रही थी ॥ २४ ॥
नीलनागाभया वेण्या जघनं गतयैकया । नीलया नीरदापाये वनराज्या महीमिव ॥ २५ ॥
भावार्थ
काली नागिनके समान कटिसे नीचेतक लटकी हुई एकमात्र काली वेणीके द्वारा उपलक्षित होनेवाली वह नारी बादलोंके हट जानेपर नीली वनश्रेणीसे घिरी हुई पृथ्वीके समान प्रतीत होती थी ॥ २५ ॥
सुखार्हां दुःखसंतप्तां व्यसनानामकोविदाम् । तां विलोक्य विशालाक्षीमधिकं मलिनां कृशाम् ॥ २६ ॥ तर्कयामास सीतेति कारणैरुपपादिभिः ।
भावार्थ
वह सुख भोगनेके योग्य थी, किंतु दुःखसे संतप्त हो रही थी । इसके पहले उसे संकटोंका कोई अनुभव नहीं था । उस विशाल नेत्रोंवाली, अत्यन्त मलिन और क्षीणकाय अबलाका अवलोकन करके युक्तियुक्त कारणोंद्वारा हनुमान्जीने यह अनुमान किया कि हो-न-हो यही सीता है ॥ २६½ ॥
ह्रियमाणा तदा तेन रक्षसा कामरूपिणा ॥ २७ ॥ यथारूपा हि दृष्टा सा तथारूपेयमङ्गना ।
भावार्थ
इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला वह राक्षस जब सीताजीको हरकर ले जा रहा था, उस दिन जिस रूपमें उनका दर्शन हुआ था, कल्याणी नारी भी वैसे ही रूपसे युक्त दिखायी देती है ॥ २७½ ॥
पूर्णचन्द्राननां सुभ्रूं चारुवृत्तपयोधराम् ॥ २८ ॥ कुर्वतीं प्रभया देवीं सर्वा वितिमिरा दिशः ।
भावार्थ
देवी सीताका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर था । उनकी भौंहें बड़ी सुन्दर थीं । दोनों स्तन मनोहर और गोलाकार थे । वे अपनी अङ्गकान्तिसे सम्पूर्ण दिशाओंका अन्धकार दूर किये देती थीं ॥ २८½ ॥
तां नीलकण्ठीं बिम्बोष्ठीं सुमध्यां सुप्रतिष्ठिताम् ॥ २९ ॥
भावार्थ
उनके केश काले-काले और ओष्ठ बिम्बफलके समान लाल थे । कटिभाग बहुत ही सुन्दर था । सारे अङ्ग सुडौल और सुगठित थे ॥ २९ ॥
सीतां पद्मपलाशाक्षीं मन्मथस्य रतिं यथा । इष्टां सर्वस्य जगतः पूर्णचन्द्रप्रभामिव ॥ ३० ॥ भूमौ सुतनुमासीनां नियतामिव तापसीम् । निःश्वासबहुलां भीरुं भुजगेन्द्रवधूमिव ॥ ३१ ॥
भावार्थ
कमलनयनी सीता कामदेवकी प्रेयसी रतिके समान सुन्दरी थीं, पूर्ण चन्द्रमाकी प्रभाके समान समस्त जगत्के लिये प्रिय थीं । उनका शरीर बहुत ही सुन्दर था । वे नियमपरायणा तापसीके समान भूमिपर बैठी थीं । यद्यपि वे स्वभावसे ही भीरु और चिन्ताके कारण बारंबार लंबी साँस खींचती थीं तो भी दूसरोंके लिये नागिनके समान भयंकर थीं ॥ ३०-३१ ॥
शोकजालेन महता विततेन न राजतीम् । संसक्तां धूमजालेन शिखामिव विभावसोः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
वे विस्तृत महान् शोकजालसे आच्छादित होनेके कारण विशेष शोभा नहीं पा रही थीं । धूएँके समूहसे मिली हुई अग्निशिखाके समान दिखायी देती थीं ॥ ३२ ॥
तां स्मृतीमिव संदिग्धामृद्धिं निपतितामिव । विहतामिव च श्रद्धामाशां प्रतिहतामिव ॥ ३३ ॥ सोपसर्गां यथा सिद्धिं बुद्धिं सकलुषामिव । अभूतेनापवादेन कीर्तिं निपतितामिव ॥ ३४ ॥
भावार्थ
वे संदिग्ध अर्थवाली स्मृति, भूतलपर गिरी हुई ऋद्धि, टूटी हुई श्रद्धा, भग्न हुई आशा, विघ्नयुक्त सिद्धि, कलुषित बुद्धि और मिथ्या कलंकसे भ्रष्ट हुई कीर्तिके समान जान पड़ती थीं ॥ ३३-३४ ॥
रामोपरोधव्यथितां रक्षोगणनिपीडिताम् । अबलां मृगशावाक्षीं वीक्षमाणां ततस्ततः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें रुकावट पड़ जानेसे उनके मनमें बड़ी व्यथा हो रही थी । राक्षसोंसे पीड़ित हुई मृगशावकनयनी अबला सीता असहायकी भाँति इधर-उधर देख रही थीं ॥ ३५ ॥
बाष्पाम्बुपरिपूर्णेन कृष्णवक्राक्षिपक्ष्मणा । वदनेनाप्रसन्नेन निःश्वसन्तीं पुनः पुनः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
उनका मुख प्रसन्न नहीं था । उसपर आँसुओंकी धारा बह रही थी और नेत्रोंकी पलकें काली एवं टेढ़ी दिखायी देती थीं । वे बारंबार लंबी साँस खींचती थीं ॥ ३६ ॥
मलपङ्कधरां दीनां मण्डनार्हाममण्डिताम् । प्रभां नक्षत्रराजस्य कालमेघैरिवावृताम् ॥ ३७ ॥
भावार्थ
उनके शरीरपर मैल जम गयी थी । वे दीनताकी मूर्ति बनी बैठी थीं तथा शृङ्गार और भूषण धारण करनेके योग्य होनेपर भी अलंकारशून्य थीं, अतः काले बादलोंसे ढकी हुई चन्द्रमाकी प्रभाके समान जान पड़ती थीं ॥ ३७ ॥
तस्य संदिदिहे बुद्धिस्तथा सीतां निरीक्ष्य च । आम्नायानामयोगेन विद्यां प्रशिथिलामिव ॥ ३८ ॥
भावार्थ
अभ्यास न करनेसे शिथिल ( विस्मृत ) हुई विद्याके समान क्षीण हुई सीताको देखकर हनुमान्जीकी बुद्धि संदेहमें पड़ गयी ॥ ३८ ॥
दुःखेन बुबुधे सीतां हनुमाननलंकृताम् । संस्कारेण यथा हीनां वाचमर्थान्तरं गताम् ॥ ३९ ॥
भावार्थ
अलंकार तथा स्नान-अनुलेपन आदि अङ्गसंस्कारसे रहित हुई सीता व्याकरणादिजनित संस्कारसे शून्य होनेके कारण अर्थान्तरको प्राप्त हुई वाणीके समान पहचानी नहीं जा रही थीं । हनुमान्जीने बड़े कष्टसे उन्हें पहचाना ॥३९॥
तां समीक्ष्य विशालाक्षीं राजपुत्रीमनिन्दिताम् । तर्कयामास सीतेति कारणैरुपपादयन् ॥ ४० ॥
भावार्थ
उन विशाललोचना सती-साध्वी राजकुमारीको देखकर उन्होंने कारणों ( युक्तियों ) द्वारा उपपादन करते हुए मनमें निश्चय किया कि यही सीता हैं ॥ ४० ॥
वैदेह्या यानि चाङ्गेषु तदा रामोऽन्वकीर्तयत् । तान्याभरणजालानि गात्रशोभीन्यलक्षयत् ॥ ४१ ॥
भावार्थ
उन दिनों श्रीरामचन्द्रजीने विदेहकुमारीके अङ्गोंमें जिन-जिन आभूषणोंके होनेकी चर्चा की थी, वे ही आभूषण-समूह इस समय उनके अङ्गोंकी शोभा बढ़ा रहे थे । हनुमान्जीने इस बातकी ओर लक्ष्य किया ॥ ४१ ॥
सुकृतौ कर्णवेष्टौ च श्वदंष्ट्रौ च सुसंस्थितौ । मणिविद्रुमचित्राणि हस्तेष्वाभरणानि च ॥ ४२ ॥
भावार्थ
सुन्दर बने हुए कुण्डल और कुत्तेके दाँतोंकी-सी आकृतिवाले त्रिकर्ण नामधारी कर्णफूल कानोंमें सुन्दर ढंगसे सुप्रतिष्ठित एवं सुशोभित थे । हाथोंमें कंगन आदि आभूषण थे, जिनमें मणि और मूँगे जड़े हुए थे ॥ ४२ ॥
श्यामानि चिरयुक्तत्वात् तथा संस्थानवन्ति च । तान्येवैतानि मन्येऽहं यानि रामोऽन्वकीर्तयत् ॥ ४३ ॥ तत्र यान्यवहीनानि तान्यहं नोपलक्षये । यान्यस्या नावहीनानि तानीमानि न संशयः ॥ ४४ ॥
भावार्थ
यद्यपि बहुत दिनोंसे पहने गये होनेके कारण वे कुछ काले पड़ गये थे, तथापि उनके आकार-प्रकार वैसे ही थे । ( हनुमान्जीने सोचा— ) ‘श्रीरामचन्द्रजीने जिनकी चर्चा की थी, मेरी समझमें ये वे ही आभूषण हैं । सीताजीने जो आभूषण वहाँ गिरा दिये थे, उनको मैं इनके अङ्गोंमें नहीं देख रहा हूँ । इनके जो आभूषण मार्गमें गिराये नहीं गये थे, वे ही ये दिखायी देते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ४३-४४ ॥
पीतं कनकपट्टाभं स्रस्तं तद्वसनं शुभम् । उत्तरीयं नगासक्तं तदा दृष्टं प्लवङ्गमैः ॥ ४५ ॥ भूषणानि च मुख्यानि दृष्टानि धरणीतले । अनयैवापविद्धानि स्वनवन्ति महान्ति च ॥ ४६ ॥
भावार्थ
‘उस समय वानरोंने पर्वतपर गिराये हुए सुवर्णपत्रके समान जो सुन्दर पीला वस्त्र और पृथ्वीपर पड़े हुए उत्तमोत्तम बहुमूल्य एवं बजनेवाले आभूषण देखे थे, वे इन्हींके गिराये हुए थे ॥ ४५-४६ ॥
इदं चिरगृहीतत्वाद् वसनं क्लिष्टवत्तरम् । तथाप्यनूनं तद्वर्णं तथा श्रीमद्यथेतरत् ॥ ४७ ॥
भावार्थ
‘यह वस्त्र बहुत दिनोंसे पहने जानेके कारण यद्यपि बहुत पुराना हो गया है, तथापि इसका पीला रंग अभीतक उतरा नहीं है । यह भी वैसा ही कान्तिमान् है, जैसा वह दूसरा वस्त्र था ॥ ४७ ॥
इयं कनकवर्णाङ्गी रामस्य महिषी प्रिया । प्रणष्टापि सती यस्य मनसो न प्रणश्यति ॥ ४८ ॥
भावार्थ
‘ये सुवर्णके समान गौर अङ्गवाली श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी महारानी हैं, जो अदृश्य हो जानेपर भी उनके मनसे विलग नहीं हुई हैं ॥ ४८ ॥
इयं सा यत्कृते रामश्चतुर्भिरिह तप्यते । कारुण्येनानृशंस्येन शोकेन मदनेन च ॥ ४९ ॥
भावार्थ
‘ये वे ही सीता हैं, जिनके लिये श्रीरामचन्द्रजी इस जगत्में करुणा, दया, शोक और प्रेम—इन चार कारणोंसे संतप्त होते रहते हैं ॥ ४९ ॥
स्त्री प्रणष्टेति कारुण्यादाश्रितेत्यानृशंस्यतः । पत्नी नष्टेति शोकेन प्रियेति मदनेन च ॥ ५० ॥
भावार्थ
‘एक स्त्री खो गयी, यह सोचकर उनके हृदयमें करुणा भर आती है । वह हमारे आश्रित थी, यह सोचकर वे दयासे द्रवित हो उठते हैं । मेरी पत्नी ही मुझसे बिछुड़ गयी, इसका विचार करके वे शोकसे व्याकुल हो उठते हैं तथा मेरी प्रियतमा मेरे पास नहीं रही, ऐसी भावना करके उनके हृदयमें प्रेमकी वेदना होने लगती है ॥ ५० ॥
अस्या देव्या यथारूपमङ्गप्रत्यङ्गसौष्ठवम् । रामस्य च यथारूपं तस्येयमसितेक्षणा ॥ ५१ ॥
भावार्थ
जैसा अलौकिक रूप श्रीरामचन्द्रजीका है तथा जैसा मनोहर रूप एवं अङ्ग-प्रत्यङ्गकी सुघड़ता इन देवी सीतामें है; इसे देखते हुए कजरारे नेत्रोंवाली सीता उन्हींके योग्य पत्नी हैं ॥ ५१ ॥
अस्या देव्या मनस्तस्मिंस्तस्य चास्यां प्रतिष्ठितम् । तेनेयं स च धर्मात्मा मुहूर्तमपि जीवति ॥ ५२ ॥
भावार्थ
‘इन देवीका मन श्रीरघुनाथजीमें और श्रीरघुनाथजीका मन इनमें लगा हुआ है, इसीलिये ये तथा धर्मात्मा श्रीराम जीवित हैं । इनके मुहूर्तमात्र जीवनमें भी यही कारण है ॥ ५२ ॥
दुष्करं कृतवान् रामो हीनो यदनया प्रभुः । धारयत्यात्मनो देहं न शोकेनावसीदति ॥ ५३ ॥
भावार्थ
‘इनके बिछुड़ जानेपर भी भगवान् श्रीराम जो अपने शरीरको धारण करते हैं, शोकसे शिथिल नहीं हो जाते हैं, यह उन्होंने अत्यन्त दुष्कर कार्य किया है’ ॥ ५३ ॥
एवं सीतां तथा दृष्ट्वा हृष्टः पवनसम्भवः । जगाम मनसा रामं प्रशशंस च तं प्रभुम् ॥ ५४ ॥
भावार्थ
इस प्रकार उस अवस्थामें सीताका दर्शन पाकर पवनपुत्र हनुमान्जी बहुत प्रसन्न हुए । वे मन-ही-मन भगवान् श्रीरामके पास जा पहुँचे—उनका चिन्तन करने लगे तथा सीता-जैसी साध्वीको पत्नीरूपमें पानेसे उनके सौभाग्यकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ५४ ॥
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